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Tanushree Mishra: Banaras Gharana की युवा आवाज़

तनुश्री मिश्रा हारमोनियम के साथ — InnaMax Voice ऑडियो स्टोरी कवर
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Tanushree Mishra: Banaras Gharana की युवा आवाज़
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रात के आठ बज चुके थे।

दो घंटे का कार्यक्रम तय था।

लेकिन संगीत वहीं नहीं रुका।

चार घंटे बाद भी उनकी आवाज़ उसी सहजता से सभागार में गूंज रही थी। बाद में याद आया कि पूरे कार्यक्रम के दौरान cervical pain का एहसास तक नहीं हुआ था।

शायद यही live performance की सबसे बड़ी ताक़त होती है। जब कलाकार और श्रोता के बीच संवाद बन जाए, तो समय और थकान दोनों पीछे छूट जाते हैं।

वाराणसी की युवा शास्त्रीय एवं ग़ज़ल गायिका तनुश्री मिश्रा की कहानी केवल एक कलाकार की नहीं, बल्कि उस विरासत की भी है जो पीढ़ियों से सुर, साधना और अनुशासन के साथ आगे बढ़ती आई है। Banaras Gharana की चौथी पीढ़ी से आने वाली तनुश्री के लिए संगीत केवल पेशा नहीं, बल्कि परिवार की जीवित परंपरा है।

लेकिन विरासत मिल जाना और उसे अपने समय में सार्थक बनाए रखना—दोनों अलग बातें हैं। यही इस बातचीत का सबसे दिलचस्प हिस्सा भी है।

Tanushree Mishra
Classical & Ghazal Singer • Banaras Gharana • Varanasi

THE SNAPSHOT

  • ✓ Banaras Gharana की चौथी पीढ़ी की कलाकार, जिनके लिए संगीत विरासत भी है और ज़िम्मेदारी भी।
  • ✓ चार घंटे के Live Performance से लेकर वर्षों के अनुशासित रियाज़ तक, उनकी संगीत यात्रा की अनकही कहानी।
  • ✓ Classical Music, Ghazal और बदलते श्रोताओं के बीच संतुलन बनाने की उनकी सोच।
  • ✓ मंच, Studio और Music Therapy पर एक कलाकार का अलग नज़रिया।
  • ✓ परंपरा को निभाते हुए नई पीढ़ी तक शास्त्रीय संगीत पहुँचाने का उनका प्रयास।

क्या संगीत विरासत से मिलता है, या उसे हर पीढ़ी को फिर से कमाना पड़ता है?

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि अगर कोई कलाकार संगीत घराने से आता है, तो उसकी राह आसान हो जाती है। लेकिन तनुश्री मिश्रा इस धारणा से पूरी तरह सहमत नहीं हैं।

उनके लिए Banaras Gharana सिर्फ़ एक पहचान नहीं, बल्कि एक ऐसी ज़िम्मेदारी है जिसे हर दिन निभाना पड़ता है। विरासत आपको मंच तक पहुँचा सकती है, लेकिन मंच पर टिके रहने का रास्ता केवल वर्षों का रियाज़, अनुशासन और निरंतर सीखने की इच्छा ही बनाती है।

बचपन से ही उनके घर का माहौल संगीत से भरा हुआ था। सुबह के रियाज़ की ध्वनि, घर में होने वाली संगीत चर्चाएँ और गुरुओं का सान्निध्य—ये सब उनके लिए किसी विशेष आयोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी थे। धीरे-धीरे यही वातावरण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया।

“संगीत हमारे घर में कभी सिखाया नहीं गया, उसे जीया गया। बचपन से जो वातावरण मिला, वही मेरी सबसे बड़ी सीख है।” तनुश्री मिश्रा

यही कारण है कि उन्होंने संगीत को कभी केवल पेशे के रूप में नहीं देखा। उनके लिए यह साधना है, जिसमें हर प्रस्तुति पिछली प्रस्तुति से बेहतर होने की चुनौती भी साथ लेकर आती है।

