मज़दूर बाप की थकान — Labour Day पर एक बेटे की समझ
हर बाप की थकान दिखती नहीं… पर हर बेटे को एक दिन समझ आती है।
— InnaMax StoryLab
Suresh के हाथ में लकीरें थीं।
गहरी। काली पड़ गई थीं सालों की मेहनत से। Cement की धूल — जो कभी पूरी तरह साफ नहीं होती।
आज Rahul का पहला दिन था — office में।
AC. Computer. Swivel chair. Formal shirt — जो उसने रात में press की थी।
शाम को घर आया तो Suresh खाना बना रहा था।
Dal. Chawal. वही जो रोज़ बनता था।
“कैसा रहा?” Suresh ने पूछा।
(पीठ की तरफ़ ।)
“Theek था, Papa। थका देने वाला।”
Suresh मुस्कुराए।
पीठ अभी भी घूमी हुई थी।
“थकान कैसी होती है — office में?”
Rahul ने सोचा।
“पता नहीं… सिर भारी रहता है। आँखें screen पे अटक जाती हैं।”

Suresh ने dal चलाते हुए कहा —
“हमारी थकान हाथ में आती है…
तुम्हारी दिमाग में आएगी।”
फिर कुछ नहीं बोला।
Dal ready थी।
दोनों बैठे। खाया।
उस रात Rahul ने अपने Papa के हाथ देखे —
पहली बार ध्यान से।
हर लकीर में कुछ था।
जो उसने कभी पढ़ा नहीं था।
जो किसी book में नहीं था।
Suresh के हाथ ने एक घर बनाया था।
एक बेटे का future बनाया था।
और वो हाथ…
कभी नहीं बोले — कि कितना किया।

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