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पापा की घड़ी — Appraisal Day और एक पुरानी याद

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पापा की घड़ी — Appraisal Day और एक पुरानी याद
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उस सुबह Rohan ने drawer खोला —

घड़ी वहीं थी — जहाँ उसने छह महीने पहले रखी थी।

HMT की वो पुरानी घड़ी।
पापा वाली।


आज office में appraisal था।

HR का email कल रात आया था —
“Tomorrow, 11 AM, your manager’s cabin।”

Rohan सुबह से तैयार हो रहा था।

Suit press किया हुआ था।
Shoes polished थे।
सब कुछ ready था।

बस वो घड़ी पड़ी थी।
और उसने उठा ली।


पापा ने वो घड़ी 1987 में खरीदी थी।
पहली salary से।

यह बात Rohan को माँ ने बताई थी —
पापा ने खुद कभी नहीं बताई।

वो ऐसे नहीं थे।

घर में उनकी आवाज़ तब सुनाई देती थी —
जब news आती थी,
या जब बिजली का bill बहुत ज़्यादा आता था।


जब Rohan का result आता था,
पापा बस एक नज़र देखते थे।

अच्छा था तो चाय पीते रहते थे।
बुरा था तो भी चाय पीते रहते थे।

एक बार — सिर्फ एक बार —
10th board में 91% आए थे।

पापा ने कहा था,
“ठीक है।”

बस इतना।

लेकिन उस रात
Rohan की पसंद की मिठाई घर में थी।

बिना बताए।
बिना कोई reason बताए।

उस वक्त समझ नहीं आया था।
अब आता है।


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वो ज़्यादा बोलते नहीं थे — लेकिन होते हमेशा थे।

Rohan ने घड़ी पहनी।

थोड़ी tight थी —
पापा की कलाई उसकी से पतली थी।

Auto पकड़ा।
Traffic में फँसा।

और तभी याद आया —
वो आखिरी सुबह
जब पापा ने उसे office जाते देखा था।

Rohan की पहली job थी।
एक छोटी startup।
Salary कम थी, role exciting था।

पापा दरवाज़े पर खड़े थे।
बनियान में।
चाय का कप हाथ में।

Rohan ने जूते पहने,
bag उठाया,
और निकल गया।

पीछे मुड़कर नहीं देखा।


अब सोचता है —
काश देखता।

शायद पापा कुछ कहते।
शायद बस खड़े रहते।

लेकिन उस एक नज़र में —
शायद सब कुछ था।

वो मौका नहीं आएगा।


11 बजे manager के cabin में बैठा था।

Manager बोल रहे थे —
percentages, ratings, increments।

Rohan सुन रहा था।
लेकिन एक हाथ घड़ी पर था।

Result अच्छा निकला।

Manager ने हाथ मिलाया —
“Well done, Rohan। You’ve earned this।”

Rohan ने कहा,
“Thank you, sir।”


Cabin से निकला।

Washroom गया।
Mirror के सामने खड़ा हुआ।

एक लम्हे के लिए
सिर्फ घड़ी को देखा।

पापा —

यह increment
आपकी पूरी salary से ज़्यादा होती।


आँखें भर आईं।

यह feeling जानी-पहचानी थी,
लेकिन हर बार नई लगती है —

जब कुछ अच्छा होता है —
और वो नहीं होते
जिन्हें बताना था।


शाम को घर लौटा।

माँ ने दरवाज़ा खोला।
“Appraisal कैसा गया?”

“ठीक था,” Rohan ने कहा।

“बस ठीक?”
माँ ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा था।”
Rohan भी मुस्कुराया।


तभी माँ की नज़र घड़ी पर गई।
एक पल के लिए रुकीं।

“पापा की घड़ी है।”

Rohan ने हाँ में सर हिलाया।

माँ ने कुछ नहीं कहा।
Kitchen में चली गईं।


रात को खाना खाते वक्त —
बिना किसी context के, बीच में —

माँ ने quietly कहा,
“वो बहुत खुश होते आज।”


Rohan ने एक बार घड़ी को देखा।
फिर अपनी plate को।

“हाँ,” उसने कहा।

बस इतना।


कभी-कभी
दो शब्द में पूरी बात होती है।


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कुछ बातें कहने की नहीं होतीं — बस महसूस होती हैं।

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