दादाजी का आख़िरी खत — कुछ बातें देर से पहुँचती हैं
घर खाली करते वक्त Arjun को दादाजी का लिखा एक खत मिलता है — एक ऐसी बात, जो सालों पहले कही जानी थी, लेकिन कभी कही नहीं गई। एक simple message — “तुम ठीक हो” — जो generations के बीच की दूरी को धीरे से बदल देता है।
Arjun को घर खाली करना था।
दादाजी तीन महीने पहले गए थे। घर अब बेचना था — परिवार का decision था। Arjun आया था दो दिन के लिए — सामान sort करने, जो रखना हो वो रखना, जो नहीं वो जाने देना।
पहला दिन आसान था। Furniture को list किया। पुराने बर्तन थे — कुछ माँ ले गईं, कुछ छोड़ दिए। Books थीं — दादाजी को पढ़ने का शौक था। वो Arjun ने खुद रखीं।
दूसरे दिन वो अलमारी तक पहुँचा।
अलमारी पुरानी थी। Teak की। दादाजी ने खुद बनवाई थी — 1974 में, जब यह घर नया था।
ऊपर की shelf पर कपड़े थे — नीचे documents। Birth certificates, पुरानी policies, कुछ photographs।
और एक envelope।
Yellow पड़ चुका था। Sealed नहीं था — बस मुड़ा हुआ था। ऊपर कुछ लिखा था — एक नाम।
Arjun का नाम।
उसने envelope उठाया। Handwriting दादाजी की थी — थोड़ी काँपती हुई।
अंदर एक letter था।
“Arjun,
यह खत तुम्हें देना था — जब तुमने पहली job छोड़ी थी। याद है? 2019 में।
सबने कहा था — गलती की। मैंने भी सोचा था — कहूँगा।
लेकिन फिर नहीं कहा।
तुमने जो किया — वो सही था।
…
तुम ठीक हो, Arjun।
…
तुम अकेले नहीं हो।
…
— दादाजी”

Arjun काफी देर बैठा रहा।
Floor पर। Teak की अलमारी के सामने। हाथ में letter।
…
2019 याद था उसे।
पहली job थी — एक बड़ी company में। Salary अच्छी थी। लेकिन काम वो नहीं था जो करना था।
छह महीने में छोड़ दी।
घर में हंगामा हुआ था।
…
दादाजी ने कुछ नहीं पूछा था।
बस चाय पिलाई थी। खाना खिलाया था। और जाते वक्त कंधे पर हाथ रखा था — एक पल के लिए।
बस इतना।
…
नहीं थे।
Letter Arjun ने दूसरी बार पढ़ा।
फिर तीसरी बार।
“तुम ठीक हो, Arjun।”
और इतने साल लग गए यह पहुँचने में।
एक बंद envelope के through।
एक खाली होते घर में।
Train में वापस जाते हुए — रात को — Arjun ने letter फिर निकाला।
…
उसने अपने पापा को call किया।
“कुछ नहीं पापा। बस — ऐसे ही।”
…
Arjun मुस्कुराया।
कुछ चीज़ें एक generation में नहीं बदलतीं।
लेकिन कुछ —
बहुत छोटी सी — शायद शुरू हो जाती हैं।





