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Dr Rishi Sethi: आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग उसे समस्या मानते ही नहीं


आँखों की दुनिया केवल ऑपरेशन, दवाइयों और जाँच तक सीमित नहीं है। यह Profile उन अनुभवों की कहानी है, जिन्होंने Dr. Rishi Sethi को यह समझने में मदद की कि समय पर जागरूकता कई बार सबसे प्रभावी उपचार साबित हो सकती है।


Profile at a Glance
  • हजारों मरीजों के अनुभवों ने उन्हें इलाज से पहले जागरूकता की अहमियत सिखाई।
  • मानते हैं कि अच्छी नज़र हमेशा स्वस्थ आँखों की गारंटी नहीं होती।
  • बचपन का अपना अनुभव आज भी हर बच्चे के इलाज में उनकी संवेदनशीलता बढ़ाता है।
  • उनके अनुसार सबसे बड़ी चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि उसकी देर से पहचान है।
  • हर मरीज उनके लिए केवल एक केस नहीं, बल्कि सीख और मानवीय अनुभव का स्रोत भी है।

कई बार किसी डॉक्टर के लिए सबसे कठिन काम ऑपरेशन करना नहीं होता।

सबसे कठिन काम होता है किसी व्यक्ति को यह बताना कि जो नुकसान आज दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत शायद बहुत पहले हो चुकी थी।

Dr Rishi Sethi ने अपने पेशेवर जीवन में हजारों लोगों को देखा है। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक। नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं से लेकर ऐसे लोगों तक, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा बिना किसी शिकायत के गुज़ार दिया।

लेकिन इन सभी चेहरों के पीछे उन्होंने एक समान बात देखी।

लोग अक्सर अपनी आँखों की चिंता तब शुरू करते हैं, जब आँखें उन्हें चिंता करने का कारण देने लगती हैं।

और शायद यही वजह है कि वर्षों के अनुभव के बाद उनका ध्यान सिर्फ इलाज पर नहीं, बल्कि जागरूकता पर भी गया।


Dr Rishi Sethi conducting an eye health awareness session for community members
हर समस्या अस्पताल में नहीं पहचानी जाती। कई बार जागरूकता ही पहला उपचार बन जाती है।

Dr. Rishi Sethi
Eye Surgeon • Vision Health Advocate

एक ऐसा सच जो मरीजों की फ़ाइलों में नहीं लिखा होता

अस्पतालों में आने वाले लोगों की रिपोर्ट अलग-अलग होती हैं।

उम्र अलग होती है।

समस्याएँ अलग होती हैं।

लेकिन कई बार उनकी कहानियाँ एक जैसी होती हैं।

“हमें लगा सब ठीक है।”

यह वाक्य डॉक्टरों को बार-बार सुनने को मिलता है।

किसी को पढ़ने में दिक्कत शुरू हुई।

किसी को दूर देखने में।

किसी को बहुत बाद में महसूस हुआ कि जो बदलाव धीरे-धीरे हो रहा था, वह वास्तव में बदलाव था।

समस्या यह नहीं थी कि संकेत मौजूद नहीं थे।

समस्या यह थी कि किसी ने उन्हें संकेत माना ही नहीं।

यही वह अनुभव है जिसने Dr Rishi Sethi की सोच को आकार दिया।


जब एक बच्चे को यह भी पता नहीं था कि वह दुनिया को अधूरा देख रहा है

दिलचस्प बात यह है कि इस सोच की जड़ें उनके अपने बचपन तक जाती हैं।

स्कूल में उन्हें ब्लैकबोर्ड साफ दिखाई नहीं देता था।

उन्होंने घर पर बताया भी।

लेकिन परिवार को लगा कि शायद यह कोई बहाना होगा।

आखिर परिवार में किसी और को चश्मा नहीं था।

फिर स्कूल में हुई जाँच ने तस्वीर बदल दी।

समस्या सामने आई।


School student struggling to see the blackboard from the classroom
डॉ. ऋषि सेठी की अपनी कहानी भी एक स्कूल की कक्षा से शुरू होती है, जहाँ ब्लैकबोर्ड साफ दिखाई नहीं देता था।

चश्मा लगा।

और उसके बाद पढ़ाई में बदलाव दिखने लगा।

अंक बेहतर हुए।

शिक्षकों ने अंतर महसूस किया।

आज जब वे किसी बच्चे को पहली बार स्पष्ट रूप से देखते हुए पाते हैं, तो उन्हें वही अनुभव याद आता है।

क्योंकि कई बार एक बच्चा यह भी नहीं जानता कि वह दुनिया को अधूरा देख रहा है।


क्या आँखों की सबसे बड़ी समस्या हमारी सोच में छिपी होती है?

