काली हवेली — वो किसका इंतज़ार कर रही थी… (एक रहस्य)
एक पुरानी हवेली, एक बच्ची जो अब भी इंतज़ार कर रही है… और एक सच जिसे कोई मानना नहीं चाहता।
A StoryLab Original — InnaMax
गेट अपने आप थोड़ा-सा खुला…
और आरव ने टॉर्च कसकर पकड़ ली।
चंदौली के बाहर, बनारस रोड से थोड़ा हटकर खड़ी वो हवेली…
दिन में भी खाली लगती थी।
रात में—जैसे किसी का इंतज़ार करती हो।
आरव ने कैमरा ऑन किया।
“Myth bust karna है बस,” उसने धीरे से खुद से कहा।
अंदर कदम रखते ही… धूल की गंध, सीलन, और अजीब-सी खामोशी।
जैसे घर में कोई हो… पर दिखे नहीं।
पहला कमरा—टूटी कुर्सियाँ।
दूसरा—दीवारों पर उखड़ा हुआ रंग।
तीसरे में… एक पुरानी family photo टंगी थी।
सभी चेहरों पर खरोंच के निशान थे।
सिवाय एक छोटी बच्ची के।
आरव रुका।
“ये हमेशा ऐसा ही था क्या…?” उसने कैमरे में फुसफुसाया।
पीछे से हल्की आवाज़ आई—
“आप… मेरी माँ को ढूंढने आए हैं…?”
आरव ने मुड़कर देखा।
दरवाज़े के पास वही बच्ची खड़ी थी।
सफेद फ्रॉक, हाथ में पुरानी गुड़िया।
आँखें… अजीब थीं।
पूरी काली नहीं—पर खाली।
“तुम यहाँ रहती हो?”
आरव ने पूछा।
बच्ची ने सिर हिलाया।
फिर उसका हाथ पकड़ लिया।
उसका हाथ ठंडा नहीं था।
बस… बिल्कुल हल्का।
“माँ नीचे है,” उसने कहा।
तहखाने की सीढ़ियाँ अंधेरी थीं।
हर कदम पर धूल उड़ती… और आवाज़ ज़्यादा गूंजती।
नीचे एक छोटा-सा कमरा था।
कोने में लकड़ी का संदूक।
बच्ची ने इशारा किया—
“माँ की चीज़ें।”
आरव ने संदूक खोला।
अंदर कपड़े, कुछ पुराने कागज़… और एक डायरी।
उसने पहला पन्ना खोला।
“घर अब घर नहीं रहा…
उसने हम सबको ख़ामोश कर दिया।
मेरी बेटी अभी भी पूछती है—मैं कहाँ हूँ…”
आरव ने पन्ना पलटा।
“जो भी यहाँ आता है…
वो उसे अपना समझ लेती है।
शायद उसे सच कभी समझ नहीं आया…”
आरव ने डायरी बंद कर दी।
कमरे में अचानक कुछ नहीं बदला—
पर खामोशी भारी हो गई।

बच्ची अब उसके बिल्कुल पास खड़ी थी।
“आपको मिल गई माँ?”
उसने पूछा।
आरव कुछ सेकंड चुप रहा।
“नहीं… यहाँ कोई नहीं है,” उसने धीरे से कहा।
बच्ची ने उसकी तरफ देखा।
जैसे पहली बार ध्यान से देख रही हो।
फिर बहुत हल्की आवाज़ में बोली—
“सब यही कहते हैं…”
आरव ने कुछ नहीं कहा।
सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा।
तभी बच्ची ने उसका हाथ फिर से पकड़ लिया।
इस बार पकड़ थोड़ी मजबूत थी।
“आप भी चले जाओगे…?”
आरव रुक गया।
उसने पलटकर बच्ची को देखा—
वो मुस्कुरा नहीं रही थी।
बस इंतज़ार कर रही थी।
ऊपर कहीं कोई दरवाज़ा हल्का-सा हिला।
हवा नहीं थी… फिर भी।
आरव ने अपना हाथ धीरे से छुड़ाया।
कुछ सेकंड लगे।
फिर वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
बच्ची नीचे खड़ी रही।
आवाज़ नहीं लगाई।
बस देखती रही।
सुबह…
हवेली का गेट खुला था।
बाहर सड़क वैसी ही खाली।
अंदर… धूल वैसी ही जमी हुई।
बस तहखाने की सीढ़ियों पर
एक नया पैरों का निशान था—
छोटा…
और उसके साथ एक बड़ा।
और ऊपर तीसरी मंज़िल की टूटी खिड़की पर—
इस बार परछाईं नहीं थी।
जैसे कोई…
अब नीचे ही रह गया हो।

— InnaMax StoryLab
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