WA
Breaking News और ज़रूरी updates — सीधे WhatsApp पर
InnaMax News WhatsApp Channel join करें
Join WhatsApp
StoryLab

बनारस घाट — रात का मुसाफ़िर और एक मिट्टी की नाव


रात के 2 बजे। घाट पर एक बूढ़ा मिला।
सुबह वह नहीं था — लेकिन कुछ छोड़ गया था।

A StoryLab Original — InnaMax


Arjun पहली बार बनारस आया था।
काम का काम था — दो दिन, एक meeting, और फिर वापस Delhi।

लेकिन उस रात होटल में नींद नहीं आई।
घड़ी ने 2 बजाए — और वह बाहर निकल गया।

घाट पर पहुँचते ही उसे कुछ अलग महसूस हुआ।

Ganga बिलकुल थमी हुई थी।
ना कोई लहर। ना कोई आवाज़।

एक-एक करके दीये बुझ रहे थे —
जैसे कोई अदृश्य साँस उन्हें छू रही हो।

और तभी Arjun ने उसे देखा।

एक बूढ़ा आदमी
पहली सीढ़ी पर बैठा हुआ।

सफेद धोती। सिर पर हल्का सा गमछा।
हाथ में कुछ था — मिट्टी की कोई छोटी चीज़।

Arjun थोड़ा रुका।
फिर जाकर उससे थोड़ी दूरी पर बैठ गया।

“पहली बार आए हो?”

उसकी नज़र Ganga पर ही थी।

“हाँ… काम से।”

“काम बनारस नहीं लाता,”
वह बोला,
बनारस खुद बुलाता है।

Arjun चुप रहा।

कुछ मिनट बीत गए।
एक और दिया बुझ गया।

“आप रोज़ आते हैं यहाँ?”

“मैं… हमेशा यहीं हूँ।

Arjun को हल्का सा अजीब लगा।

उसने ध्यान से देखा —
बूढ़े के हाथ में एक छोटी मिट्टी की नाव थी।

कच्ची।
जैसे किसी बच्चे ने बनाई हो।

“ये क्या है?”

बूढ़े ने पहली बार उसकी तरफ देखा।

उसकी आँखें…
समझ नहीं आ रही थीं।

उनमें रोशनी नहीं थी —
लेकिन अंधेरा भी नहीं।

जैसे वे कहीं और देख रही हों।

“हर इंसान जो यहाँ आता है,”
वह बोला,
“कुछ छोड़ कर जाता है… और कुछ लेकर जाता है।”

“और ये नाव?”

“ये उनके लिए है —
जो दोनों नहीं कर पाते।”

“मतलब?”

“जो आते हैं… और जाना नहीं चाहते।
और जो जाते हैं… लेकिन लौटना चाहते हैं।”

Arjun ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन अचानक उसे लगा —
जैसे कोई पुरानी बात उसके अंदर जाग रही हो।

“मेरे पापा भी यहाँ आए थे…”

“कई साल पहले।”

“उन्होंने कभी नहीं बताया क्यों।”

उसकी आवाज़ बदल गई थी।

“मैं उनसे पूछ नहीं पाया…”
“वो… चले गए।”

Ganga पर एक हल्की लहर आई।
फिर सब शांत।

“जो पूछना है — पूछ लो।

Arjun ने उसकी तरफ देखा—

कोई नहीं था।

सीढ़ी खाली थी।

बस वही मिट्टी की नाव पड़ी थी।


Small handmade clay boat with diya on wet stone steps at night in Banaras
एक छोटी सी मिट्टी की नाव। अभी भी गीली।

Arjun ने उठने की कोशिश की।
पैर भारी लग रहे थे।

डर नहीं था।
बस एक अजीब गहराई थी।

उसने नाव उठा ली।

मिट्टी अभी भी गीली थी।

अभी भी गीली।


सुबह जब उसकी आँख खुली—
वह होटल के कमरे में था।

और नाव…
अब भी उसके हाथ में थी।

वह काफी देर तक खिड़की के पास बैठा रहा।
Ganga दूर दिख रही थी।

फिर उसने फोन उठाया।
माँ का नंबर dial किया।

“Arjun?”

“माँ… पापा बनारस क्यों आए थे?”

कुछ पल चुप्पी रही।

“तुम्हें कैसे पता?”

“बस… पता चल गया।”

माँ ने धीरे से कहा—

“वो तुमसे मिलना चाहते थे…
पहले… जब तुम छोटे थे।”

“किसी ने कहा था —
बनारस में मन्नत माँगने से… शायद सब ठीक हो जाए।”

“लेकिन वो डर गए।”

“आए… माँगा…
और फिर चले गए।”

Arjun ने आँखें बंद कर लीं।

सालों से उसके मन में एक ही सवाल था—
वो गए क्यों।

आज पहली बार दूसरा सवाल आया—

वो आए क्यों।

उसने हाथ देखा।

नाव अब भी वहीं थी।

मिट्टी थोड़ी सूख चुकी थी।

लेकिन वह जानता था—
रात को…

वह गीली थी।


आज भी कभी-कभी—
वह रात याद आती है।

बनारस का वो बूढ़ा आदमी…
कौन था—

Arjun ने कभी जानने की कोशिश नहीं की।

कुछ चीज़ें समझने के लिए नहीं होतीं।

कुछ चीज़ें बस महसूस होती हैं।


Dried clay boat on wooden shelf in Delhi room with warm evening light
अब सूख चुकी है… लेकिन कभी-कभी फिर भी गीली लगती है।

वो नाव अब Delhi में है।
उसकी study shelf पर।

मिट्टी पूरी तरह सूख चुकी है।

लेकिन…

कभी-कभी रात को—
वह थोड़ी गीली लगती है।


— InnaMax StoryLab


यह भी पढ़ें:

— दो दोस्त — एक शहर, दस साल बाद

— माँ का पुराना दर्पण — जो हर सुबह का गवाह था

— बेटे की Drawing — जिसमें Papa थे, लेकिन घर में नहीं

— भाई की शादी में बहन — खुशियों के बीच चुपचाप बदलता एक रिश्ता


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

⚡ TODAY
👉 BUT WHY...? हम inspired तो होते हैं…लेकिन consistency क्यों नहीं रख पाते? 👉 “उठो, जागो और तब तक मत रुको…” — स्वामी विवेकानंद → आज का सुविचार