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डॉ. ऋषि सेठी: आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग उसे समस्या मानते ही नहीं


इस Profile में…

👁️ हजारों मरीजों को देखने के बाद Dr Rishi Sethi ने क्या सीखा

👁️ क्यों “मुझे ठीक दिख रहा है” हमेशा “मेरी आँखें स्वस्थ हैं” नहीं होता

👁️ एक बचपन का अनुभव जिसने उनकी सोच बदल दी

👁️ मरीज डॉक्टर को क्या सिखाते हैं

👁️ क्यों उनके अनुसार आँखों की सबसे बड़ी समस्या अक्सर बीमारी नहीं, उसकी देर से पहचान होती है


कई बार किसी डॉक्टर के लिए सबसे कठिन काम ऑपरेशन करना नहीं होता।

सबसे कठिन काम होता है किसी व्यक्ति को यह बताना कि जो नुकसान आज दिखाई दे रहा है, उसकी शुरुआत शायद बहुत पहले हो चुकी थी।

Dr Rishi Sethi ने अपने पेशेवर जीवन में हजारों लोगों को देखा है। बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक। नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं से लेकर ऐसे लोगों तक, जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा बिना किसी शिकायत के गुज़ार दिया।

लेकिन इन सभी चेहरों के पीछे उन्होंने एक समान बात देखी।

लोग अक्सर अपनी आँखों की चिंता तब शुरू करते हैं, जब आँखें उन्हें चिंता करने का कारण देने लगती हैं।

और शायद यही वजह है कि वर्षों के अनुभव के बाद उनका ध्यान सिर्फ इलाज पर नहीं, बल्कि जागरूकता पर भी गया।


Dr Rishi Sethi conducting an eye health awareness session for community members
हर समस्या अस्पताल में नहीं पहचानी जाती। कई बार जागरूकता ही पहला उपचार बन जाती है।

एक ऐसा सच जो मरीजों की फ़ाइलों में नहीं लिखा होता

अस्पतालों में आने वाले लोगों की रिपोर्ट अलग-अलग होती हैं।

उम्र अलग होती है।

समस्याएँ अलग होती हैं।

लेकिन कई बार उनकी कहानियाँ एक जैसी होती हैं।

“हमें लगा सब ठीक है।”

यह वाक्य डॉक्टरों को बार-बार सुनने को मिलता है।

किसी को पढ़ने में दिक्कत शुरू हुई।

किसी को दूर देखने में।

किसी को बहुत बाद में महसूस हुआ कि जो बदलाव धीरे-धीरे हो रहा था, वह वास्तव में बदलाव था।

समस्या यह नहीं थी कि संकेत मौजूद नहीं थे।

समस्या यह थी कि किसी ने उन्हें संकेत माना ही नहीं।

यही वह अनुभव है जिसने Dr Rishi Sethi की सोच को आकार दिया।


जब एक बच्चे को यह भी पता नहीं था कि वह दुनिया को अधूरा देख रहा है

दिलचस्प बात यह है कि इस सोच की जड़ें उनके अपने बचपन तक जाती हैं।

स्कूल में उन्हें ब्लैकबोर्ड साफ दिखाई नहीं देता था।

उन्होंने घर पर बताया भी।

लेकिन परिवार को लगा कि शायद यह कोई बहाना होगा।

आखिर परिवार में किसी और को चश्मा नहीं था।

फिर स्कूल में हुई जाँच ने तस्वीर बदल दी।

समस्या सामने आई।


School student struggling to see the blackboard from the classroom
डॉ. ऋषि सेठी की अपनी कहानी भी एक स्कूल की कक्षा से शुरू होती है, जहाँ ब्लैकबोर्ड साफ दिखाई नहीं देता था।

चश्मा लगा।

और उसके बाद पढ़ाई में बदलाव दिखने लगा।

अंक बेहतर हुए।

शिक्षकों ने अंतर महसूस किया।

आज जब वे किसी बच्चे को पहली बार स्पष्ट रूप से देखते हुए पाते हैं, तो उन्हें वही अनुभव याद आता है।

क्योंकि कई बार एक बच्चा यह भी नहीं जानता कि वह दुनिया को अधूरा देख रहा है।


क्या आँखों की समस्या हमेशा आँखों में ही होती है?

