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“राजनीति में आना मेरी इच्छा नहीं थी”: मीना चौबे की 30 साल लंबी यात्रा



राजनीति में आना उनका लक्ष्य नहीं था। फिर ऐसा क्या हुआ कि सामाजिक काम और लेखन से जुड़ी एक महिला काशी में संगठन और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बन गई?

मीना चौबे इस सवाल का जवाब अपनी यात्रा के शुरुआती वर्षों में तलाशती हैं। जब उनसे पूछा गया कि सक्रिय राजनीति और संगठन की ओर आने की उनकी व्यक्तिगत यात्रा कहां से शुरू हुई, तो उनका जवाब सीधा था—“यह राजनीति में आने जैसी मेरी इच्छा नहीं थी।”

उनके मुताबिक, काशी आने से पहले उनका जीवन सामाजिक गतिविधियों और लेखन से जुड़ा था। महिलाओं की मदद करना और उनके बीच काम करना उनके सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

लेकिन फिर काशी आया।

और उसके साथ खुला सार्वजनिक जीवन का वह रास्ता, जिस पर चलते हुए करीब तीन दशक बीत गए।


मीना चौबे की कहानी एक नज़र में

शुरुआत: राजनीति से पहले सामाजिक काम और लेखन से जुड़ाव।
काशी का मोड़: 1990s में संगठन से जुड़ाव ने सार्वजनिक जीवन की दिशा बदली।
तीन दशक: संगठनात्मक जिम्मेदारियों के साथ महिलाओं और जमीनी स्तर पर काम।
जमीन से जुड़ाव: गांव की महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों और अलग-अलग वर्गों के साथ संवाद।
मुख्य विचार: उनके अनुभव में संगठन, परिवार और सार्वजनिक जीवन—तीनों में संवाद और समन्वय की अहम भूमिका है।

इस Profile में: सामाजिक जीवन से राजनीति तक का सफर, 1990s का माहौल, महिलाओं के बीच काम, गांव का एक यादगार अनुभव, 50 फोन की दिनचर्या और परिवार को लेकर उनकी सोच।


राजनीति की इच्छा नहीं थी, फिर काशी में रास्ता बदला कैसे?

मीना चौबे के मुताबिक, उनकी पृष्ठभूमि संघ परिवार और सेविका समिति से जुड़ी रही। उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन का दौर भी देखा। लेकिन राजनीति में सक्रिय भूमिका की शुरुआत काशी आने के बाद हुई।

1990s में संगठन के भीतर उनकी सक्रियता बढ़ी। उस समय राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी सीमित थी और, उनके अनुभव के मुताबिक, राजनीति में आने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को लेकर समाज की धारणा भी बहुत सहज नहीं थी।

वह बताती हैं कि उनकी बोलने की क्षमता और सक्रियता को देखते हुए उन्हें महिलाओं के बीच काम करने और संगठन को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ाया गया। उस दौर में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना भी उनके काम का हिस्सा बना।

1996 के आसपास की एक बात उन्हें अब भी याद है। वह बताती हैं कि संगठन के कुछ लोग उन्हें “इंजीनियर साहब की पत्नी जो है वो नेता है” कहकर देखते थे।

उनकी स्मृति में यह टिप्पणी उस दौर की उस सामाजिक धारणा को भी दिखाती है, जब किसी महिला का सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय होना अपने आप में चर्चा का विषय बन जाता था।


लेखन और सामाजिक काम पहले से था, फिर संगठन ने क्या बदल दिया?

काशी आने से पहले मीना चौबे अपने जीवन को सामाजिक गतिविधियों और लेखन से जोड़ती हैं।

वह बताती हैं कि वह लिखती थीं, 2004 से एक magazine निकाल रही हैं और editor की भूमिका में रही हैं। कई किताबें लिखने का भी वह उल्लेख करती हैं।

लेकिन उनके लिए लेखन सिर्फ एक पेशेवर गतिविधि नहीं था। महिलाओं के साथ काम करना और लोगों की मदद कैसे हो सकती है, महिलाओं की स्थिति में क्या किया जा सकता है—ये सवाल उनके सामाजिक काम का हिस्सा रहे।

यहीं उनकी कहानी का एक दिलचस्प मोड़ दिखाई देता है।

सामाजिक काम में लोगों के बीच जाना और संगठन में महिलाओं के बीच काम करना, उनके अनुभव में, पूरी तरह अलग रास्ते नहीं थे। फर्क यह था कि संगठन के साथ जुड़ने के बाद इन रिश्तों और संवादों को एक संगठित जिम्मेदारी का रूप मिल गया।

यही वह बदलाव था, जिसने उनके सामाजिक जीवन और आगे बनने वाले सार्वजनिक जीवन के बीच एक कड़ी तैयार की।


1990s में राजनीति में जगह बनाना कितना आसान था?