Dr Rishi Sethi का जवाब थोड़ा अलग है।

उनके अनुसार कई बार समस्या आँखों में नहीं, हमारी धारणाओं में होती है।

हम मान लेते हैं कि अगर दर्द नहीं है तो सब ठीक है।

अगर काम चल रहा है तो सब ठीक है।

अगर पढ़ पा रहे हैं तो सब ठीक है।

लेकिन शरीर हमेशा तेज़ आवाज़ में चेतावनी नहीं देता।

कई बदलाव धीरे-धीरे आते हैं।

इतने धीरे कि वे हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं।

जब कोई समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है, तो कई बार इंसान भी उसके साथ धीरे-धीरे समझौता कर लेता है।


Dr. Rishi Sethi seated in his eye clinic reflecting on lessons learned from years of treating patients
हर मरीज केवल इलाज नहीं करवाता, वह डॉक्टर को जीवन, धैर्य और मानवीय संवेदनाओं के नए पाठ भी सिखाता है।

क्या हर मरीज डॉक्टर को भी कुछ सिखाकर जाता है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि अस्पताल वह जगह है जहाँ डॉक्टर सिखाते हैं और मरीज सीखते हैं।

लेकिन लंबे अनुभव के बाद कई डॉक्टर यह स्वीकार करते हैं कि सीखने की प्रक्रिया एकतरफा नहीं होती।

Dr Rishi Sethi भी ऐसा ही मानते हैं।

उन्होंने ऐसे मरीज देखे हैं जो इलाज के बाद सिर्फ धन्यवाद कहने वापस आए।

कुछ लोग मिठाई लेकर आए।

कुछ अपनी बनाई हुई तस्वीरें लेकर आए।

कुछ ने सिर्फ हाथ जोड़कर आशीर्वाद दिया।

इन घटनाओं का चिकित्सा विज्ञान से कोई संबंध नहीं है।

लेकिन इंसानी रिश्तों से गहरा संबंध है।

किसी बुज़ुर्ग व्यक्ति के चेहरे पर लौटी हुई सहजता कई बार किसी प्रमाणपत्र से बड़ी उपलब्धि लगती है।


अगर लोग आँखों की कीमत समझते हैं, तो उन्हें हल्के में क्यों लेते हैं?

यह सवाल जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं।

किसी से पूछिए कि क्या आँखें महत्वपूर्ण हैं।

जवाब लगभग हमेशा “हाँ” होगा।

फिर भी लोग नियमित जाँच को टालते हैं।

छोटी समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हैं।

और कई बार विशेषज्ञ तक पहुँचने में बहुत समय लगा देते हैं।

क्यों?

शायद इसलिए कि हम उन चीज़ों की मौजूदगी को सबसे कम महसूस करते हैं, जो लगातार हमारे साथ होती हैं।

साँस।

चलना।

देखना।

जब तक इनमें कोई बाधा न आए, हम इनके बारे में सोचते ही नहीं।

और यही बात Dr Rishi Sethi को सबसे ज़्यादा चिंतित करती है।


Dr Rishi Sethi presenting vision assessment technology at a professional exhibition
नई तकनीकें तभी सार्थक हैं जब वे लोगों तक समय रहते पहुँच सकें।

क्या डॉक्टर की ज़िम्मेदारी अस्पताल के दरवाज़े पर खत्म हो जाती है?

यही वजह है कि वे जागरूकता को सिर्फ एक अभियान नहीं मानते।

उन्हें लगता है कि कई बार डॉक्टर को मरीज के पास जाना पड़ता है।

स्कूलों में।

कैंपों में।

समुदायों के बीच।

क्योंकि हर व्यक्ति अस्पताल तक नहीं पहुँचता।

हर परिवार शुरुआती संकेत नहीं पहचानता।

और हर बच्चा अपनी परेशानी शब्दों में नहीं बता सकता।

ऐसे में जानकारी सिर्फ जानकारी नहीं रह जाती।

वह अवसर बन जाती है।

एक ऐसा अवसर जो किसी समस्या को गंभीर होने से पहले पहचान सकता है।


आखिर वर्षों के अनुभव ने उन्हें किस निष्कर्ष तक पहुँचाया?

