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क्या समाज की सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की नहीं, दिशा का अभाव है?

25 वर्षों तक लोगों के बीच काम करने के बाद VijayLaxmi Singh ऐसा क्यों मानती हैं?


इस Profile में…

🔹 25 वर्षों के सामाजिक अनुभवों से निकली जीवन और समाज की सीख

🔹 क्यों VijayLaxmi Singh मानती हैं कि आज की सबसे बड़ी समस्या दिशा का अभाव है

🔹 महिलाओं के जीवन के “दूसरे अध्याय” पर उनकी महत्वपूर्ण दृष्टि

🔹 अदृश्य लोगों और अनसुने प्रयासों में छिपे सामाजिक परिवर्तन की कहानियाँ

🔹 सेवा को काम नहीं, जीवन का हिस्सा मानने वाली एक अलग सोच


एक मंच, एक भाषण और एक एहसास

भोपाल में एक बड़ा कार्यक्रम था।

मुख्यमंत्री आने वाले थे। मंच तैयार था। टीवी चैनल लाइव प्रसारण कर रहे थे। पिछले कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं।

कार्यक्रम शुरू होने में थोड़ी देरी हुई तो पीछे एक कमरे में बैठकर VijayLaxmi Singh ने कुछ नोट्स लिखे। मंच पर जाकर क्या बोलना है, उसकी तैयारी की।

लेकिन जब बोलने का समय आया, तो वह कागज़ पीछे ही रह गया।

बाद में उन्होंने महसूस किया कि जिस काम को कोई व्यक्ति महीनों नहीं, बल्कि वर्षों से जी रहा हो, उसके बारे में बोलने के लिए अलग से शब्द खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

कुछ बातें कागज़ पर नहीं, जीवन में लिखी जाती हैं।

शायद यही बात VijayLaxmi Singh की पूरी यात्रा को समझने की शुरुआत भी है।

25 वर्षों के दौरान VijayLaxmi Singh ने केवल सेवा गतिविधियों में भाग नहीं लिया। उन्होंने बस्तियों, गांवों, महिलाओं, विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों के बीच काम करते हुए यह भी देखा कि लोग केवल संसाधनों की कमी से नहीं जूझते। कई बार उन्हें दिशा, जुड़ाव और उद्देश्य की भी तलाश होती है।


VijayLaxmi Singh सेवा कार्यों और दस्तावेजीकरण से जुड़े संवाद में भाग लेते हुए
सामाजिक कार्यों और सेवा कथाओं के दस्तावेजीकरण से जुड़े संवादों के दौरान। Photo Courtesy: VijayLaxmi Singh

“अब तो यह जिंदगानी है”— VijayLaxmi Singh ऐसा क्यों कहती हैं?

लगभग 25 वर्षों से VijayLaxmi Singh राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सेवा भारती से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रही हैं।

बाल संस्कार केंद्रों से लेकर महिला स्वावलंबन कार्यक्रमों तक, और आज सेवागाथा के माध्यम से सामाजिक कार्यों के दस्तावेजीकरण तक—उनकी भूमिका समय के साथ बदलती रही है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वह अपने काम को किसी पद या जिम्मेदारी के रूप में नहीं देखतीं।

जब उनसे पूछा गया कि बिना किसी आर्थिक लाभ के इतने वर्षों तक यह काम क्यों जारी रखा, तो उनका उत्तर बेहद सीधा था—

“अगर इसे मेरी जिंदगी से हटा दूं, तो मैं ही क्या रह जाऊंगी। अब तो यह जिंदगानी है।”

यह वाक्य केवल समर्पण नहीं बताता।

यह पहचान की बात करता है।

कुछ लोग सेवा करते हैं।

कुछ लोगों के लिए सेवा उनकी जीवन शैली बन जाती है।

VijayLaxmi Singh स्वयं को दूसरी श्रेणी में रखती दिखाई देती हैं।


क्यों मानती हैं कि समाज की सबसे बड़ी समस्या दिशा का अभाव है?

सामाजिक कार्यों से जुड़े लोग अक्सर गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य या रोजगार जैसी समस्याओं की चर्चा करते हैं।

लेकिन VijayLaxmi Singh एक अलग समस्या की ओर ध्यान दिलाती हैं।

उनके अनुसार आज की सबसे बड़ी चुनौती “दिशा का अभाव” है।

उनका मानना है कि समाज में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो कुछ अच्छा करना चाहते हैं, समाज से जुड़ना चाहते हैं, योगदान देना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि शुरुआत कहाँ से करें।

जानकारी का अभाव अक्सर इच्छाशक्ति से बड़ा अवरोध बन जाता है।

यह बात केवल युवाओं पर लागू नहीं होती।

उनकी नजर में यह समस्या लगभग हर आयु वर्ग में दिखाई देती है।

कई बुजुर्ग अकेलेपन से जूझ रहे हैं।

कई लोग परिवारों में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं।

कई लोग व्यस्त हैं, लेकिन संतुष्ट नहीं।

ऐसे में प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि व्यक्ति क्या कर रहा है।