लेकिन संगीत की इस यात्रा में विरासत के साथ एक और चुनौती भी जुड़ी रहती है—लोगों की अपेक्षाएँ। जब किसी कलाकार का परिचय किसी प्रतिष्ठित घराने से होता है, तो श्रोता सिर्फ़ एक अच्छी प्रस्तुति नहीं, बल्कि उस परंपरा की गरिमा भी सुनना चाहते हैं।

तनुश्री मानती हैं कि यही दबाव उन्हें लगातार बेहतर बनने के लिए प्रेरित करता है।


जब पहली तालियों ने रास्ता बदल दिया

हर कलाकार के जीवन में एक ऐसा मंच आता है जहाँ पहली बार यह एहसास होता है कि कला केवल अभ्यास का परिणाम नहीं, बल्कि लोगों के दिलों तक पहुँचने का माध्यम भी है।

तनुश्री मिश्रा के लिए भी ऐसा ही एक अनुभव उनकी शुरुआती प्रस्तुतियों में मिला।

मंच पर जाने से पहले घबराहट थी। क्या श्रोता पसंद करेंगे? क्या प्रस्तुति उम्मीदों पर खरी उतरेगी? ऐसे सवाल हर नए कलाकार के मन में आते हैं। लेकिन जैसे ही गायन शुरू हुआ, कुछ ही मिनटों में वह घबराहट सुरों में घुल गई।

प्रस्तुति समाप्त हुई तो तालियों की गूँज ने उन्हें एक नया आत्मविश्वास दिया। उसी दिन उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि संगीत केवल सीखने की चीज़ नहीं, बल्कि लोगों से जुड़ने की भाषा भी है।

इसके बाद मंच उनके लिए सिर्फ़ प्रदर्शन का स्थान नहीं रहा। हर कार्यक्रम एक नई सीख लेकर आया—कभी अलग तरह के श्रोता, कभी अलग माहौल और कभी ऐसी परिस्थितियाँ, जिन्होंने कलाकार के रूप में उन्हें और परिपक्व बनाया।

वर्षों बाद भी जब वे किसी नए मंच पर जाती हैं, तो वही उत्साह और वही ज़िम्मेदारी महसूस करती हैं।

“हर प्रस्तुति मेरे लिए नई होती है। श्रोता बदलते हैं, माहौल बदलता है, लेकिन ईमानदारी से गाना कभी नहीं बदलना चाहिए।” तनुश्री मिश्रा

यही सोच उनकी पूरी संगीत यात्रा की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभरती है।


जब रियाज़ आदत नहीं, जीवन का हिस्सा बन जाता है

शास्त्रीय संगीत में कोई शॉर्टकट नहीं होता। मंच पर दिखने वाली सहजता के पीछे वर्षों का अनुशासन छिपा होता है। तनुश्री मिश्रा मानती हैं कि रियाज़ केवल आवाज़ को बेहतर बनाने का अभ्यास नहीं, बल्कि खुद को लगातार निखारने की प्रक्रिया है।

उनके दिन की शुरुआत आज भी रियाज़ से होती है। यह केवल रोज़ की दिनचर्या नहीं, बल्कि वह आधार है जिस पर हर प्रस्तुति खड़ी होती है। उनके अनुसार, अगर अभ्यास रुक जाए तो कलाकार की यात्रा भी धीरे-धीरे ठहरने लगती है।

“रियाज़ ऐसा साथी है, जिसे जितना समय देंगे, वह उतना ही आपका साथ देगा। मंच पर आत्मविश्वास किसी एक दिन में नहीं आता, वह रोज़ की साधना से बनता है।” तनुश्री मिश्रा

वह मानती हैं कि शास्त्रीय संगीत में सीखना कभी समाप्त नहीं होता। हर नया राग, हर नई बंदिश और हर प्रस्तुति कलाकार को कुछ नया सिखाकर जाती है। यही कारण है कि वर्षों से मंच पर सक्रिय रहने के बावजूद वह खुद को आज भी एक विद्यार्थी मानती हैं।

उनके लिए संगीत केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और निरंतर सीखने की संस्कृति है। शायद यही वजह है कि उनकी बातचीत में उपलब्धियों से ज़्यादा अभ्यास की चर्चा सुनाई देती है।


