चाचा की पुरानी Cycle — एक खामोश त्याग

कभी-कभी सबसे बड़े sacrifices वो होते हैं, जो उस समय समझ नहीं आते। और जब सालों बाद उनकी सच्चाई सामने आती है, तब कहने के लिए कुछ बचता नहीं—सिर्फ महसूस होता है।
Workshop के उस कोने में वह cycle खड़ी थी।
धूल की एक पतली layer handle पर जम चुकी थी। Tyre आधे पिचके हुए थे। Chain जंग खा चुकी थी — लेकिन घंटी…
Rohan ने उंगली से हल्का दबाया।
ट्रिन…
आवाज़ वैसी ही थी। साफ। सीधी। जैसे बीच में कुछ बदला ही नहीं।
पीछे से आवाज़ आई —
“हाथ गंदे हो जाएंगे।”
Rohan ने मुड़कर देखा।
चाचा दरवाज़े के पास खड़े थे। Shirt की sleeves मोड़ी हुई, हाथों पर grease लगा हुआ।
“यह अभी भी यहीं है?” Rohan ने पूछा।
चाचा ने एक नज़र cycle पर डाली।
“पुरानी चीज़ें जल्दी जाती नहीं।”
Rohan हल्का सा मुस्कुराया।
उसे याद था — यह cycle यहाँ नहीं होनी चाहिए थी।
Class 8 में था वह।
Fees जमा करने की आखिरी तारीख थी। Papa उस महीने hospital में थे। घर में पैसे नहीं थे।
उस सुबह चाचा जल्दी उठे थे।
Cycle को बाहर निकाला था। Seat पर हाथ फिराया था — जैसे कुछ सोच रहे हों।

“कहाँ जा रहे हो?” Rohan ने पूछा था।
“बस… आता हूँ।”
शाम को जब लौटे, cycle साथ नहीं थी।
और Rohan के हाथ में receipt थी।
उस दिन किसी ने कुछ नहीं पूछा।
किसी ने कुछ नहीं बताया।
बस अगले दिन से Rohan फिर school जाने लगा।
“आपने तो कहा था बेच दी थी,” Rohan ने धीरे से कहा।
चाचा ने toolbox बंद किया।
“हाँ, बेची थी।”
“तो फिर…?”
कुछ seconds तक सिर्फ fan की आवाज़ थी।
चाचा ने पास आकर cycle के handle पर हाथ रखा।
उँगलियों से जमी हुई धूल को हल्का सा हटाया।
“जिसे बेची थी… उसका बेटा अब यह workshop चलाता है।”
Rohan चुप रहा।
“वो एक दिन आया। बोला — ‘चाचा जी, यह आपकी cycle है।’”
“आपने ले ली?”
चाचा हल्का सा हँसे।
“मना किया था।”
“फिर?”
“उसने भी नहीं माना।”

दोनों कुछ देर cycle को देखते रहे।
Metal ठंडा था।
लेकिन उस ठंड में भी कुछ था — जो सीधा सीने तक जा रहा था।
Rohan ने handle पकड़ा।
उँगलियों के नीचे वही पुराना rubber grip था — थोड़ा घिसा हुआ।
“आपने कभी बताया नहीं,” उसने कहा।
चाचा ने उसकी तरफ देखा नहीं।
बस सामने दीवार पर टंगे पुराने calendar को देखते रहे।
“बताने वाली बात नहीं थी, बेटा,” उन्होंने धीरे से कहा,
“करने वाली थी।”
बाहर शाम हो चुकी थी।
Workshop की half shutter नीचे आ चुकी थी।
Rohan ने एक पुराना कपड़ा उठाया।
Cycle की frame पर जमी धूल को साफ करने लगा।
हर stroke के साथ थोड़ा-थोड़ा metal चमकने लगा।
चाचा कुछ नहीं बोले।
बस पास खड़े रहे — जैसे कोई काम पहले से तय हो, और दोनों जानते हों।
“Tyre बदल देते हैं?” Rohan ने पूछा।
“चल जाएगी ऐसे ही,” चाचा ने कहा।
Rohan ने उनकी तरफ देखा।
“फिर भी…”
चाचा ने इस बार मना नहीं किया।
रात थोड़ी और गहरी हो गई थी।
Workshop में सिर्फ एक bulb जल रहा था।
Cycle अब पहले जैसी नहीं लग रही थी।
पूरी नई भी नहीं।
पूरी पुरानी भी नहीं।
बीच में कहीं।
Rohan ने घंटी फिर से दबाई।
ट्रिन…
इस बार आवाज़ थोड़ी अलग लगी।
या शायद… सुनने वाला बदल गया था।
“चाचा…”
“हूँ?”
“कल से मैं shop पर आ जाऊँ?”
चाचा ने सीधा जवाब नहीं दिया।
बस tools वापस जगह पर रखने लगे।
“College?”
“Manage हो जाएगा।”
कुछ seconds बाद चाचा ने कहा —
“सुबह 9 बजे shutter उठता है।”
Rohan ने सिर हिला दिया।
उस रात वह घर देर से पहुँचा।
हाथों पर grease था।
नाखूनों के नीचे काली लाइनें थीं।
माँ ने देखा — कुछ पूछने वाली थीं… फिर नहीं पूछा।
Rohan ने हाथ धोए बिना ही पानी पिया।
फिर बाहर balcony में आकर खड़ा हो गया।
नीचे सड़क पर कुछ cycles खड़ी थीं।
सब अलग थीं।
लेकिन अचानक सब एक जैसी लगने लगीं।
Workshop में, shutter के पीछे,
वह पुरानी cycle अब भी खड़ी थी।
Tyre अभी भी पूरे नहीं भरे थे।
लेकिन handle…
अब पहले से साफ था।और घंटी —
वो अब भी वैसे ही बजती थी।

यह भी पढ़ें:
— दो दोस्त — एक शहर, दस साल बाद
— माँ का पुराना दर्पण — जो हर सुबह का गवाह था
— बेटे की Drawing — जिसमें Papa थे, लेकिन घर में नहीं
— भाई की शादी में बहन — खुशियों के बीच चुपचाप बदलता एक रिश्ता




