कोयले के लोटे से होटल तक, लेकिन कहानी अभी बाकी है
होटल संकल्प बनारस के मालिक प्रकाश सिंह की कहानी शुरू करने के लिए, बनारस के महमूरगंज वाले इस होटल से बेहतर शुरुआत शायद उनका बचपन है।
उस दौर में घर में इस्त्री (प्रेस) नहीं हुआ करती थी। कपड़े या तो सलवटों के साथ पहनने पड़ते, या कोई जुगाड़ निकालना पड़ता। प्रकाश सिंह ने वह जुगाड़ खुद खोज लिया था — घर में खाना बनाने के बाद बचा कोयला एक लोटे में भरकर, उसी से कपड़ों की सलवटें निकालते।
यह सिर्फ एक बच्चे की चतुराई की कहानी नहीं है। यह उस सोच की शुरुआत है जो आगे हर मोड़ पर दोहराई गई — जो चीज़ नहीं है, उस पर अटकना नहीं; जो है, उसी से रास्ता निकाल लेना। यही सोच, बरसों बाद, महमूरगंज में खड़े Hotel Sankalp Banaras तक ले आई। लेकिन कोयले के लोटे से यहां तक का रास्ता सीधा नहीं था।
इस कहानी में क्या मिलेगा?
✓ एक लोटे में भरा कोयला — बचपन की कमी के बीच से निकला एक छोटा-सा रास्ता।
✓ मोहल्ले के डॉक्टर का साथ — जहां पढ़ाई की जगह एक हुनर मिला, और भरोसे का पहला सबक भी।
✓ साइकिल, कपड़ा और लोहता का रोज़ का सफर — हर मौसम में साढ़े आठ किलोमीटर, और एक दुकान जिसने आगे चलकर नया रास्ता खोला।
✓ ज़मीन के कारोबार में अपना तरीका — brokerage नहीं, अपना पैसा और अपना जोखिम।
✓ 2013 और उसके बाद — निर्माण से Hotel Sankalp Banaras तक का सफर, और कमाई से आगे बढ़कर सेवा का सपना।
लोहता की दुकान तक साइकिल से रोज़ का सफर
जिस डॉक्टर के यहां प्रकाश सिंह ने इंजेक्शन लगाना सीखा था, उन्हीं डॉक्टर ने आगे चलकर लोहता में कपड़े की दुकान शुरू की। यहीं से एक नया रोज़नामचा शुरू हुआ—सुबह घर से निकलना, साइकिल उठाना और करीब साढ़े आठ किलोमीटर का रास्ता तय करके लोहता पहुंचना। ठंड हो या गर्मी, यह सिलसिला चलता रहा।
पहुंचते ही काम शुरू होता—गोदाम से करीब 40 किलो के कपड़े के बंडल उतारना, चबूतरे पर दुकान लगाना और फोल्डिंग बिछाना। रोज़ आठ से दस बंडलों तक का काम होता था। दुकान सजाने के बाद बारी आती थी बिक्री की। प्रकाश सिंह बताते हैं कि सेल में उनकी अच्छी पकड़ थी और सुबह की पहली बिक्री, यानी ‘बोहनी’, उनके लिए खास मायने रखती थी।
दिन भर दुकान पर कपड़ा बेचने के बाद वही करीब साढ़े आठ किलोमीटर का रास्ता साइकिल से वापस तय होता। आना-जाना मिलाकर रोज़ करीब 17 किलोमीटर। कई साल तक यही दिनचर्या बनी रही।
समय के साथ काम का रिश्ता भी बदला। जिस डॉक्टर के साथ काम करते हुए कपड़ा बेचने का हुनर और बाजार की समझ विकसित हुई थी, उन्होंने आगे चलकर प्रकाश सिंह को दुकान में पार्टनर बना लिया। यह बदलाव अचानक नहीं आया था; उसके पीछे लगातार काम करते रहने के कई साल थे।

घर में पैसों की तंगी, और वह रास्ता जो साइकिल से आगे निकला