मीना चौबे के अनुसार, उस समय राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी बहुत कम थी। वह यह भी बताती हैं कि राजनीतिक क्षेत्र में आने की इच्छा रखने वाली महिलाओं को लेकर समाज की धारणाएं बहुत अनुकूल नहीं थीं।

लेकिन काशी में संगठन से जुड़ने के बाद उनके सामने सिर्फ राजनीतिक जगह बनाने की चुनौती नहीं थी।

लोगों तक पहुंचना था। महिलाओं के बीच जाना था। गांव, मंडल और वार्ड स्तर तक संपर्क बनाना था। उनके वर्णन में महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और संगठन की गतिविधियों से उन्हें जोड़ना भी इस काम का हिस्सा था।

यानी संगठन का काम केवल बैठकों या मंच तक सीमित नहीं था। उसका एक बड़ा हिस्सा लोगों के बीच जाकर संपर्क बनाने में था।

और उनकी कहानी में राजनीति का यही दूसरा चेहरा दिखाई देता है—मंच पर बोलने से पहले लोगों के बीच जाना।


महिलाओं की सभा को संबोधित करतीं मीना चौबे
महिलाओं के बीच संवाद और संगठनात्मक काम उनके सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

महिलाओं के बीच जाने पर क्या दिखता था, जो मंच से नहीं दिखता?

मीना चौबे अपने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के साथ अलग-अलग स्तरों पर संपर्क का उल्लेख करती हैं।

एक तरफ गांवों में रहने वाली महिलाएं थीं। दूसरी तरफ engineers, doctors, CAs, professors और teachers जैसी educated professional women भी थीं।

उनके मुताबिक, इन महिलाओं के साथ बातचीत के अनुभव एक जैसे नहीं थे। सामाजिक और पेशेवर पृष्ठभूमि अलग होने के साथ उनकी परिस्थितियां और जरूरतें भी अलग थीं।

यानी उनके अनुभव में “महिला” कोई एक जैसी सामाजिक श्रेणी नहीं थी।

ग्रामीण महिलाओं के बीच काम करते हुए उनके रोजमर्रा के जीवन और परिस्थितियों को करीब से जानने का अवसर मिलता था। वहीं educated professional women के साथ बातचीत में उनके अलग सामाजिक और पेशेवर अनुभव सामने आते थे।

इस पूरी प्रक्रिया में एक बात लगातार बनी रही—लोगों तक पहुंचना सिर्फ संपर्क बनाने का काम नहीं था, उन्हें समझना भी उसका हिस्सा था।


एक गांव में स्टील का बक्सा देखकर उन्हें क्या पता चला?

सारनाथ के पास एक गांव का अनुभव मीना चौबे की बताई उन घटनाओं में से है, जिसमें एक छोटा-सा दृश्य महिलाओं की बदलती भूमिका की तस्वीर सामने रखता है।

वह बताती हैं कि वहां 15–20 महिलाएं बैठी थीं। उनके बीच एक बड़ा steel box रखा था। महिलाएं उसमें से सामान निकाल रही थीं और register maintain कर रही थीं।

मीना चौबे ने पूछा कि क्या हो रहा है।

जवाब मिला—“मैं कोषाध्यक्ष हूं।”

इसके बाद उन्हें बताया गया कि उस महिला के समूह के अंतर्गत 60 स्वयं सहायता समूह हैं और वह उनका हिसाब-किताब संभालती हैं।

दृश्य साधारण था—एक steel box, एक register और उसके बीच बैठी महिलाएं। लेकिन मीना चौबे के लिए यह महिलाओं की भूमिका में आए बदलाव को देखने का एक ठोस अनुभव था।

वह ग्रामीण महिलाओं में बढ़ती awareness और self-reliance की बात भी करती हैं। लेकिन यह बात किसी व्यापक निष्कर्ष के बजाय उनके अपने अनुभव और observations के रूप में देखना अधिक उचित है।

इस एक घटना से पूरे ग्रामीण भारत की तस्वीर निकालना सही नहीं होगा। फिर भी, उस महिला का अपने काम को एक जिम्मेदारी के रूप में बताना—“मैं कोषाध्यक्ष हूं”—मीना चौबे की बताई उस तस्वीर को समझने के लिए एक यादगार दृश्य जरूर देता है।


ग्रामीण महिलाएं स्वयं सहायता समूह के रजिस्टर और रिकॉर्ड के साथ
यह एक representative visual है; मीना चौबे ने बातचीत में सारनाथ के पास ऐसा दृश्य देखने का अनुभव साझा किया था।

एक गांव की दुल्हन से सार्वजनिक जीवन तक—कौन-सा बदलाव उन्हें सबसे ज्यादा दिखाई देता है?