प्रश्न यह भी है कि वह किस उद्देश्य के लिए कर रहा है।


जिन महिलाओं को किसी ने नहीं बताया कि जीवन का दूसरा अध्याय भी होता है

VijayLaxmi Singh की सबसे दिलचस्प टिप्पणियों में से एक महिलाओं के जीवन को लेकर है।

वर्षों तक महिलाओं के बीच काम करते हुए उन्होंने एक पैटर्न देखा।

जब तक बच्चे छोटे होते हैं, परिवार को उनकी आवश्यकता होती है।

उनका दिन जिम्मेदारियों से भरा रहता है।

लेकिन जैसे-जैसे बच्चे आत्मनिर्भर होते जाते हैं, कई महिलाओं को अचानक महसूस होने लगता है कि उनकी भूमिका कम हो गई है।

कुछ महिलाएं पहली बार अपने आप से पूछती हैं—

“अब मेरी उपयोगिता क्या है?”

VijayLaxmi Singh मानती हैं कि यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक भी है।

उनके अनुसार यदि महिलाएं परिवार के बाहर अपने लिए कोई सामाजिक, सामुदायिक या रचनात्मक भूमिका विकसित नहीं करतीं, तो वे अनावश्यक अकेलेपन और निराशा का अनुभव कर सकती हैं।

यही कारण है कि वह महिलाओं की सामाजिक भागीदारी को केवल समाज सेवा नहीं मानतीं।

उनके लिए यह मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य का भी प्रश्न है।

उन्होंने कई महिलाओं को यह कहते हुए सुना है कि संगठन और समाज से जुड़ाव ने उन्हें जीवन का दूसरा उद्देश्य दिया।

यह विचार शायद उनके अपने अनुभवों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।


VijayLaxmi Singh सामाजिक कार्यों के दस्तावेजीकरण और संपादकीय कार्य में व्यस्त
सामाजिक कार्यों के दस्तावेजीकरण और संवाद से जुड़ा उनका दैनिक कार्य।

वे लोग जिनका नाम कहीं दर्ज नहीं होता

लंबे समय तक सामाजिक कार्यों के बीच रहने का एक प्रभाव यह भी होता है कि व्यक्ति उन लोगों को देखना सीख जाता है जिन्हें सामान्यतः कोई नहीं देखता।

VijayLaxmi Singh की दृष्टि में भारत की कहानी केवल बड़े शहरों, बड़े नेताओं या बड़ी संस्थाओं की कहानी नहीं है।

यह उन लोगों की भी कहानी है जो बिना किसी पहचान के अपने समुदायों में परिवर्तन लाते हैं।

परिवर्तन हमेशा बड़े मंचों से नहीं आता।

कई बार वह उन लोगों से आता है जिनका नाम कहीं दर्ज नहीं होता।

कभी वह पालघर के एक ऐसे गांव की बात करती हैं जहां दशकों तक पानी की समस्या रही।

कभी उन महिलाओं की, जिनकी दैनिक कठिनाई एक साधारण तकनीकी समाधान से कम हुई।

कभी उन पेशेवरों की, जिन्होंने अपने करियर के साथ-साथ सामाजिक दायित्व को भी महत्व दिया।

इन कहानियों का महत्व केवल परिणामों में नहीं है।

इनका महत्व यह याद दिलाने में है कि परिवर्तन अक्सर छोटे, लगातार और धैर्यपूर्ण प्रयासों से आता है।

उनकी नजर में समाज को संभालने वाले बहुत से लोग कभी सुर्खियों में नहीं आते।

लेकिन उनका योगदान कम महत्वपूर्ण नहीं होता।


वह सुकून जो उन्हें 25 साल बाद भी सक्रिय रखता है

जब VijayLaxmi Singh सेवा कार्यों की बात करती हैं तो अक्सर एक शब्द सामने आता है—सुकून।

उनका मानना है कि व्यक्तिगत संबंधों में अपेक्षाएं स्वाभाविक होती हैं।

परिवार, रिश्तेदारी और मित्रता में लोग एक-दूसरे से कुछ न कुछ उम्मीद रखते हैं।

लेकिन समाज के लिए किया गया कार्य अक्सर अलग प्रकार का अनुभव देता है।

क्योंकि वहां काम किसी लेन-देन का हिस्सा नहीं होता।

उनके अनुसार जब कोई व्यक्ति बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के किसी के लिए कुछ करता है, तो उससे मिलने वाला मानसिक संतोष अलग प्रकार का होता है।

यही संतोष उन्हें वर्षों बाद भी उसी उत्साह के साथ सक्रिय बनाए हुए दिखाई देता है।


कब कहानी सुनाना भी सेवा का हिस्सा बन गया?