लोहता की दुकान भरोसे से चल रही थी, लेकिन घर की हालत अब भी आसान नहीं थी। पिता खुद माहिर कारीगर थे, फिर भी आमदनी हमेशा स्थिर नहीं रहती थी। ऐसे समय में भी पिता का अपना एक तरीका था। सुबह घर से निकलते वक़्त, जब कभी संभव होता, वे चुपचाप कुछ पैसे प्रकाश सिंह की जेब में रख देते और कहते कि मां को मत बताना। बच्चों को मारने के खिलाफ भी उनका साफ नजरिया था—मारना किसी समस्या का हल नहीं।
मोहल्ले के गरीब सब्ज़ी और दूध वालों का उधार भी पिता चुपचाप चुका देते थे। इसका पता बाद में तब चला, जब लोग पैसे मांगने घर आने लगे। आगे चलकर घर का हिसाब-किताब प्रकाश सिंह ने खुद संभाल लिया, ताकि पैसों की यह उलझन कुछ कम की जा सके।
तंगी बढ़ी तो एक दिन मां ने साफ कह दिया—“जाओ, टाली चलाओ, ऑटो चलाओ, कुछ भी करो, लेकिन घर में मत बैठो।” टाली यानी हाथ से चलने वाली तिपहिया गाड़ी। प्रकाश सिंह ने कोशिश भी की। करीब पंद्रह दिन अरविंद मंडी से सामान लादकर रेलवे के पार्सल घर तक ऑटो चलाया। लेकिन पैसों को लेकर सिखाने वाले से हुई अनबन के बाद वह काम छोड़ दिया।
फिर रास्ता वापस उसी डॉक्टर की तरफ गया, जहां पहले से भरोसे का रिश्ता था।
इसी दौर में बचत की एक कमेटी से जुड़ने का मौका मिला। बारी आने पर जमा रकम का इस्तेमाल महमूरगंज के पास दो कमरे बनवाने में हुआ। यह शुरुआती संपत्ति थी, जिसे अपने दम पर खड़ा करने का अनुभव मिला।
साइकिल से लोहता जाने वाला रास्ता अब पीछे छूट रहा था। काम के साथ कमाई को संभालने और उसे आगे लगाने की समझ भी बन रही थी।

ज़मीन के कारोबार में brokerage नहीं, अपना पैसा
कपड़े का काम पीछे छूटा तो प्रकाश सिंह ज़मीन के कारोबार में आए। तरीका साफ था—brokerage नहीं करनी है। जमीन के मालिक को advance payment देना, काग़ज़ी प्रक्रिया पूरी करना और फिर उसी जमीन पर अपने स्तर से कारोबार आगे बढ़ाना इस काम का हिस्सा था।
यानी सिर्फ खरीदार और बेचने वाले के बीच खड़े होकर कमीशन लेना उनका मॉडल नहीं था। पैसा अपना लगता था और जोखिम भी अपना होता था।
इस काम में बड़े सौदों के लिए भरोसेमंद लोगों को साथ जोड़ना भी पड़ा। कमाई हुई, अनुभव मिला और कारोबार का दायरा बढ़ा। शुरुआत में एक दोस्त के जरिए लगाए गए पैसे के फंस जाने जैसी मुश्किल भी आई, लेकिन काम रुका नहीं।
धीरे-धीरे जमीन के कारोबार से आगे कुछ अपना खड़ा करने की इच्छा बनने लगी—ऐसा काम जिसमें सौदे के बजाय अपनी पहचान और अपना बनाया हुआ काम सामने हो।
करीब 2013 के आसपास निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा।
उसी दौर में पिता का निधन भी हुआ।
एक तरफ निजी नुकसान था, दूसरी तरफ कारोबार का नया रास्ता खुल रहा था।
रुकने का समय नहीं था। काम आगे बढ़ता रहा।
एक होटल बनाने का ख़याल आख़िर आया कहां से?
