माँ की पहली Eid अकेले — पैसे आए, पर खर्च नहीं हुए
Eid पर बेटा दूर है। पैसे आते हैं, लेकिन माँ उन्हें खर्च नहीं करती। कुछ रिश्तों में खुशी भी संभालकर रखी जाती है।
Eid पर बेटा दूर है। पैसे आते हैं, लेकिन माँ उन्हें खर्च नहीं करती। कुछ रिश्तों में खुशी भी संभालकर रखी जाती है।
घर में सेवइयाँ बन रही थीं।
दूध उबलते-उबलते थोड़ा बाहर गिर गया — Fatima ने जल्दी से आँच कम की।
चार बजे से जागी थीं।
वही recipe… जो उनके शौहर हर साल बनाते थे।
Tariq का message रात में आया था
“Ammi, पैसे भेज दिए। कुछ अच्छा ले लेना। मेहमान आएँगे।”
Fatima ने phone रखा…
और पैसे एक पुरानी diary के बीच रख दिए।

दोपहर तक घर भर गया।
मेहमान आए, बैठे, सेवइयाँ खाईं।
“Fatima Baji, इस बार तो और अच्छी बनी हैं।”
वो हल्का सा मुस्कुराईं —
जैसे हर साल वही सुनती आई हों।
शाम को घर खाली हुआ।
बर्तन धुल गए। चूल्हा ठंडा हो गया।
Phone बजा।
“Ammi, कैसी रही Eid?”
“अच्छी रही, बेटा।”
“पैसे मिले थे? कुछ लिया?”
थोड़ी देर चुप्पी रही।
“हाँ… सेवइयाँ ली थीं।”
रात को Tariq को पड़ोस वाली aunty ने बताया —
“तुम्हारी Ammi ने पैसे रख लिए। कहती थीं — ये Tariq की mehnat है।”
सेवइयाँ उन्होंने अपनी पुरानी savings से बनाई थीं।
Tariq ने फिर call नहीं किया।
बस screen देखता रहा।
उसे अचानक समझ आया —
Ammi आज भी Eid पर वही करती हैं…
देना।

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