एक झटके में सब कुछ बदल सकता है — यह बात Kunal Gaurav ने ऑफिस के गेट पर खड़े होकर सीखी
कहानी एक नज़र में — कुणाल गौरव
“ बैंक किसी का अपना नहीं होता — उसे सिर्फ अपना पैसा चाहिए। यही सच मुझे उस दौर में समझ आया, जब हर दरवाज़ा बंद था।
कुणाल गौरव का सफ़र
एक झटके में सब कुछ बदल सकता है — यह बात उन्होंने ऑफिस के गेट पर खड़े होकर सीखी
9 अक्टूबर की वह सुबह किसी और आम दिन जैसी ही लगी थी — वही रोज़ का रास्ता, वही ऑफिस का गेट। लेकिन इस बार गेट पर सिक्योरिटी गार्ड ने रोका, कागज़ थमाया, और एक लाइन बोली — नौकरी अब नहीं रहेगी। यह 2008 का वह दौर था जब देश की एक बड़ी वित्तीय कंपनी में मचे संकट ने हज़ारों लोगों की नौकरियाँ एक झटके में छीन लीं। उन्हीं में एक नाम था — कुणाल गौरव (Kunal Gaurav)।
आज दिल्ली एनसीआर में एक भरोसेमंद, RERA सर्टिफाइड रियल एस्टेट कंसल्टेंट के रूप में पहचाने जाने वाले कुणाल का यह सफ़र सीधी सड़क नहीं रहा। यह कहानी है बार-बार गिरने, फिर भी हार न मानने की — और यह सीखने की कि कभी-कभी सबसे बड़ा सहारा कोई डिग्री नहीं, बल्कि सही मेंटर होता है।
पढ़ाई अधूरी, दिशा गुम — पर सीख हमेशा साथ रही
कुणाल की शुरुआती ज़िंदगी उतनी सीधी नहीं थी जितनी आज की उनकी पहचान बताती है। कॉलेज के दिनों में मीडिया की पढ़ाई शुरू की, लेकिन एक निजी उलझन में करियर की दिशा भटक गई — पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी, और साथ ही एक स्थिर शुरुआत का मौका भी हाथ से निकल गया। यह एक ऐसी सीख थी जिसने उन्हें आगे चलकर सतर्क बना दिया — कि निजी फैसलों को करियर के फैसलों पर हावी नहीं होने देना चाहिए।
बिना किसी मेंटर के, बिना किसी मार्गदर्शन के, उन्होंने खुद रास्ता तलाशना शुरू किया। नौकरी की तलाश में हर जगह एक ही दीवार मिली — उम्र, अनुभव और शिक्षा का मेल न बैठना। कई कंपनियों में इंटरव्यू दिए, कई जगह ‘ना’ सुना। लेकिन हर “ना” के बाद वे फिर दरवाज़ा खटखटाते रहे।
बेंगलुरु की सड़कों पर पहली नौकरी — और पहला सबक

आख़िरकार एक मौका मिला — इंश्योरेंस सेल्स में। यहीं से शुरू हुआ कुणाल का असली करियर। बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टर में काम करते हुए उन्होंने HDFC स्टैंडर्ड लाइफ़, HSBC और स्टैंडर्ड चार्टर्ड जैसी कंपनियों में समय बिताया। हर नौकरी में उन्होंने कुछ नया सीखा — ग्राहक को समझना, भरोसा बनाना, और मुश्किल बाज़ार में भी टिके रहना।
लेकिन 2008 में जब देश के शेयर बाज़ार में बड़ा संकट आया, तो उसका सीधा असर उनकी नौकरी पर पड़ा। एक सुबह, बिना किसी पूर्व चेतावनी के, उन्हें कंपनी से निकाल दिया गया। यह सिर्फ एक नौकरी का जाना नहीं था — यह उस भरोसे का टूटना था जो उन्होंने सालों की मेहनत से बनाया था।
जब घर में कोई साथ नहीं देता, तब कौन देता है?
इस मुश्किल दौर में कुणाल के परिवार से पूरा साथ नहीं मिल पाया — यह उन्होंने खुद खुलकर स्वीकार किया है। लेकिन एक शख्स डटी रही — उनकी पत्नी। बिना किसी शिकायत के, बिना किसी सवाल के, उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूँजी और गहने बेचकर घर चलाया। डेढ़ साल — यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, यह हर सुबह दोहराया गया वह भरोसा है जो किसी बड़े वादे के बिना निभाया गया।
यह वह दौर था जब रिश्तेदार भी फ़ोन उठाने से कतराने लगे थे। कुणाल कहते हैं — “बैंक किसी का अपना नहीं होता — उसे सिर्फ अपना पैसा चाहिए।” यही सच उन्होंने उस समय बहुत करीब से देखा, जब पैसों की तंगी में हर दरवाज़ा बंद मिलता गया।
एक मेंटर की मुलाक़ात, जिसने पूरी दिशा बदल दी
एक सही मेंटर मिलना कुणाल गौरव के करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ — यही मुलाक़ात उन्हें ट्रांसपोर्ट-वेयरहाउसिंग से होते हुए आगे चलकर रियल एस्टेट तक ले गई। नौकरी छूटने के बाद के महीनों में कुणाल की मुलाक़ात राकेश बंसल से हुई — एक ऐसे शख्स जिन्होंने बिना किसी शर्त के उन्हें अपने ट्रांसपोर्ट और वेयरहाउसिंग व्यवसाय में मौका दिया। यहीं से कुणाल को पहली बार असली मेंटरशिप का मतलब समझ आया।
बंसल का एक सीधा फ़लसफ़ा था — “अपने काम को मत छोड़िए। ज़मीन पर बीज डालते रहिए, कुछ चिड़िया खा जाएगी, कुछ बह जाएगा — जो बचेगा, वही फ़सल होगा।” यह सिर्फ बिज़नेस की सलाह नहीं थी, यह धैर्य और निरंतरता का पाठ था — जो कुणाल ने अपनी बाद की पूरी ज़िंदगी में उतारा।
धीरे-धीरे कुणाल ने ट्रांसपोर्ट, वेयरहाउसिंग और फिर कमर्शियल स्पेस लीज़िंग में काम सीखा — बड़ी मैन्युफ़ैक्चरिंग कंपनियों के लिए गोदाम और जगह की ज़रूरतें समझना, उन्हें सही समाधान देना। यह वह अनुभव था जिसने आगे चलकर उन्हें रियल एस्टेट की दुनिया के लिए तैयार किया — बिना उन्हें खुद इस बात का अंदाज़ा हुए।
जब दोबारा सब कुछ बिखरने लगा
करियर स्थिर होता, उससे पहले एक और झटका लगा — स्टॉक मार्केट में हुए भारी नुकसान से आर्थिक दबाव बढ़ गया। परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए कुणाल मुज़फ़्फ़रपुर लौट आए और वहाँ अपनी जमा-पूँजी से एक कपड़े की दुकान खोली। लेकिन व्यापार में साख (उधारी) संभालना आसान नहीं था — बाज़ार का संतुलन बिगड़ते ही दुकान डूबने लगी।
इसी बीच, राकेश बंसल का अचानक निधन हो गया। यह सिर्फ एक मेंटर की क्षति नहीं थी — यह उस भरोसे के खंभे का गिरना था जिस पर कुणाल ने पिछले कई साल टिके रहे थे। लेकिन उन्होंने बंसल को दिया अपना वचन नहीं तोड़ा — उनके किसी भी प्रतिस्पर्धी व्यवसाय में बेहतर पैकेज मिलने के बावजूद, उन्होंने कभी वहाँ काम नहीं किया।

