Banarasi paan की Economy — ₹20 का बनारसी पान — ₹5 किसका, और बाकी पैसा कहाँ जाता है?
Varanasi में रोज़ ₹1 करोड़ का पान बिकता है।
₹20 के एक पान में 20+ ingredients लगते हैं— लेकिन पानवाले के हाथ में बचते हैं सिर्फ ₹5–7।
सवाल यह नहीं है कि पान महंगा है या सस्ता।
सवाल यह है कि इतनी बड़ी economy में असली कमाई किसकी हो रही है।
— InnaMax News Desk | Economy Feature
शाम के छह बज रहे हैं।
Dashashwamedh Ghat के पास वाली गली में
रामजी भाई की दुकान पर queue लगी है।
Tourist camera लेकर खड़ा है।
Local बिना देखे order दे रहा है।
Banaras में पान सिर्फ खाया नहीं जाता— यह रोज़मर्रा की आदत का हिस्सा है।
लेकिन रामजी भाई एक ऐसी बात जानते हैं
जो tourist कभी नहीं समझ पाता।
₹20 का एक मीठा पान
बनता है 23 अलग-अलग चीज़ों से—
पत्ता, सुपारी, कत्था, चूना, flavour, मसाले।
और दिन के अंत में—
जब दुकान बंद होती है—
कमाई उतनी नहीं होती,
जितनी बाहर से दिखती है।
यह कहानी है उसी ₹20 के पान की।
खेत से लेकर गली तक,
supplier से लेकर seller तक—
Banarasi paan की पूरी economy कैसे चलती है,
और उसमें असली पैसा कौन कमाता है— आइए समझते हैं।

Banaras में पान — सिर्फ परंपरा नहीं, ₹1 crore रोज़ की economy है
Varanasi में रोज़ ₹1 crore से ज़्यादा का पान बिकता है।
यह कोई अनुमान नहीं—यह calculation है।
शहर की 25 से 30 लाख की आबादी में
एक बड़ा हिस्सा रोज़ पान खाता है।
और इस पूरे business से
10,000 से ज़्यादा लोग जुड़े हुए हैं।
पान शब्द Sanskrit के “पर्ण” से आया है—
यानी पत्ता।
लेकिन बनारसी पान सिर्फ पत्ता नहीं है।
यह एक पूरी supply chain है—
किसान से Pan Dariba तक,
Pan Dariba से पानवाले तक,
और पानवाले से आपके मुंह तक।
April 2023 में बनारसी पान को GI tag मिला।
यानी यह अब officially एक recognized heritage product है।
Varanasi के GI products—पान और silk—
मिलाकर सालाना ₹25,500 crore का revenue generate करते हैं।
लेकिन इस ₹25,500 crore में
रामजी भाई का हिस्सा कितना है— यही इस कहानी का असली सवाल है।
₹20 के बनारसी पान में क्या-क्या लगता है — पूरा हिसाब
एक मीठा बनारसी पान सिर्फ पत्ता नहीं होता—
इसमें 20+ ingredients का mix होता है।
gulkand, coconut, tutti-frutti, silver vark,
cardamom, rose water, peppermint और कई herbs—
यानी हर पान एक छोटा सा flavour package है।
अब सवाल—
₹20 के इस पान में असल खर्च कितना होता है?
यह रहा एक rough cost breakdown:
- Packaging + toothpick — ₹0.50
- पत्ता (betel leaf) — ₹1.50 से ₹2
- Gulkand — ₹1
- Coconut + tutti-frutti — ₹1.50
- Elaichi + saunf — ₹1
- Chuna + katha — ₹0.50
- Silver vark — ₹1.50
₹20 के पान में raw material सिर्फ ₹7–₹8 — बाकी कहाँ जाता है?
₹20 के एक पान में raw material की लागत लगभग ₹7–₹8 बैठती है।
यानि बचते हैं ₹12–₹13।
लेकिन यही असली कमाई नहीं है।
इसमें से निकलता है— दुकान का किराया, बिजली,
और अपनी मेहनत का खर्च।
आखिर में, एक ₹20 के पान पर पानवाले के हाथ में बचते हैं सिर्फ ₹5–₹7।
अगर दिन में 200 पान बिकते हैं —
तो रोज़ की net earning होती है ₹1,000 से ₹1,400।
और महीने में यह बनती है लगभग ₹30,000 से ₹42,000।
ऊपर से दिखता है ₹20 का पान— अंदर से बचता है सिर्फ ₹5।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
रामजी भाई सिर्फ ₹20 वाला पान नहीं बेचते।