Classical Music और बदलते दौर के बीच संतुलन

आज का संगीत पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से बदल रहा है। सोशल मीडिया ने कलाकारों को नए मंच दिए हैं, लेकिन साथ ही लोगों के सुनने का धैर्य भी कम किया है। ऐसे समय में शास्त्रीय संगीत को नई पीढ़ी तक पहुँचाना आसान नहीं है।

तनुश्री मिश्रा इस बदलाव को चुनौती नहीं, बल्कि अवसर की तरह देखती हैं।

उनका मानना है कि युवा श्रोता शास्त्रीय संगीत से दूर नहीं हैं, बल्कि उन्हें उससे जोड़ने का तरीका बदल गया है। अगर कलाकार परंपरा की आत्मा को बनाए रखते हुए संवाद की नई भाषा अपनाए, तो Classical Music आज भी उतना ही प्रासंगिक हो सकता है।

“समय बदलता है, श्रोता बदलते हैं, लेकिन संगीत का मूल भाव नहीं बदलता। ज़रूरत इस बात की है कि हम नई पीढ़ी तक उसी भाव को सही तरीके से पहुँचाएँ।” तनुश्री मिश्रा

इसी सोच के साथ वह Hindustani Classical के साथ-साथ Ghazal, Thumri और Dadra जैसी विधाओं को भी अपनी प्रस्तुतियों में स्थान देती हैं। उनके लिए यह परंपरा से समझौता नहीं, बल्कि उसी विरासत को नए श्रोताओं तक पहुँचाने का एक स्वाभाविक माध्यम है।

वह मानती हैं कि कलाकार का काम केवल मंच पर प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि श्रोताओं के भीतर संगीत के प्रति जिज्ञासा भी जगाना है। जब कोई युवा पहली बार किसी राग या ग़ज़ल को ध्यान से सुनता है, तभी शास्त्रीय संगीत की परंपरा आगे बढ़ती है।

यही सोच उनकी संगीत यात्रा को केवल व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा बना देती है.


मंच और Studio के बीच क्या बदल जाता है?

किसी भी कलाकार के लिए मंच और Recording Studio दो बिल्कुल अलग दुनिया हैं। बाहर से दोनों एक जैसे दिख सकते हैं, लेकिन तनुश्री मिश्रा के लिए दोनों का अनुभव अलग-अलग भावनाएँ लेकर आता है।

मंच पर कलाकार और श्रोता एक-दूसरे की ऊर्जा से जुड़े होते हैं। हर ताल, हर ताली और हर ख़ामोशी प्रस्तुति का हिस्सा बन जाती है। वहीं Studio में कलाकार का सबसे बड़ा संवाद अपने भीतर से होता है।

“Live Performance में श्रोता आपको उसी पल जवाब देते हैं। Studio में आपको खुद तय करना होता है कि आपने अपनी पूरी ईमानदारी दी है या नहीं।”
तनुश्री मिश्रा

वह मानती हैं कि मंच पर छोटी-सी गलती भी अगली ही पंक्ति में सुधारी जा सकती है, क्योंकि वहाँ संगीत बहता रहता है। लेकिन Recording Studio में हर सुर, हर शब्द और हर ठहराव को बार-बार सुनना और परखना पड़ता है।

यही वजह है कि दोनों अनुभव उन्हें अलग-अलग तरह से समृद्ध करते हैं। एक कलाकार को आत्मविश्वास देता है, तो दूसरा आत्ममंथन करना सिखाता है।


क्या संगीत सिर्फ़ सुनने की चीज़ है, या महसूस करने की भी?