दिल्ली एनसीआर में नई शुरुआत — और दूसरा मेंटर
बंसल की क्षति के बाद कुणाल ने बेंगलुरु छोड़ दिया और दिल्ली एनसीआर में बसने का फ़ैसला किया। यहीं उनकी मुलाक़ात अमित हरजाई से हुई — जिन्होंने उन्हें एक सीधी बात समझाई:
“आप पिछले 15 साल से रियल एस्टेट में ही हैं — बस प्रोडक्ट बदला है, मार्केटिंग नहीं बदली।”
इस एक सोच ने कुणाल को रियल एस्टेट ब्रोकरेज में उतरने का भरोसा दिया। उन्होंने रेज़िडेंशियल फ़्लैट्स से शुरुआत की और आज कमर्शियल दुकानों, ऑफ़िसों और बड़े प्लॉट्स तक अपना काम फैला चुके हैं।
आज एक भरोसेमंद नाम — पर सफ़र यहीं ख़त्म नहीं
आज कुणाल गौरव दिल्ली एनसीआर में एक RERA सर्टिफाइड रियल एस्टेट कंसल्टेंट के रूप में जाने जाते हैं, जो सरकार द्वारा तय किए गए नियमों और पारदर्शिता मानकों का पालन करते हुए काम करते हैं। दिल्ली एनसीआर के Real Estate क्षेत्र में उन्होंने एक भरोसेमंद पहचान बनाई है, जो सालों की मेहनत और एक टूटे न होने वाले वचन की बुनियाद पर खड़ी है।
उनकी कहानी किसी चमत्कार की नहीं है। यह उस हर आम इंसान की कहानी है जो बिना किसी गॉडफादर के, बिना किसी तैयार रास्ते के, सिर्फ धैर्य और सही मार्गदर्शन के सहारे खुद को बार-बार खड़ा करता है।
InnaMax View
कुणाल गौरव की कहानी हमें एक ज़रूरी सच याद दिलाती है:
यह कहानी हर उस पाठक के लिए है जो आज किसी मोड़ पर हार मानने की सोच रहा है।

जो सवाल मन में आते हैं
Q1. क्या हर करियर संकट में मेंटर मिलना ज़रूरी है?
ज़रूरी नहीं कि हर बार तैयार मेंटर मिले, लेकिन सही मार्गदर्शन खोजने की कोशिश जारी रखना असफलता से उबरने की सबसे बड़ी कुंजी साबित हो सकती है।
Q2. RERA सर्टिफिकेशन आम खरीदार के लिए क्यों मायने रखता है?
यह सर्टिफिकेशन यह सुनिश्चित करता है कि कंसल्टेंट सरकार द्वारा तय पारदर्शिता और नियमों का पालन कर रहा है, जिससे धोखाधड़ी की संभावना काफ़ी कम हो जाती है।
Q3. आर्थिक संकट के दौर में परिवार का साथ न मिलना कितना आम है?
यह उतना असामान्य नहीं जितना लगता है — पैसों की तंगी अक्सर रिश्तों की असली परीक्षा बन जाती है, और यही वह दौर होता है जब असली साथी पहचान में आते हैं।
Q4. क्या नौकरी बार-बार बदलना करियर के लिए नुकसानदायक होता है?
हर बदलाव नुकसानदायक नहीं होता — अगर हर नौकरी से कुछ नया सीखा जाए, तो बार-बार का बदलाव भी आगे चलकर एक मज़बूत अनुभव की बुनियाद बन सकता है।
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