Dr Rishi Sethi का जवाब थोड़ा अलग है।

उनके अनुसार कई बार समस्या आँखों में नहीं, हमारी धारणाओं में होती है।

हम मान लेते हैं कि अगर दर्द नहीं है तो सब ठीक है।

अगर काम चल रहा है तो सब ठीक है।

अगर पढ़ पा रहे हैं तो सब ठीक है।

लेकिन शरीर हमेशा तेज़ आवाज़ में चेतावनी नहीं देता।

कई बदलाव धीरे-धीरे आते हैं।

इतने धीरे कि वे हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाते हैं।

जब कोई समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है, तो कई बार इंसान भी उसके साथ धीरे-धीरे समझौता कर लेता है।


Dr Rishi Sethi with a patient during recovery after eye treatment
इलाज सिर्फ चिकित्सा नहीं होता। कई बार मरीजों का विश्वास और आशीर्वाद ही सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है।

मरीज डॉक्टर को क्या सिखाते हैं?

अक्सर लोग सोचते हैं कि अस्पताल वह जगह है जहाँ डॉक्टर सिखाते हैं और मरीज सीखते हैं।

लेकिन लंबे अनुभव के बाद कई डॉक्टर यह स्वीकार करते हैं कि सीखने की प्रक्रिया एकतरफा नहीं होती।

Dr Rishi Sethi भी ऐसा ही मानते हैं।

उन्होंने ऐसे मरीज देखे हैं जो इलाज के बाद सिर्फ धन्यवाद कहने वापस आए।

कुछ लोग मिठाई लेकर आए।

कुछ अपनी बनाई हुई तस्वीरें लेकर आए।

कुछ ने सिर्फ हाथ जोड़कर आशीर्वाद दिया।

इन घटनाओं का चिकित्सा विज्ञान से कोई संबंध नहीं है।

लेकिन इंसानी रिश्तों से गहरा संबंध है।

किसी बुज़ुर्ग व्यक्ति के चेहरे पर लौटी हुई सहजता कई बार किसी प्रमाणपत्र से बड़ी उपलब्धि लगती है।


अगर लोग आँखों की कीमत समझते हैं, तो उन्हें हल्के में क्यों लेते हैं?

यह सवाल जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं।

किसी से पूछिए कि क्या आँखें महत्वपूर्ण हैं।

जवाब लगभग हमेशा “हाँ” होगा।

फिर भी लोग नियमित जाँच को टालते हैं।

छोटी समस्याओं को नज़रअंदाज़ करते हैं।

और कई बार विशेषज्ञ तक पहुँचने में बहुत समय लगा देते हैं।

क्यों?

शायद इसलिए कि हम उन चीज़ों की मौजूदगी को सबसे कम महसूस करते हैं, जो लगातार हमारे साथ होती हैं।

साँस।

चलना।

देखना।

जब तक इनमें कोई बाधा न आए, हम इनके बारे में सोचते ही नहीं।

और यही बात Dr Rishi Sethi को सबसे ज़्यादा चिंतित करती है।


Dr Rishi Sethi presenting vision assessment technology at a professional exhibition
नई तकनीकें तभी सार्थक हैं जब वे लोगों तक समय रहते पहुँच सकें।

