But Why…? क्यों हम change दूसरों से expect करते हैं… खुद से नहीं?
हम change चाहते हैं, लेकिन expecting others to change हमारी default habit बन जाती है।
क्यों हम खुद से शुरुआत करने से बचते हैं?
— InnaMax News Desk
Mahatma Gandhi ने कहा था — “आप वो बदलाव बनिए…”
हमने quote तो याद रखा… लेकिन meaning शायद skip कर दिया।
क्योंकि real life में हम कुछ और ही करते हैं।
हम सोचते हैं…
“अगर वो थोड़ा बदल जाए तो सब ठीक हो जाएगा।”
“अगर situation better हो जाए तो मैं भी बदल जाऊँगा।”
“अगर लोग समझें तो मैं भी improve कर सकता हूँ।”
मतलब simple है —
हम change चाहते हैं… पर responsibility नहीं।
और ये इतना common है कि हमें गलत भी नहीं लगता।
कभी notice किया है…
हम दूसरों की गलतियाँ बहुत clearly देख लेते हैं।
लेकिन अपनी habits… अपने patterns… अपने reactions — वो invisible लगते हैं।
हम कहते हैं —
“वो rude है”
“वो careless है”
“वो समझता नहीं है”
लेकिन rarely कहते हैं —
“शायद मैं भी react जल्दी कर देता हूँ”
“शायद मैं भी communicate ठीक से नहीं करता”
क्यों?
क्योंकि खुद को बदलना uncomfortable होता है।

दूसरों को बदलने की expectation आसान है —
उसमें effort नहीं लगता, सिर्फ complaint लगता है।
लेकिन खुद को बदलना…
उसमें ego hurt होती है।
उसमें हमें मानना पड़ता है कि हम भी perfect नहीं हैं।
और यहीं से problem शुरू होती है।
हम सोचते हैं कि control बाहर है —
लोग, situations, circumstances।
जबकि reality ये है —
control सिर्फ अंदर है।
लेकिन अंदर देखना सबसे मुश्किल काम है।
क्योंकि वहाँ excuses नहीं चलते।
एक और subtle reason है…
जब हम दूसरों से change expect करते हैं,
तो हम खुद को “right” side पर रख लेते हैं।
मतलब…
अगर वो बदल जाए, तो मैं already ठीक हूँ।
ये एक emotional comfort देता है।
लेकिन इसी comfort की वजह से growth रुक जाती है।
क्योंकि change तब शुरू होता है…
जब हम ये मान लेते हैं कि “problem सिर्फ बाहर नहीं है।”
और शायद सबसे honest सवाल यही है —
क्या हम सच में change चाहते हैं…
या बस चाहते हैं कि दुनिया हमारे हिसाब से behave करे?
क्योंकि दोनों अलग चीज़ें हैं।
अगर हम सच में change चाहते हैं…
तो पहला step हमेशा uncomfortable होगा।
खुद को देखना पड़ेगा।
अपने patterns समझने पड़ेंगे।
अपनी reactions पर काम करना पड़ेगा।
और ये process slow होता है…
कोई instant result नहीं मिलता।
लेकिन यहीं असली shift होता है।
क्योंकि जब हम खुद बदलते हैं —
तो अक्सर situations भी बदलने लगती हैं।
लोग वही रहते हैं…
लेकिन हमारा response बदल जाता है।
और कई बार… यही enough होता है।
शायद problem ये नहीं है कि लोग नहीं बदलते…
शायद problem ये है कि हम खुद से शुरू नहीं करते।

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