तनुश्री मिश्रा का मानना है कि संगीत का असर केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। कई बार वही धुन, जो किसी के लिए एक प्रस्तुति होती है, किसी दूसरे के लिए सुकून का कारण बन जाती है।

वह कहती हैं कि शास्त्रीय संगीत को समझने के लिए उसका विशेषज्ञ होना ज़रूरी नहीं। ज़रूरी केवल इतना है कि श्रोता कुछ देर ठहरकर उसे सुनने का धैर्य रखे।

उनके अनुसार, तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में संगीत लोगों को अपने भीतर लौटने का अवसर देता है। यही कारण है कि आज Music Therapy पर दुनिया भर में चर्चा हो रही है और भारत की शास्त्रीय परंपरा को भी नए नज़रिए से देखा जा रहा है।

हालाँकि वह संगीत को किसी चमत्कारी इलाज की तरह प्रस्तुत नहीं करतीं। उनके लिए इसका सबसे बड़ा महत्व यह है कि यह मन को स्थिर करता है और व्यक्ति को कुछ देर के लिए अपनी भागदौड़ से बाहर निकलने का अवसर देता है।

“अगर कोई श्रोता मेरी प्रस्तुति सुनकर कुछ देर के लिए भी अपने तनाव को भूल जाए, तो मुझे लगता है कि कलाकार होने का उद्देश्य पूरा हुआ।”
तनुश्री मिश्रा

यही सोच उनके संगीत को केवल मंच तक सीमित नहीं रहने देती। वह मानती हैं कि कला का सबसे बड़ा उद्देश्य लोगों के भीतर संवेदनाएँ जगाना है, और जब तक यह संवाद बना रहेगा, शास्त्रीय संगीत की प्रासंगिकता भी बनी रहेगी.


विरासत मिल जाती है, लेकिन उसे आगे बढ़ाना क्यों कठिन होता है?

आज जब मनोरंजन के साधन पहले से कहीं अधिक हैं और लोगों का ध्यान कुछ ही सेकंड में बंट जाता है, ऐसे समय में शास्त्रीय संगीत को जीवंत बनाए रखना किसी एक कलाकार की नहीं, बल्कि पूरी परंपरा की चुनौती है।

तनुश्री मिश्रा मानती हैं कि विरासत केवल इसलिए नहीं बचती कि वह पुरानी है। उसे हर पीढ़ी को अपने समय के साथ फिर से जीना और समझाना पड़ता है।

उनके लिए Banaras Gharana किसी इतिहास की किताब का अध्याय नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है। ऐसी परंपरा, जो तभी आगे बढ़ेगी जब युवा कलाकार सीखने का धैर्य रखेंगे और युवा श्रोता सुनने का समय निकालेंगे।

“विरासत हमें पहचान देती है, लेकिन उसे आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी हमारी अपनी होती है। हर पीढ़ी को उसे अपने काम से साबित करना पड़ता है।”
तनुश्री मिश्रा

वह मानती हैं कि आज भी ऐसे बहुत से युवा हैं जो शास्त्रीय संगीत सीखना चाहते हैं। ज़रूरत सिर्फ़ उन्हें सही वातावरण, अच्छे गुरु और मंच देने की है। अगर यह सिलसिला बना रहे, तो आने वाले वर्षों में भी भारतीय शास्त्रीय संगीत उतनी ही मजबूती से आगे बढ़ेगा।

उनकी अपनी यात्रा भी इसी विश्वास का विस्तार है—सीखना, अभ्यास करना और हर प्रस्तुति के साथ थोड़ा और बेहतर बनने की कोशिश करना।

यही वजह है कि तनुश्री मिश्रा की कहानी केवल एक कलाकार की सफलता की कहानी नहीं बनती। यह उस भरोसे की कहानी है कि बदलते समय के बावजूद परंपराएँ जीवित रह सकती हैं, अगर उन्हें जीने वाले लोग ईमानदारी से अपना काम करते रहें।


इस बातचीत के दौरान तनुश्री मिश्रा ने कई बार एक बात दोहराई—संगीत उनके लिए मंज़िल नहीं, बल्कि एक सतत यात्रा है। शायद यही सोच उन्हें मंच से जोड़ती है, श्रोताओं से जोड़ती है और Banaras Gharana की उस परंपरा से भी जोड़ती है, जो पीढ़ियों से सुरों के माध्यम से लोगों के जीवन को समृद्ध करती आई है।

हर प्रस्तुति के बाद तालियाँ थम जाती हैं। मंच की रोशनी भी बुझ जाती है। लेकिन एक कलाकार का रियाज़ अगले दिन फिर वहीं से शुरू होता है।

