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जहां पैसे का लेन-देन नहीं होता, वहां समाज सेवा कैसे चलती है? काशी के Om Shiva Foundation की कहानी


काशी में एक एनजीओ ऐसा भी है जहां न कोई सालाना फीस है, न चंदा लेने की व्यवस्था। संस्था से जुड़ने के लिए एक बार ढाई हजार रुपये की सदस्यता बताई गई है, जिसे जीवनभर की सदस्यता के रूप में रखा गया है।

लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पैसा कितना लिया जाता है। बड़ा सवाल यह है कि अगर समाज सेवा का काम बड़े चंदे और लगातार फंडिंग पर नहीं टिका, तो चलता कैसे है?


Story at a Glance
अलग NGO मॉडल: Om Shiva Foundation बड़े चंदे और सालाना फीस पर निर्भर रहने के बजाय सीमित सदस्यता और व्यक्तिगत भागीदारी के मॉडल की बात करता है।
जरूरतमंद तक पहुंच: गरीब बच्चों की शिक्षा के प्रयास ने दिखाया कि सही beneficiary की पहचान के लिए ground-level पड़ताल कितनी जरूरी है।
जमीन पर मदद: भोजन वितरण, दिव्यांग बच्चों को साइकिल और गरीब बेटियों की शादी में सहायता जैसी पहलों का उल्लेख सामने आया।
अवसर भी, सहायता भी: “Shiva Swaranjali” के जरिए बच्चों को संगीत और प्रतिभा के लिए मंच देने की कोशिश भी foundation के काम का हिस्सा है।
अब अगली चुनौती: दिहाड़ी मजदूरों के लिए प्रस्तावित मुफ्त भोजन व्यवस्था के साथ model की sustainability, transparency और विस्तार की परीक्षा होगी।

The Sudhanshu Show पर हुई बातचीत में Om Shiva Foundation के founder Deepak Kumar Srivastava और trustee Prakash Singh ने संस्था की सोच, उसके काम और जमीन पर सामने आई चुनौतियों के बारे में बताया।

उनकी कहानी एक ऐसे मॉडल की तस्वीर पेश करती है, जिसमें मदद करने से ज्यादा महत्वपूर्ण है यह तय करना कि मदद किसे चाहिए और क्यों।



एक होटल की मुलाकात से शुरू हुई बात, लेकिन मंजिल कुछ और थी

Deepak Kumar Srivastava काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के नेत्र विभाग में Administrative In-charge हैं। इससे पहले वे एक मानवाधिकार संस्था से National Advisor के तौर पर जुड़े रहे और बनारस तथा उत्तर प्रदेश में जमीन पर काम कर चुके हैं।

इसी दौर के एक कार्यक्रम के सिलसिले में उनकी मुलाकात Prakash Singh से उनके होटल में हुई। बातचीत आगे बढ़ी तो यह मुलाकात सिर्फ परिचय तक सीमित नहीं रही। Prakash Singh को foundation के trustee के रूप में साथ जोड़ने का फैसला हुआ और यहीं से एक नई संस्था की नींव रखने का विचार आकार लेने लगा।

लेकिन इस संस्था की सोच पारंपरिक NGO मॉडल से थोड़ी अलग थी।

विचार साफ था—समाज सेवा को पैसे के लेन-देन से जितना संभव हो, उतना दूर रखा जाए। जब सामाजिक काम के साथ लेने की प्रवृत्ति जुड़ती जा रही हो, तब क्या ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जिसमें केंद्र में सिर्फ देने की भावना हो?

इसी सोच के साथ Om Shiva Foundation की शुरुआत हुई। संस्था के registration और NITI Aayog के Darpan portal से जुड़े होने की जानकारी भी सामने आती है। स्थापना की तारीख के तौर पर 31 अक्टूबर का उल्लेख किया गया है।


ढाई हजार रुपये के बाद फिर क्या? यही है इस मॉडल का असली सवाल

Om Shiva Foundation की membership व्यवस्था इस मॉडल को बाकी से अलग बनाती है। यहां कोई annual membership fee नहीं है। शुरुआत में ढाई हजार रुपये की membership ली जाती है और यही membership lifetime के लिए रहती है।

लेकिन असली सवाल रकम का नहीं, इस व्यवस्था के पीछे की सोच का है।

Foundation की शुरुआत सात-आठ लोगों ने अपनी जेब से पैसे मिलाकर की। धीरे-धीरे इससे जुड़ने वालों की संख्या बढ़ी और अब संस्था से सैकड़ों लोगों के जुड़े होने का दावा किया जाता है। अब तक करीब चार से साढ़े छह लाख रुपये खर्च होने की बात भी सामने आती है।

ये आंकड़े foundation के पदाधिकारियों द्वारा बताए गए हैं और स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हैं।