अस्पताल से बाहर भी एक ज़िम्मेदारी शुरू होती है

यही वजह है कि वे जागरूकता को सिर्फ एक अभियान नहीं मानते।

उन्हें लगता है कि कई बार डॉक्टर को मरीज के पास जाना पड़ता है।

स्कूलों में।

कैंपों में।

समुदायों के बीच।

क्योंकि हर व्यक्ति अस्पताल तक नहीं पहुँचता।

हर परिवार शुरुआती संकेत नहीं पहचानता।

और हर बच्चा अपनी परेशानी शब्दों में नहीं बता सकता।

ऐसे में जानकारी सिर्फ जानकारी नहीं रह जाती।

वह अवसर बन जाती है।

एक ऐसा अवसर जो किसी समस्या को गंभीर होने से पहले पहचान सकता है।


आखिरकार, आँखों की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

वर्षों तक मरीजों को देखने, सुनने और समझने के बाद Dr Rishi Sethi जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, वह किसी जटिल मेडिकल किताब से नहीं आता।

वह रोज़मर्रा के अनुभव से आता है।

आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि लोगों को समस्याएँ होती हैं।

आँखों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग उन्हें समस्या मानते ही नहीं।

और शायद यही कारण है कि वे बार-बार एक साधारण सी बात दोहराते हैं—

अपनी आँखों की कद्र तब मत कीजिए जब वे आपको चेतावनी देने लगें।

उन्हें तब भी महत्व दीजिए जब सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा हो।

क्योंकि जीवन की कुछ सबसे महत्वपूर्ण चीज़ें वही होती हैं, जिनकी अहमियत हमें तब समझ आती है, जब वे कम होने लगती हैं।


Dr Rishi Sethi standing beside a river during sunset
हजारों अनुभवों के बाद डॉ. ऋषि सेठी एक बात पर लौटते हैं—नज़र की अहमियत अक्सर तब समझ आती है जब कुछ खोना शुरू हो चुका होता है।

What People Often Ask

Dr Rishi Sethi कहाँ मिलते हैं?

— Dr Rishi Sethi Northern Railway Central Hospital, Connaught Place, New Delhi में कार्यरत हैं। OPD के माध्यम से परामर्श लिया जा सकता है।

क्या अच्छी नज़र होने का मतलब है कि आँखें पूरी तरह स्वस्थ हैं?

— ज़रूरी नहीं। कई समस्याएँ शुरुआती चरण में देखने की क्षमता को प्रभावित नहीं करतीं। इसलिए नियमित जाँच उपयोगी मानी जाती है।

बच्चों की आँखों की पहली जाँच कब करानी चाहिए?

— स्कूल जाने की उम्र तक कम से कम एक बार आँखों की जाँच कराना उपयोगी माना जाता है, भले ही कोई स्पष्ट शिकायत न हो।

क्या सिर्फ बुज़ुर्गों को ही आँखों की नियमित जाँच की ज़रूरत होती है?

— नहीं। आँखों की कुछ समस्याएँ किसी भी उम्र में सामने आ सकती हैं। इसलिए जाँच केवल उम्र पर निर्भर नहीं होनी चाहिए।

क्या आँखों की चोट के बाद दर्द न हो तो भी डॉक्टर को दिखाना चाहिए?

— हाँ। कुछ चोटों का असर तुरंत स्पष्ट नहीं होता। विशेषज्ञ की सलाह लेना सुरक्षित विकल्प माना जाता है।

स्क्रीन देखने से आँखें स्थायी रूप से खराब हो जाती हैं?

— लंबे समय तक स्क्रीन उपयोग से थकान और सूखापन बढ़ सकता है, लेकिन हर समस्या स्थायी नुकसान में नहीं बदलती। नियमित ब्रेक लेना उपयोगी है।

Dr Rishi Sethi के अनुसार आँखों की सुरक्षा के लिए सबसे ज़रूरी आदत क्या है?

— समस्या का इंतज़ार न करना। समय-समय पर जाँच और सलाह लेना कई समस्याओं को शुरुआती चरण में पहचानने में मदद कर सकता है।

वर्षों के अनुभव के बाद Dr Rishi Sethi ने सबसे महत्वपूर्ण बात क्या सीखी?

— लोग अक्सर अपनी आँखों की कीमत तब समझते हैं जब कोई समस्या सामने आ जाती है। जागरूकता और समय पर ध्यान देना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना इलाज।


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