दादी के जाने के बाद भी तुलसी सूखी नहीं | Hindi Grief Story
Dadi चली गईं… लेकिन courtyard की tulsi अब भी हरी है।
कुछ आदतें शायद लोगों के बाद भी ज़िंदा रहती हैं।
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दादी हर सुबह courtyard में सबसे पहले तुलसी के पास जाती थीं।
चाय बाद में बनती थी।
पहले पानी।
फिर छोटी steel कटोरी से मिट्टी में तीन बूंदें।
और फिर वही धीमी आवाज़:
“जय तुलसी माता।”
घर में किसी ने कभी नहीं सोचा था कि यह routine भी कभी रुक जाएगा।
फिर एक सर्दी में दादी चली गईं।
तेरहवीं के बाद courtyard कुछ दिनों तक अजीब शांत लगा।
नीली plastic वाली कुर्सी वैसे ही पड़ी रही।

लेकिन सबसे अजीब बात तुलसी थी।
जनवरी की ठंड में भी वह सूखी नहीं।
माँ कभी पानी डाल देती थीं।
कभी भूल भी जाती थीं।
फिर भी पत्ते हरे रहते।
एक सुबह London से video call आया।
Nakul ने casually पूछा:
“तुलसी अभी भी है?”
माँ ने phone courtyard की तरफ घुमा दिया।

धूप आधी दीवार पर थी।
तुलसी वैसी ही खड़ी थी।
थोड़ी और बड़ी।
थोड़ी और हरी।
कुछ सेकंड कोई कुछ नहीं बोला।
फिर माँ धीरे से बोलीं:
“अजीब है न?”
Nakul हँसा नहीं।
उसे अचानक याद आया —
दादी कभी किसी को तुलसी के पास चप्पल पहनकर नहीं जाने देती थीं।
और खुद सर्दियों में भी नंगे पैर जाती थीं।
उस रात London में बहुत बर्फ थी।
सोने से पहले उसने Amazon पर एक छोटा tulsi pot search किया।
Cart में add भी किया।
फिर phone बंद कर दिया।
सुबह courtyard में फिर मिट्टी गीली मिली।
माँ ने पानी नहीं डाला था।
शायद रात में बारिश हुई होगी।
या शायद किसी ने आदत से डाल दिया होगा।
तुलसी उस सुबह भी हरी थी।

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