महिलाओं की स्थिति में बदलाव की बात करते हुए मीना चौबे अपनी निजी ग्रामीण स्मृति तक लौटती हैं।

वह बताती हैं कि ससुराल के गांव में महिलाओं के लिए शौच की अलग व्यवस्था नहीं थी। खेतों में जाना पड़ता था। दुल्हन बनकर उस गांव में पहुंचने पर उन्हें भी यह रास्ता दिखाया गया था।

आज की स्थिति को देखते हुए वह household toilets, cooking smoke और healthcare जैसे मुद्दों को महिलाओं की dignity, सुविधा और सुरक्षा से जोड़कर देखती हैं। इन बदलावों को वह सरकारी योजनाओं के संदर्भ में भी रखती हैं।

यहां उनके perspective को अलग रखना जरूरी है। इन बदलावों और योजनाओं को लेकर जो बातें सामने आती हैं, वे उनके अनुभव और राजनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा हैं; इन्हें इस Profile में स्वतंत्र उपलब्धि के आंकड़ों या निष्कर्षों की तरह प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।

लेकिन इस हिस्से की अहमियत किसी आंकड़े में नहीं, उस स्मृति में है।

एक दुल्हन के रूप में जिस रास्ते को उन्होंने कभी देखा था, वर्षों बाद वही अनुभव महिलाओं की स्थिति को देखने का एक संदर्भ बन गया।


क्या 50 फोन रोज करना भी राजनीति का हिस्सा हो सकता है?

COVID के दौरान मीना चौबे को एक senior अधिकारी का फोन आया था। उन्होंने उनकी तबीयत के बारे में पूछा। मीना चौबे बताती हैं कि वह बातचीत उनके मन में रह गई—कोई उनकी चिंता कर रहा था।

बाद में, जब वह Chandauli की प्रभारी थीं, तो उन्होंने अपने लिए एक routine बनाया।

रोज 50 फोन।

कभी Shakti Kendra से जुड़े लोगों को, कभी booth-level workers को, कभी पदाधिकारियों को और कभी Mandal presidents को।

इन फोन का मकसद हर बार कोई organisational instruction देना नहीं था।

कभी सिर्फ इतना पूछना था—हालचाल कैसा है? घर-परिवार में सब ठीक है? कोई कठिनाई तो नहीं?

यहीं उनकी नेतृत्व शैली का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। वह इसे किसी असाधारण उपलब्धि की तरह पेश नहीं करतीं। उनके मुताबिक, गाड़ी में चलते-चलते भी 50 फोन किए जा सकते हैं।

उनके लिए इस routine का महत्व संख्या में नहीं, संपर्क बनाए रखने में था।

इसी सोच को वह एक वाक्य में रखती हैं—“समन्वय और संवाद अति आवश्यक है।”


कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करतीं मीना चौबे
सार्वजनिक जीवन में संवाद और संपर्क उनके बताए अनुभवों में लगातार दिखाई देता है।

जो नेता 50 लोगों को फोन कर सकता है, क्या वह अपने परिवार से भी उतना ही संवाद कर पाता है?

संगठन के लोगों से नियमित संपर्क की बात करते-करते मीना चौबे परिवार की ओर आती हैं। यहां वह खुद को political worker से अलग social worker के रूप में रखती हैं और परिवारों में बढ़ती संवादहीनता को अपनी एक बड़ी चिंता बताती हैं।

उनका observation है कि आज घर में लोग साथ होते हुए भी अपने-अपने mobile phones में व्यस्त रहते हैं। उनके मुताबिक, बच्चों की देखभाल केवल school और आर्थिक जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं हो सकती; परिवार में बातचीत और साथ भी जरूरी है।

इसी संदर्भ में वह अपनी लिखी जा रही किताब का नाम बताती हैं—“मां तेरे आंचल में राष्ट्र का भविष्य पल रहा है।”

शिक्षा को लेकर भी उनका विचार इसी व्यापक दृष्टि से जुड़ता है। उनके मुताबिक, education केवल employment तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसमें सेवा, परोपकार, माता-पिता और गुरुजनों के प्रति सम्मान तथा मानवीय मूल्यों के लिए भी जगह होनी चाहिए।

यह उनकी family और education को लेकर अपनी समझ है, जिसे इस Profile में उनके perspective के रूप में ही देखना उचित है।

फिर भी, पिछले हिस्से में संगठन के कार्यकर्ताओं से लेकर यहां परिवार तक आते-आते एक बात लगातार बनी रहती है—संवाद।


तीन दशक बाद इस सफर में राजनीति से ज्यादा क्या दिखाई देता है?