ज़मीन के कारोबार में सालों गुज़ारने के बाद, करीब 2013 के आसपास निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा। एक इंजीनियर से हिसाब लगवाया गया और होटल बनाने की लागत का एक बड़ा अनुमान सामने आया।
लेकिन इस फैसले के पीछे सिर्फ मुनाफ़े का हिसाब नहीं था।
शहर में बड़े लोगों के अपने होटल देखकर एक इच्छा बनी—अपना भी एक होटल होना चाहिए। कारोबार में अब तक जमीन और सौदों के साथ काम हुआ था; इस बार ऐसा कुछ खड़ा करने का विचार था, जिसकी अपनी पहचान हो।
फिर भी जोखिम को लेकर सोच व्यावहारिक थी। अगर होटल का कारोबार उम्मीद के मुताबिक नहीं चला, तो इमारत को किराये पर देकर जमीन के कारोबार को जारी रखा जा सकता था। यानी सपना बड़ा था, लेकिन उसके साथ एक दूसरा रास्ता भी सोचा गया था।

निर्माण के दौरान भाई और भतीजे का साथ भी मिला। इसी दौर में पिता का निधन भी हुआ।
एक तरफ नई इमारत आकार ले रही थी, दूसरी तरफ घर में एक बड़ा खालीपन आ गया था।
दोनों चीजें एक ही समय में चल रही थीं।
महमूरगंज में बन रही यह इमारत आगे चलकर Hotel Sankalp Banaras बनी।
कमाई से आगे — सेवा की सोच कहां से आई?
होटल की इमारत बन रही थी। इसी दौर में परिवार को इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। निजी अस्पताल से लेकर सरकारी अस्पताल तक का अनुभव रहा। इस दौरान इलाज का खर्च और मरीज के परिवार की परेशानियां करीब से देखने को मिलीं।
यहीं से एक विचार मन में आया—कभी अपना अस्पताल बना तो इलाज ऐसा हो, जो आम आदमी की पहुंच में रहे।
यह अभी कोई तैयार योजना नहीं, बल्कि एक सपना है। लेकिन इसी सोच ने सामाजिक काम की तरफ भी रास्ता खोला।
प्रकाश सिंह ॐ शिवा फाउंडेशन से जुड़े, जिसकी शुरुआत दीपक श्रीवास्तव ने की थी। फाउंडेशन के साथ मुदित अग्रवाल और गुंजन भी जुड़े हैं, और प्रकाश सिंह इसके निदेशकों में से एक हैं। संस्था के जरिए जरूरतमंद लोगों की मदद और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी होती रही है।

अस्पताल का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है।
लेकिन कहानी में एक दिलचस्प घेरा जरूर बनता है—कभी मोहल्ले के डॉक्टर के यहां इंजेक्शन लगाने से शुरू हुआ सफर, अब एक ऐसे अस्पताल के सपने तक पहुंच गया है जहां इलाज पैसे से ज्यादा भरोसे की बात हो।
आज होटल संकल्प में क्या बदल गया, और क्या नहीं?