काम का दायरा भी एक ही क्षेत्र तक सीमित नहीं रखा गया। Foundation ने अपनी गतिविधियों को शिक्षा, ग्रामीण विकास, चिकित्सा, प्रशासन और सुशासन, सांस्कृतिक कार्य तथा संगीत-कला-विरासत जैसे अलग-अलग chapters में बांटा है।

इसके साथ transgender community के साथ काम भी इस दायरे में शामिल हुआ। इसकी शुरुआत करीब 45 लोगों के साथ एक workshop से हुई।

इस तरह ढाई हजार रुपये की membership से शुरू होने वाला यह मॉडल सिर्फ आर्थिक सहायता जुटाने की व्यवस्था नहीं दिखता। इसका दावा है कि सदस्यता के जरिए संसाधन जुटाकर उन्हें शिक्षा से लेकर सामाजिक विकास, चिकित्सा और सांस्कृतिक पहलों तक अलग-अलग जरूरतों में लगाया जाए।


गरीब की पहचान कागज पर आसान है, जमीन पर नहीं

दस गरीब बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी लेने का फैसला हुआ तो एक ऐसी मुश्किल सामने आई, जिसने पूरी तस्वीर बदल दी।

किसे गरीब माना जाए?

कुछ लोगों ने अपेक्षाकृत संपन्न रिश्तेदारों के बच्चों को भी जरूरतमंद बताकर आगे करना शुरू कर दिया। कागज पर किसी परिवार को जरूरतमंद बताना आसान था, लेकिन जमीन पर जाकर उसकी वास्तविक स्थिति समझना कहीं ज्यादा मुश्किल निकला।

इसके बाद गांवों का रुख किया गया।

वहां ऐसे बच्चे मिले जो स्कूल जाने की उम्र में बालू ढोने और पानी भरने जैसे काम कर रहे थे। स्कूल क्यों नहीं जाते—यह पूछने पर उनकी जिंदगी की दूसरी तस्वीर सामने आई। पढ़ाई से दूर रहने की वजह सिर्फ स्कूल की कमी नहीं थी; घर और रोजमर्रा की मजबूरियां भी उनके रास्ते में थीं।

मदद की कोशिश को हर जगह आसानी से स्वीकार भी नहीं किया गया। गांव के प्रधान से सहयोग मांगने पर निराशा मिली, जबकि कुछ परिवारों ने तो यह तक कह दिया कि “हमारे बच्चों को बिगाड़ रहे हैं।”

यहीं समाज सेवा का सबसे कठिन सवाल सामने आता है।

जरूरतमंद तक मदद पहुंचाना सिर्फ पैसा देने का काम नहीं है। पहले यह पहचानना पड़ता है कि जरूरत कहां है, उसकी वजह क्या है और मदद वास्तव में बदलाव ला पाएगी या नहीं।

Om Shiva Foundation की कहानी में शिक्षा की यह पहल इसी सवाल को सबसे जमीन से जोड़कर सामने लाती है—किसी को मदद की जरूरत है, यह तय करने के लिए उसके घर तक जाना पड़ सकता है।


ग्रामीण शिक्षा की चुनौती और स्कूल से दूर बच्चों का प्रतीकात्मक दृश्य
शिक्षा तक पहुंच की कहानी में सबसे बड़ी चुनौती जरूरतमंद बच्चों की सही पहचान है।

एक वक्त का खाना, एक साइकिल और किसी बेटी की शादी—मदद की तस्वीर कितनी बड़ी है?

समाज सेवा की असली तस्वीर अक्सर बड़ी घोषणाओं में नहीं, बल्कि उन छोटी जरूरतों में दिखाई देती है जिनका असर सीधे किसी की जिंदगी पर पड़ता है।

Om Shiva Foundation की पहलों में भोजन, दिव्यांग बच्चों की मदद और गरीब बेटियों की शादी जैसे काम शामिल हैं। बनारस के Hanuman Mandir में गरीब बच्चों के लिए भोजन सेवा भी की गई।

दिव्यांग बच्चों को Tricycle उपलब्ध कराने की पहल भी इसी कड़ी का हिस्सा रही। यहां मदद सिर्फ कोई वस्तु देने तक सीमित नहीं रहती; उसका मकसद किसी बच्चे के लिए रोजमर्रा की जिंदगी को थोड़ा आसान बनाना है।

गरीब बेटियों की शादी में सहयोग भी foundation के काम का एक हिस्सा है। संस्था के अनुसार, हर साल ऐसी पांच से ग्यारह शादियों में मदद करने का लक्ष्य रखा जाता है।

इन पहलों के पीछे एक और बात महत्वपूर्ण है—मदद को प्रदर्शन न बनाया जाए। सेवा का अर्थ सिर्फ किसी की जरूरत पूरी करना नहीं, बल्कि उसकी गरिमा को भी बनाए रखना है।

