पुराने कुएँ के पास ली गई selfie में कौन खड़ा था?
गाँव में एक कहावत थी—“सूरज ढलने के बाद पुराने कुएँ के पास मत जाना।”
सब हँसते थे।
आदित्य भी हँसा।
दिल्ली में पला-बढ़ा था। गर्मियों की छुट्टियों में पहली बार अपने दादा के गाँव आया था। उसे लगा, “ये सब अंधविश्वास है।”
उस रात बिजली चली गई।
दोस्तों ने चैलेंज दिया, “अगर इतना ही बहादुर है, तो कुएँ तक जाकर एक सेल्फी लेकर आ।”
आदित्य मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर निकल पड़ा।
पुराना कुआँ बिल्कुल वैसा ही था जैसा दिन में देखा था।
उसने कैमरा खोला।
क्लिक।
फोटो देखकर वह हँस पड़ा।
लेकिन दूसरी फोटो अपने आप खिंच गई।
उसमें आदित्य अकेला नहीं था।
उसके पीछे एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।
सिर पर सफेद पगड़ी…
हाथ में लालटेन…
और आँखें बिल्कुल काली।
आदित्य घबराकर पीछे मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
वह दौड़ता हुआ घर पहुँचा।
दादी ने फोटो देखी तो उनके हाथ काँपने लगे।
धीरे से बोलीं, “ये… तेरे परदादा हैं।”
आदित्य चौंक गया।
“लेकिन उनकी तो बहुत पहले मौत हो गई थी…”
दादी ने सिर हिलाया।
“हाँ… इसी कुएँ में गिरकर।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
दादी ने बस एक बात कही—
“उन्होंने कभी किसी बच्चे को उस कुएँ के पास नहीं जाने दिया। गाँव वाले इसलिए नहीं रोकते कि वहाँ भूत है…”
“…वे इसलिए रोकते हैं क्योंकि आज भी तेरे परदादा किसी को गिरने नहीं देते।”
आदित्य की साँस थोड़ी सामान्य हुई।
उसे लगा, शायद डरने की ज़रूरत नहीं थी।
तभी उसका मोबाइल फिर से वाइब्रेट हुआ।
गैलरी में एक नई फोटो जुड़ चुकी थी।
यह फोटो उसने नहीं खींची थी।
उसमें पुराना कुआँ दिखाई दे रहा था…
और कुएँ के बिल्कुल किनारे…
आदित्य खड़ा था।
जबकि फोटो लेने के समय…
वह अपने घर के अंदर था।
— समाप्त —
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