₹5 vs ₹5,000 — बनारसी पान में इतना फर्क क्यों?
यह गलत नहीं पढ़ा आपने।
बनारसी पान की कीमत
₹5 से ₹5,000 तक जाती है—
ingredients, craftsmanship और exclusivity के हिसाब से।
अब price range समझिए:
₹5,000 का “Death Paan” — gold vark, premium dry fruits, rare spices
₹5 का सादा पान — chuna, katha, supari — basic
₹20–₹50 का meetha पान — gulkand, silver vark, dry fruits
₹200–₹500 का special पान — केसर, real silver, premium ingredients
यहाँ असली खेल शुरू होता है।
Premium पान में margin बेहतर होता है।
₹500 के पान में raw material ₹80–₹100—यानी ~80% margin।
यानी quantity नहीं, quality और positioning पैसा बनाती है।
Dashashwamedh Ghat, Godowlia और Assi Ghat के premium पानवाले
ज्यादा कमाते हैं—
और अंदर की गलियों वाले अक्सर struggle करते हैं।
Location ही destiny बन जाती है।
Banaras में पान की दुकान का भी यही सच है।
किसान से Pan Dariba तक — पान का असली सफर जो आप नहीं देखते
पान का पत्ता Varanasi में नहीं उगता—
यह आता है दूर-दराज़ के इलाकों से।
बनारसी पान की खेती मुख्य रूप से
Jaunpur, Chandauli, Ballia, Ghazipur, Azamgarh, Mirzapur और Sonbhadra में होती है।
200 पत्तों के bundle को
“ढोली” कहा जाता है।

किसान को क्या मिलता है?
यह Varanasi का Pan Dariba
सबसे बड़ा wholesale market है—
यहीं से पूरे Purvanchal के पानवाले खरीदते हैं।
यहाँ price demand के साथ बदलता है:
- Slow market: ₹150–₹300
- Peak demand: ₹800–₹1,000
यानी एक ही basket की कीमत
3x तक बदल सकती है।
अब सवाल— इसमें किसान को क्या मिलता है?
यही margin का पुराना खेल है—
जो दाल में था,
जो दूध में था,
जो आम में था।
Flow समझिए:
खेत → ढोली → Pan Dariba → पानवाला → आप
हर step पर कोई न कोई margin लेता है।
सबसे कम हिस्सा जाता है—किसान को।
सबसे ज़्यादा कमाता है—
वह जो ghat पर सबसे visible जगह बैठा है।
Banaras में पान का boom — लेकिन किसके लिए?
2024 में Varanasi में
11 करोड़ tourists आए—
यानी 18.7% की बढ़ोतरी।
International visitors भी
2021 से 2024 के बीच
120 गुना बढ़ चुके हैं।
यह पानवाले के लिए
एक बड़ी opportunity है।
Chocolate पान, ice cream पान, fire पान—
modern fusion varieties तेजी से popular हो रही हैं।
Tourist इन्हें ज़्यादा order करता है,
photo खींचता है,
और social media पर share करता है।
यानी demand बढ़ रही है—
और पान एक experience product बनता जा रहा है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है।
Franchise model आ चुका है।
Banarasi Paan Bhandar जैसे brands
₹2.5 लाख में franchise दे रहे हैं।
Mall में पान।
Airport पर पान।
यह scale है—
लेकिन इसमें
रामजी भाई जैसे local पानवाले की जगह कहाँ है?
GI tag तो मिल गया—
लेकिन उसका benefit अभी तक
छोटे पानवाले तक नहीं पहुंचा।
₹20 का पान — लेकिन इसकी असली कीमत क्या है?
अगली बार जब आप बनारसी पान खाएं — या किसी को खिलाएं —
तो एक second रुकिए।
उस ₹20 में
एक किसान है — जिसने पत्ता उगाया।
एक middleman है — जो Pan Dariba में बैठा है।
एक पानवाला है — जो सुबह 10 बजे से रात 11 बजे तक खड़ा रहता है।
“खाइके पान बनारस वाला” — यह सिर्फ song नहीं है।
यह एक पूरी economy है।
जिसमें सबसे ज़्यादा मेहनत करने वाले को सबसे कम मिलता है।

Tourism बढ़ा है— लेकिन कमाई बराबर नहीं बढ़ी।
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आपके शहर की कौन सी dish यही कहानी कहती है?
आपके शहर में कौन सा खाना है जिसकी economy यही कहानी कहती है?
जहाँ ग्राहक ₹20 देता है — लेकिन असली मेहनत करने वाले को कितना मिलता है?
👇 Comment में बताइए — हम उस कहानी को भी बताएंगे।