यही सोच इस मॉडल को सिर्फ सहायता देने की गतिविधियों से आगे ले जाती है—जहां भोजन एक जरूरत पूरी करता है, ट्राइसाइकिल किसी की राह आसान करती है और शादी में सहयोग किसी परिवार का बोझ कम कर सकता है।


वाराणसी में दिव्यांग सहायता और भोजन सेवा का प्रतीकात्मक दृश्य
ट्राइसाइकिल और भोजन जैसे सीधे सहयोग समाज सेवा के अलग-अलग रूपों को सामने लाते हैं।

चौराहे पर दिखते मजदूरों ने एक और सवाल खड़ा कर दिया

शहर के एक व्यस्त चौराहे से गुजरते हुए सामने आए दिहाड़ी मजदूरों के हालात ने समाज सेवा का एक और सवाल खड़ा किया—जिसे आज काम नहीं मिला, उसके लिए आज का खाना कौन देगा?

दूर-दराज के इलाकों से काम की तलाश में आने वाले कुछ मजदूरों के सामने काम न मिलने पर भोजन और रात गुजारने जैसी मुश्किलें आ सकती हैं।

इसी जरूरत को देखते हुए ऐसे मजदूरों के लिए रोजाना मुफ्त भोजन उपलब्ध कराने की योजना सामने आई है। इसमें खिचड़ी जैसे सादे भोजन की व्यवस्था का विचार है।

यह अभी चल रही सेवा नहीं, बल्कि foundation की ओर से सामने रखा गया एक प्रस्ताव है। लेकिन इस विचार के पीछे सवाल बड़ा है—क्या समाज सेवा उन लोगों तक भी पहुंच सकती है जो किसी स्थायी सहायता व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन हर दिन काम मिलने की उम्मीद में शहर की सड़कों पर खड़े रहते हैं?

अगर यह पहल जमीन पर शुरू होती है, तो उसके असर को अलग से देखना जरूरी होगा। क्योंकि तब सवाल सिर्फ भोजन बांटने का नहीं रहेगा, बल्कि यह भी होगा कि ऐसी सेवा वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचती है और क्या वह उनके लिए नियमित सहारा बन पाती है।


जब समाज सेवा में खाना नहीं, एक मंच भी जरूरी हो जाता है

समाज सेवा को अक्सर भोजन, कपड़े या आर्थिक मदद तक सीमित समझा जाता है। लेकिन किसी बच्चे को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच देना भी उसके भविष्य में निवेश हो सकता है।

Om Shiva Foundation की गतिविधियों में इसी सोच का एक उदाहरण है “Shiva Swaranjali”—एक संगीत प्रतियोगिता, जिसे Kashi में शुरू किया गया।

इस पहल की प्रेरणा Indian Idol और Sa Re Ga Ma जैसे music platforms से ली गई। इसका उद्देश्य बच्चों को अपनी प्रतिभा सामने लाने का अवसर देना है।

शुरुआत Banaras से हुई, लेकिन यह पहल अब दूसरे शहरों के बच्चों तक भी पहुंचने लगी है। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि बाहर से प्रतिभागियों को लाने के बजाय Banaras के बच्चों को ही मंच देने पर जोर दिया गया।

यहीं से foundation के काम की एक दूसरी तस्वीर सामने आती है। जरूरतमंद को भोजन देना तत्काल जरूरत पूरी करता है, लेकिन किसी बच्चे को सीखने, आगे बढ़ने और अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर देना उसके लिए एक अलग तरह की मदद हो सकती है।

इस लिहाज से Om Shiva Foundation की गतिविधियों में शिक्षा, अवसर, कला और मंच भी समाज सेवा के दायरे का हिस्सा बनते दिखाई देते हैं।


जिस सोच ने मॉडल बनाया, वही इसकी सबसे बड़ी परीक्षा भी है

Om Shiva Foundation की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा कोई एक programme नहीं, बल्कि उसके पीछे की सोच है।

भोजन उपलब्ध कराना, गरीब बच्चों की शिक्षा में मदद करना, दिव्यांग बच्चों को ट्राइसाइकिल देना या गरीब बेटियों की शादी में सहयोग करना—इनमें से कोई भी पहल अपने आप में नई नहीं है। फर्क उस तरीके में दिखाई देता है, जिसमें foundation इन कामों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है।

इस मॉडल में कम से कम आर्थिक लेन-देन, व्यक्तिगत भागीदारी और जरूरतमंद की सही पहचान पर जोर दिखाई देता है।

लेकिन यही मॉडल आगे चलकर अपनी सबसे बड़ी परीक्षा भी देगा।

किसी भी NGO के लिए लंबे समय तक भरोसे के साथ काम करने के लिए transparency, financial records, beneficiary selection और institutional accountability जरूरी होते हैं। जैसे-जैसे संस्था का दायरा बढ़ेगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि membership से जुटाए गए संसाधनों का इस्तेमाल किस तरह होता है, लाभार्थियों का चयन कैसे किया जाता है और अपने impact को foundation किस तरह दर्ज करता है।

फिलहाल, Om Shiva Foundation की शुरुआती यात्रा एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण सवाल सामने रखती है—अगर समाज सेवा का मकसद लेना नहीं, देना हो, तो क्या उसके लिए एक अलग रास्ता बनाया जा सकता है?