आज महमूरगंज में खड़ा Hotel Sankalp Banaras सिर्फ़ कमरों का नाम नहीं है। यहां क़रीब 200 मेहमानों की क्षमता वाला बैंक्वेट हॉल है, 70 लोगों के बैठने लायक़ एक रूफ़टॉप रेस्टोरेंट, और फ़ैमिली से लेकर डीलक्स-ट्रिपल तक कई श्रेणियों में फैले करीब 30 कमरे। यहां 250–300 मेहमानों तक की शादियां होती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और दूसरे आयोजन भी।
लेकिन प्रकाश सिंह ख़ुद मानते हैं कि होटल का असली अंग सर्विस है, दीवारें नहीं। अगर किसी मेहमान को कोई शिकायत है, तो उनका अपना नियम साफ़ है—बहस मत करो, कमरा बदल दो। उनका तर्क है कि बहस से बात और बिगड़ती है, जबकि तुरंत हल निकालने से भरोसा बनता है।
होटल पूरी तरह शाकाहारी है—यह कोई मजबूरी नहीं, बल्कि सोची-समझी पहचान है। काशी को एक सांस्कृतिक-आध्यात्मिक केंद्र मानते हुए, यही उन्हें अपने होटल के लिए सही रास्ता लगा। मेन्यू में कोई एक “सिग्नेचर डिश” नहीं, लेकिन पारंपरिक शाकाहारी खाना ज़रूरत के मुताबिक़ ढाला जाता है—जैसे अग्रवाल, मारवाड़ी या इस्कॉन मेहमानों के लिए बिना प्याज़-लहसुन का खाना।
सफ़ाई को लेकर भी एक सीधा नियम है—अगर बिस्तर की चादर पर कोई बैठ भी गया हो, तो उसे बदल दिया जाता है। इसलिए हर कमरे के लिए दो-तीन सेट हमेशा तैयार रहते हैं।
लोकेशन भी होटल के काम आती है—बाज़ार से क़रीब दो किलोमीटर, कैंट स्टेशन से ढाई किलोमीटर और बीएचयू व रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर के नज़दीक।

इसी भरोसे की एक मिसाल प्रकाश सिंह ख़ुद सुनाते हैं—एक मेहमान, जो पहले शहर के एक बड़े होटल में ₹8,000 का कमरा लेता था, अब कम क़ीमत पर Hotel Sankalp Banaras का नियमित मेहमान बन चुका है।
लोहता की दुकान में सुबह की “बोहनी” दिन की शुरुआत होती थी। आज होटल में काम का पैमाना बदल गया है, लेकिन एक बात शायद नहीं बदली—ग्राहक का भरोसा।
कहानी से मिली जीवन की सीख
हर कहानी सिर्फ़ यह नहीं बताती कि कोई कहां पहुंचा। कभी-कभी यह भी दिखाती है कि रास्ते में क्या सीखा जा सकता है।
कहानी के बाद, कुछ सवाल
प्रकाश सिंह का कारोबार ज़मीन से होटल तक कैसे पहुंचा?
रियल एस्टेट में अपने पैसे से काम करने के बाद निर्माण की दिशा में कदम बढ़ा। होटल उसी कारोबारी सफर का अगला पड़ाव बना—जहां जमीन के सौदे की जगह एक पूरी इमारत और उसकी अपनी पहचान सामने थी।
Hotel Sankalp Banaras को सिर्फ़ एक होटल से अलग क्या बनाता है?
यहां hospitality को सिर्फ कमरे और सुविधाओं तक सीमित नहीं माना जाता। मेहमान की परेशानी का तुरंत समाधान करना, खाने की अलग-अलग जरूरतों को समझना और सफाई में अतिरिक्त सावधानी रखना काम करने के उसी तरीके का हिस्सा है।
प्रकाश सिंह के लिए अस्पताल का सपना कहां से आया?
परिवार में इलाज से जुड़े अनुभवों के दौरान अस्पतालों और मरीजों की परेशानियों को करीब से देखने का मौका मिला। इसी से ऐसा अस्पताल बनाने का विचार आया, जहां इलाज आम आदमी की पहुंच में हो।
ॐ शिवा फाउंडेशन से जुड़ने की वजह क्या रही?
सामाजिक काम की दिशा में बढ़ते कदम के साथ प्रकाश सिंह ॐ शिवा फाउंडेशन से जुड़े। संस्था के माध्यम से जरूरतमंदों की मदद और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी होती है।
क्या Hotel Sankalp Banaras का सफर यहीं रुक जाता है?
नहीं। होटल आज एक स्थापित कारोबार है, लेकिन अस्पताल का सपना अभी बाकी है। यही अधूरापन इस कहानी को पूरी तरह बंद होने के बजाय आगे बढ़ने की जगह देता है।
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