आज VijayLaxmi Singh सेवागाथा की राष्ट्रीय संयोजक और संपादकीय नेतृत्व से जुड़ी भूमिका में कार्य कर रही हैं।

लेकिन उनकी नजर में यह केवल मीडिया या कंटेंट का काम नहीं है।

वह इसे समाज में चल रहे कार्यों और उन कार्यों से जुड़ना चाहने वाले लोगों के बीच एक पुल के रूप में देखती हैं।

उनका मानना है कि कई लोग योगदान देना चाहते हैं, लेकिन उन्हें उदाहरण नहीं मिलते।

कई अच्छे कार्य इसलिए भी अदृश्य रह जाते हैं क्योंकि कोई उनकी कहानी दर्ज नहीं करता।

यहीं से दस्तावेजीकरण का महत्व सामने आता है।

उनके लिए कहानी केवल सूचना नहीं है।

कहानी दिशा भी बन सकती है।

प्रेरणा भी।

और कभी-कभी सहभागिता का निमंत्रण भी।


समुदाय और वरिष्ठ नागरिकों के साथ संवाद करती हुई VijayLaxmi Singh
समुदाय, संवाद और सहभागिता—वे मूल्य जिन्हें VijayLaxmi Singh सामाजिक जीवन की महत्वपूर्ण शक्ति मानती हैं।

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VijayLaxmi Singh की कहानी को केवल उनके पद या संगठन से समझना आसान होगा।

लेकिन शायद अधूरा भी।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि उन्होंने वर्षों तक सामाजिक कार्य किया।

बल्कि यह है कि उन वर्षों ने उन्हें लोगों को देखने का एक अलग तरीका दिया।

उन्होंने अकेलेपन को देखा।

उद्देश्य की तलाश को देखा।

महिलाओं के जीवन के बदलते चरणों को देखा।

और उन लोगों को भी देखा जिनका काम समाज को बदलता है, लेकिन जिनका नाम अक्सर कहीं दर्ज नहीं होता।

25 वर्षों बाद उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख शायद यही है—

समाज केवल संसाधनों से नहीं चलता।

समाज उद्देश्य, सहभागिता और जुड़ाव से भी चलता है।

और जब लोगों को दिशा मिलती है, तो वे अक्सर अपनी कल्पना से कहीं अधिक योगदान दे सकते हैं।


What People Often Ask

VijayLaxmi Singh कौन हैं?

VijayLaxmi Singh सामाजिक कार्यों और सामुदायिक सहभागिता से जुड़ी एक वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। वह लगभग 25 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सेवा भारती से जुड़े विभिन्न सेवा कार्यों में सक्रिय रही हैं तथा वर्तमान में सेवागाथा की राष्ट्रीय संयोजक और संपादकीय नेतृत्व से जुड़ी भूमिका निभा रही हैं।


सेवागाथा क्या है?

सेवागाथा एक डिजिटल मंच है जो देशभर में चल रहे विभिन्न सेवा और सामाजिक परिवर्तन के प्रयासों की कहानियों का दस्तावेजीकरण और प्रसार करता है। इसका उद्देश्य उन कार्यों को सामने लाना है जो अक्सर मुख्यधारा की सुर्खियों तक नहीं पहुंच पाते।


VijayLaxmi Singh के अनुसार समाज में उद्देश्य की भावना क्यों महत्वपूर्ण है?

उनका मानना है कि केवल व्यस्त रहना और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना दो अलग बातें हैं। जब लोगों के जीवन में कोई बड़ा उद्देश्य नहीं होता, तो वे अक्सर अकेलेपन, निराशा और दिशाहीनता का अनुभव करते हैं। समाज से जुड़ाव लोगों को स्वयं से बड़े अर्थ और भूमिका का एहसास करा सकता है।


महिलाओं के जीवन के “दूसरे अध्याय” से उनका क्या आशय है?

VijayLaxmi Singh के अनुसार कई महिलाएं अपने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों में बिताती हैं। लेकिन जब वे जिम्मेदारियां कम हो जाती हैं, तब जीवन में एक नया उद्देश्य खोजने की आवश्यकता होती है। वह मानती हैं कि सामाजिक, सामुदायिक या रचनात्मक गतिविधियों में भागीदारी महिलाओं को इस नए चरण में अर्थ और आत्मविश्वास दे सकती है।


सामाजिक कार्य में उन्हें सबसे बड़ी सीख क्या मिली?

उनकी सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि समाज में परिवर्तन केवल बड़े अभियानों या चर्चित व्यक्तियों से नहीं आता। अक्सर साधारण लोग, छोटे प्रयास और लगातार किया गया काम ही लंबे समय में सबसे बड़ा बदलाव लेकर आते हैं।


क्या कहानी सुनाना भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है?

VijayLaxmi Singh मानती हैं कि कहानियां केवल सूचना देने का माध्यम नहीं होतीं। एक अच्छी कहानी लोगों को प्रेरित कर सकती है, उन्हें दिशा दे सकती है और किसी सकारात्मक पहल से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित भी कर सकती है। इसी कारण वह सामाजिक कार्यों के दस्तावेजीकरण को महत्वपूर्ण मानती हैं।


VijayLaxmi Singh की दृष्टि में सेवा का अर्थ क्या है?

उनके लिए सेवा किसी कार्यक्रम या अभियान तक सीमित नहीं है। वह इसे जीवन जीने के एक तरीके के रूप में देखती हैं, जहां व्यक्ति बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के समाज और समुदाय के लिए योगदान देता है। उनके शब्दों में, सेवा उनके लिए काम नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी है।


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