करीब तीन दशक लंबे सार्वजनिक जीवन को पदों और जिम्मेदारियों की सूची में समेटना आसान है। लेकिन मीना चौबे के बताए अनुभवों में कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

शुरुआत सामाजिक जीवन और लेखन से होती है। फिर काशी में संगठन से जुड़ाव आता है। महिलाओं के बीच काम करने का अनुभव आता है। समय के साथ जिम्मेदारियां बढ़ती जाती हैं।

लेकिन वर्षों बाद भी उनकी बात बार-बार लोगों से संपर्क पर लौटती है।

कहीं गांव की महिलाएं हैं। कहीं educated professional women। कहीं organisation के workers। और कहीं परिवार के सदस्य।

फिर वही 50 फोन की routine है—जिसमें किसी बड़े भाषण या निर्देश से पहले एक साधारण सवाल भी हो सकता है:

“घर में सब ठीक है?”

शुरुआत में उन्होंने कहा था कि राजनीति में आना उनकी इच्छा नहीं थी।

तीन दशक बाद पीछे मुड़कर देखें तो उनकी कहानी का एक सिरा सामाजिक काम और लेखन से जुड़ा दिखाई देता है, दूसरा संगठन और सार्वजनिक जीवन से। इनके बीच जो धागा बार-बार सामने आता है, वह है—संवाद।

शायद इसी वजह से उनकी यात्रा को केवल इस सवाल से नहीं समझा जा सकता कि वह राजनीति में कैसे आईं।

एक दूसरा सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है—

लोगों के बीच रहते हुए उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन को किस तरह समझा?


कहानी के बाद: मीना चौबे के सफर को समझने वाले कुछ सवाल

1. क्या मीना चौबे के सार्वजनिक जीवन को सिर्फ राजनीति के नजरिए से देखना पर्याप्त होगा?

शायद नहीं। उनके अनुभव में सामाजिक काम, लेखन, संगठन और महिलाओं के साथ लगातार संवाद—इन सभी ने उनके सार्वजनिक जीवन को आकार दिया। राजनीति इस लंबी यात्रा का एक हिस्सा रही है।

2. महिलाओं के साथ काम करने का अनुभव उनके लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों रहा?

उनके अनुभव में महिलाओं से जुड़ाव केवल राजनीतिक भागीदारी तक सीमित नहीं रहा। ग्रामीण महिलाओं से लेकर engineers, doctors, CAs, professors और teachers तक, अलग-अलग वर्गों की महिलाओं से संवाद ने उन्हें समाज को अलग-अलग स्तरों पर समझने का अवसर दिया।

3. ग्रामीण महिलाओं में बदलाव को वह किस तरह देखती हैं?

वह self-help groups और महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को बदलाव के महत्वपूर्ण संकेतों के रूप में देखती हैं। हालांकि, ये उनके व्यक्तिगत अनुभव और observations हैं; इन्हें पूरे ग्रामीण भारत की स्थिति का independent प्रमाण नहीं माना जा सकता।

4. “संवाद” उनके लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों दिखाई देता है?

उनके अनुभव में संवाद केवल संगठन चलाने का माध्यम नहीं है। परिवार, कार्यकर्ताओं और समाज के अलग-अलग वर्गों के साथ संपर्क बनाए रखना उनके लिए रिश्तों और जिम्मेदारी दोनों का हिस्सा है।

5. क्या उनकी 50 फोन वाली दिनचर्या को leadership की एक शैली माना जा सकता है?

इसे उनकी व्यक्तिगत leadership style के रूप में देखा जा सकता है। वह नियमित फोन के जरिए लोगों का हाल पूछने, परिवार की स्थिति जानने और organisation से जुड़े लोगों के साथ संपर्क बनाए रखने पर जोर देती हैं।

6. परिवार को लेकर उनकी चिंता सार्वजनिक जीवन से कैसे जुड़ती है?

उनकी सोच में परिवार और समाज अलग-अलग खांचे नहीं हैं। बच्चों और माता-पिता के बीच बातचीत, परिवार में समय देना और अगली पीढ़ी तक values पहुंचाना उनके लिए सामाजिक जिम्मेदारी का भी हिस्सा है।

7. क्या उनके अनुभव को आज की महिलाओं के राजनीतिक सफर का सामान्य उदाहरण माना जा सकता है?

नहीं। यह एक व्यक्ति की यात्रा है, जिसमें उनके समय, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यक्तिगत अनुभवों की भूमिका रही है। दूसरे लोगों का अनुभव इससे अलग हो सकता है।

8. इस Profile को पढ़ते समय किस बात का ध्यान रखना जरूरी है?

इस कहानी में कई सामाजिक और राजनीतिक बातें मीना चौबे के अनुभव, विचार और observations के आधार पर सामने आती हैं। इसलिए उन्हें उनके perspective के रूप में पढ़ना चाहिए, न कि InnaMax के independent निष्कर्ष के रूप में।


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