शायद यही किसी भी सच्चे कलाकार की सबसे बड़ी पहचान होती है।


InnaMax View | कलाकार की कहानी से आगे की बात

हर पीढ़ी अपने समय के साथ बदलती है। संगीत भी बदलता है। लेकिन कुछ परंपराएँ ऐसी होती हैं, जिनकी पहचान बदलाव से नहीं, बल्कि निरंतरता से बनती है।

तनुश्री मिश्रा की कहानी केवल एक शास्त्रीय गायिका की व्यक्तिगत यात्रा नहीं है। यह उस सवाल से भी जुड़ती है कि क्या भारत की सांस्कृतिक विरासत नई पीढ़ी तक उसी गहराई के साथ पहुँच रही है, जैसी पहले पहुँचती थी।

आज Digital Platforms ने कलाकारों को पहले से कहीं बड़ा मंच दिया है। वहीं दूसरी ओर, कम होती एकाग्रता, तेज़ी से बदलती पसंद और Instant Content की आदत ने शास्त्रीय कलाओं के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। ऐसे समय में परंपरा को बचाए रखना केवल कलाकार की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षण संस्थानों और श्रोताओं की भी साझा भूमिका है।

Banaras Gharana जैसे घराने केवल संगीत की शैली नहीं सिखाते, बल्कि अनुशासन, धैर्य और साधना जैसी जीवन-शैली भी सिखाते हैं। यही कारण है कि ऐसी परंपराएँ किसी शहर या परिवार की धरोहर भर नहीं रहतीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाती हैं।

तनुश्री मिश्रा की यात्रा यह याद दिलाती है कि विरासत केवल विरासत में मिलने से नहीं बचती। वह तब जीवित रहती है, जब हर पीढ़ी उसे सीखने, समझने और आगे बढ़ाने का निर्णय लेती है।



InnaMax Answers | आपके सवाल, सीधे जवाब


1. तनुश्री मिश्रा कौन हैं?

तनुश्री मिश्रा Banaras Gharana की चौथी पीढ़ी की Classical एवं Ghazal गायिका हैं। वे Hindustani Classical Music, Thumri, Dadra और Ghazal की प्रस्तुतियों के लिए जानी जाती हैं।


2. तनुश्री मिश्रा किस घराने से जुड़ी हैं?

वे Banaras Gharana से जुड़ी हैं। उनका मानना है कि यह केवल पारिवारिक विरासत नहीं, बल्कि निरंतर सीखने, रियाज़ और अनुशासन की ज़िम्मेदारी भी है।


3. उनकी संगीत यात्रा की शुरुआत कैसे हुई?

संगीत उनके परिवार के वातावरण का स्वाभाविक हिस्सा था। बचपन से मिले संगीत संस्कार और नियमित रियाज़ ने उन्हें एक पेशेवर कलाकार बनने की दिशा दी।


4. Tanushree Mishra किन संगीत विधाओं में प्रस्तुति देती हैं?

वे Hindustani Classical Music के साथ-साथ Thumri, Dadra और Ghazal की भी प्रस्तुति देती हैं।


5. Live Performance और Studio Recording को लेकर उनकी क्या सोच है?

उनके अनुसार Live Performance में कलाकार और श्रोता के बीच तत्काल संवाद बनता है, जबकि Studio Recording आत्ममंथन और तकनीकी सटीकता की अलग प्रक्रिया होती है।


6. नई पीढ़ी और Classical Music को लेकर उनका क्या मानना है?

उनका मानना है कि युवा श्रोता शास्त्रीय संगीत से दूर नहीं हैं। यदि उसे सही तरीके से प्रस्तुत किया जाए, तो नई पीढ़ी भी उसे उतनी ही रुचि से स्वीकार कर सकती है।


7. इस प्रोफ़ाइल का सबसे बड़ा संदेश क्या है?

यह कहानी बताती है कि विरासत केवल मिलने से नहीं बचती। उसे हर पीढ़ी को अपने समर्पण, रियाज़ और काम के माध्यम से आगे बढ़ाना पड़ता है।। Pls follow her on Instagram and on youtube


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