वर्षों तक मरीजों को देखने, सुनने और समझने के बाद Dr Rishi Sethi जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, वह किसी जटिल मेडिकल किताब से नहीं आता।

वह रोज़मर्रा के अनुभव से आता है।

आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोगों को समस्याएँ होती हैं।

आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग उन्हें समस्या मानते ही नहीं।

और शायद यही कारण है कि वे बार-बार एक साधारण सी बात दोहराते हैं—

अपनी आँखों की कद्र तब मत कीजिए जब वे आपको चेतावनी देने लगें।

उन्हें तब भी महत्व दीजिए जब सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा हो।

क्योंकि जीवन की कुछ सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें वही होती हैं, जिनकी अहमियत हमें तब समझ आती है, जब वे कम होने लगती हैं।


Dr Rishi Sethi standing beside a river during sunset
हजारों अनुभवों के बाद डॉ. ऋषि सेठी एक बात पर लौटते हैं—नज़र की अहमियत अक्सर तब समझ आती है जब कुछ खोना शुरू हो चुका होता है।

कहानी पढ़ने के बाद यह सवाल भी उठते हैं…


Dr. Rishi Sethi किन मरीजों का इलाज करते हैं?

— Dr. Rishi Sethi आँखों से जुड़ी सामान्य और जटिल दोनों प्रकार की समस्याओं का उपचार करते हैं। सही उपचार का चयन व्यक्ति की आयु, लक्षण और चिकित्सकीय जाँच पर निर्भर करता है।


अगर देखने में कोई परेशानी नहीं है, तो भी Eye Check-up क्यों कराना चाहिए?

— कई आँखों की बीमारियाँ शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण नहीं देतीं। नियमित जाँच से ऐसी समस्याओं की समय रहते पहचान संभव हो सकती है।


बच्चों की आँखों की जाँच किस उम्र से शुरू करानी चाहिए?

— विशेषज्ञ आमतौर पर सलाह देते हैं कि स्कूल शुरू होने से पहले कम से कम एक बार दृष्टि की जाँच अवश्य कराई जाए। यदि परिवार या शिक्षक को कोई बदलाव दिखे, तो जाँच पहले भी कराई जा सकती है।


क्या मोबाइल और लैपटॉप का अधिक उपयोग आँखों को स्थायी नुकसान पहुँचाता है?

— लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों में थकान, सूखापन और असहजता हो सकती है। हालांकि, हर स्थिति स्थायी नुकसान में नहीं बदलती। सही दूरी, नियमित ब्रेक और आवश्यकता होने पर चिकित्सकीय सलाह उपयोगी रहती है।


किन संकेतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए?

— धुंधला दिखना, बार-बार सिरदर्द, आँखों में दर्द, चमकती रोशनी दिखना, अचानक दृष्टि में बदलाव या बच्चों का टीवी के बहुत पास बैठना—ये सभी संकेत विशेषज्ञ से परामर्श लेने का कारण हो सकते हैं।


क्या आँखों की हर समस्या का इलाज ऑपरेशन से ही होता है?

— नहीं। कई समस्याओं का उपचार दवाइयों, चश्मे, जीवनशैली में बदलाव या नियमित निगरानी से भी किया जा सकता है। ऑपरेशन केवल आवश्यकता होने पर ही किया जाता है।


Dr. Rishi Sethi कहाँ परामर्श देते हैं?

— Dr. Rishi Sethi Northern Railway Central Hospital, Connaught Place, New Delhi में सेवाएँ दे रहे हैं। उपलब्धता और OPD समय की जानकारी के लिए अस्पताल से संपर्क करना उचित रहेगा।


InnaMax ने Dr. Rishi Sethi पर यह Profile क्यों प्रकाशित की है?

— यह Profile केवल एक डॉक्टर का परिचय नहीं, बल्कि आँखों के स्वास्थ्य, समय पर जाँच और सार्वजनिक जागरूकता जैसे विषयों पर उनके अनुभवों और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास है।


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