बेटे की Drawing — जिसमें Papa थे, लेकिन घर में नहीं
कभी-कभी बच्चे जो draw करते हैं, वो imagination नहीं — उनकी reality होती है।
और वो reality, बड़े लोगों को चुप कर देती है।
Rohit को drawing bag में मिली।
Veer की school bag — जो वो हर शुक्रवार रात घर से ले जाता था Delhi जाने से पहले। Monday morning flight थी। यह routine था — दो साल से।
Bag खोली। Tiffin था, water bottle थी, एक copy थी।
और एक drawing।
Crayon से बनी थी। A4 paper पर।
ऊपर लिखा था — “My Family।” Teacher की handwriting थी — शायद title उन्होंने लिखा था।
Drawing में चार लोग थे।
एक लंबा figure — Papa। एक थोड़ा छोटा — Mama। एक और छोटा — Veer खुद। और एक छोटा गोल figure — नीचे लिखा था “Biscuit” — वो घर का कुत्ता था।
सब एक घर के सामने खड़े थे।
घर के ऊपर सूरज था।
और Papa का figure — घर के बाहर था। सबसे दूर। घर की boundary के पास।
Veer ने Papa को family में रखा था — लेकिन घर के अंदर नहीं।

Rohit काफी देर तक वो drawing देखता रहा।
5 साल के बच्चे को नहीं पता था उसने क्या draw किया।
उसने वो draw किया जो उसने देखा था — Papa family का हिस्सा हैं। लेकिन हमेशा घर में नहीं होते।
यह बात किसी ने नहीं बताई थी Veer को। यह उसकी reality थी। और उसने वो reality draw की।
Rohit Monday को office गया।
Tuesday। Wednesday।
बीच में Veer का call आया — “Papa, school में drawing competition है।”
“अच्छा। क्या बनाओगे?”
“नहीं पता। आप बताओ।”
“घर बनाओ।”
“कैसा घर?”
Rohit ने एक second सोचा।
“वो वाला — जिसमें हम सब हों।”
“आप भी?”
“हाँ। Main bhi।”
Veer ने phone पर सोचा।
“Theek hai।”
उस weekend Rohit जल्दी लौटा।
Friday शाम की flight ली — usually Sunday आता था।
घर पहुँचा तो Veer सो चुका था।
Rohit उसके कमरे में गया। वो सोया हुआ था। Drawing board पर एक नई drawing थी — अधूरी।
एक घर था। कुछ figures थे।
Papa का figure — इस बार घर के अंदर था।
Rohit ने drawing रखी। Veer का माथा एक बार देखा।
वो सो रहा था।
Rohit वापस गया। माँ के कमरे में।
“जल्दी आ गए?”
“हाँ।”
“सब ठीक है?”
“हाँ।” एक pause। “बस आना था।”

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