शायद इसी भावना को Deepak की कही एक पंक्ति सबसे सरल तरीके से समेटती है:

“डॉक्टर के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अच्छी नींद आती है किसी गरीब की मदद करने से।”


शिक्षा, संगीत और अवसर—समाज सेवा की कहानी का एक व्यापक नजरिया।

इस NGO मॉडल को समझने के लिए 7 जरूरी सवाल


1. Om Shiva Foundation का “बिना पैसे के लेन-देन” वाला मॉडल वास्तव में क्या है?

इसका मतलब यह नहीं है कि संस्था से जुड़े हर काम में कोई पैसा खर्च ही नहीं होता। यहां मुख्य विचार समाज सेवा को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ, लगातार चंदा लेने या सेवा के बदले भुगतान के मॉडल से अलग रखना है। Foundation के प्रतिनिधियों ने बातचीत में इसी सोच को अपनी कार्यप्रणाली का आधार बताया।


2. क्या ऐसा NGO मॉडल लंबे समय तक टिक सकता है?

यह इसकी सबसे बड़ी व्यावहारिक परीक्षा है। किसी भी संस्था की sustainability इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास पर्याप्त संसाधन, स्पष्ट financial records, सक्रिय सदस्य और मजबूत organisational system कितना है। Om Shiva Foundation का आगे का काम बताएगा कि उसका शुरुआती मॉडल कितने बड़े स्तर तक टिकाऊ बन पाता है।


3. जरूरतमंद व्यक्ति की पहचान कौन और कैसे करता है?

यह सवाल खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि आर्थिक स्थिति हमेशा बाहर से दिखाई नहीं देती। Foundation की बातचीत से यह संकेत मिलता है कि केवल किसी के नाम की recommendation पर निर्भर रहने के बजाय ground-level स्थिति को समझना जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि beneficiary selection इस मॉडल की महत्वपूर्ण चुनौती बनकर सामने आती है।


4. क्या समाज सेवा में मदद लेने वाले व्यक्ति की गरिमा भी बचाई जा सकती है?

यही इस कहानी का एक महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है। मदद को publicity से जोड़ने के बजाय privacy और dignity के साथ देने की सोच सामने आती है। खासकर शादी या व्यक्तिगत सहायता जैसे मामलों में यह फर्क महत्वपूर्ण हो सकता है कि मदद को उपलब्धि की तरह दिखाया जाए या जरूरतमंद की गरिमा के साथ दिया जाए।


5. क्या केवल membership के भरोसे किसी सामाजिक संस्था को बड़ा किया जा सकता है?

यह केवल Om Shiva Foundation का नहीं, बल्कि छोटे और community-led organisations का बड़ा सवाल है। Membership शुरुआती संसाधन और लोगों की भागीदारी दे सकती है, लेकिन संस्था के विस्तार के साथ administration, documentation, programme costs और accountability की जरूरत भी बढ़ती है। इसलिए scale के साथ model की transparency और financial planning भी महत्वपूर्ण होगी।


6. इस तरह के NGO की सफलता को कैसे मापा जाना चाहिए?

सिर्फ यह गिनना पर्याप्त नहीं कि कितने लोगों को भोजन मिला या कितनी सहायता दी गई। ज्यादा महत्वपूर्ण यह देखना है कि intervention से लोगों की स्थिति में वास्तविक बदलाव कितना आया—जैसे कोई बच्चा लगातार school में बना रहा या किसी परिवार की स्थिति लंबे समय में बेहतर हुई। Impact documentation आगे foundation की credibility को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार हो सकता है।


7. क्या Om Shiva Foundation का यह मॉडल दूसरे शहरों में भी अपनाया जा सकता है?

सिद्धांत के स्तर पर community participation, जरूरतमंद की सही पहचान और transparent working जैसे तत्व दूसरे शहरों में भी अपनाए जा सकते हैं। लेकिन हर शहर की जरूरत, स्थानीय समुदाय और संसाधन अलग होते हैं। इसलिए इस मॉडल को ज्यों का त्यों copy करने के बजाय उसके मूल principles को स्थानीय जरूरतों के अनुसार अपनाना ज्यादा व्यावहारिक होगा।


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