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वरिंदर जीत सिंह — जिनके हाथों पट्टी खुलने के बाद किसी की दुनिया फिर से रोशन हो जाती है


सुबह के करीब नौ बजे हैं।

Northern Railway Central Hospital के Eye Department के बाहर कुर्सियाँ लगभग भर चुकी हैं। कोई अपनी पुरानी पर्ची संभाल रहा है, कोई चश्मा उतार-चढ़ाकर सामने लगी Vision Chart को पढ़ने की कोशिश कर रहा है। एक बुज़ुर्ग अपने बेटे का हाथ पकड़े चुपचाप बैठे हैं। उनकी आँख पर पट्टी बँधी है।

कुछ ही देर में दरवाज़ा खुलता है।

सफेद कोट पहने एक व्यक्ति मुस्कुराते हुए उनके पास आता है। वह जल्दी में नहीं है। पहले उनका हाल पूछता है, फिर बेहद सावधानी से पट्टी खोलता है।

कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा रहता है।

बुज़ुर्ग सामने देखते हैं। फिर थोड़ा-थोड़ा करके उनके चेहरे पर मुस्कान फैलने लगती है। “अब साफ़ दिखाई दे रहा है…”

उनके साथ आए बेटे की आँखों में राहत है। और सामने खड़े उस व्यक्ति के चेहरे पर भी एक हल्की-सी मुस्कान।

ऐसे पल Varinder Jeet Singh के लिए नए नहीं हैं।

Northern Railway Central Hospital में पिछले 10 से ज़्यादा वर्षों से Refractionist के रूप में काम करते हुए उन्होंने हज़ारों लोगों की आँखों की जाँच की है। लेकिन उनके लिए यह सिर्फ़ Vision Test नहीं है। हर मरीज अपने साथ एक उम्मीद लेकर आता है — कि शायद आज दुनिया पहले से थोड़ी और साफ़ दिखाई दे।


Operation Theatre O.T. Complex entrance at Northern Railway Central Hospital
Northern Railway Central Hospital के O.T. Complex का प्रवेश द्वार।

INNAMAX SPOTLIGHT

  • एक Hospital की रोज़मर्रा की दुनिया, जहाँ मरीजों के साथ उम्मीद, डर और इंतज़ार भी आते हैं।
  • Varinder Jeet Singh का सफर — Hospital campus के बचपन से Optometry और Refractionist बनने तक।
  • हर दिन 100–150 मरीजों से मुलाकात, जहाँ Vision Test के साथ communication और patience भी ज़रूरी हैं।
  • वे पल जब पट्टी खुलती है और किसी मरीज की दुनिया फिर से साफ़ दिखाई देने लगती है।
  • और वे सीख, जो बताते हैं कि Healthcare सिर्फ़ इलाज नहीं, भरोसे और इंसानियत का काम भी है।

Devesh D. Mishra, Executive Editor of InnaMax News

STORY NOTE

Devesh D. Mishra

Executive Editor, InnaMax News

यह profile Varinder Jeet Singh से हुई बातचीत से विकसित की गई है।


क्या Eye Test के पीछे भी कोई कहानी होती है?

अगर आपने कभी Eye Clinic देखा हो, तो शायद आपको वहाँ मशीनें सबसे पहले दिखाई दें — Vision Chart, Auto Refractometer, Lens Tray।

लेकिन Varinder Jeet Singh कहते हैं कि इन सबसे पहले एक चीज़ की ज़रूरत होती है — भरोसे की।

हर दिन उनके सामने 100 से 150 मरीज आते हैं — कोई पहली बार चश्मा लगवाने आया है, कोई Cataract Surgery की तैयारी में है, तो कोई Railway Medical Test के लिए घबराया हुआ बैठा है।

हर चेहरे पर सवाल अलग होता है।

यही वजह है कि उनका काम केवल नंबर निकालना नहीं, बल्कि मरीज को यह भरोसा देना भी है कि उसकी बात ध्यान से सुनी जा रही है।

शायद इसी वजह से कई मरीज इलाज पूरा होने के बाद भी उन्हें याद रखते हैं।


जिस Hospital को बचपन में रोज़ देखा, क्या वहीं से करियर की दिशा मिली?

Varinder Jeet Singh का बचपन दिल्ली के GTB Hospital Campus के आसपास बीता। उनके पिता वहीं Security Officer थे।

बचपन में Hospital उनके लिए कोई डरावनी जगह नहीं था। सफेद कोट पहने डॉक्टर, स्ट्रेचर लेकर भागते कर्मचारी, मरीजों की भीड़ — यह सब उनकी रोज़मर्रा की दुनिया का हिस्सा था।

स्कूल की पढ़ाई Kendriya Vidyalaya से हुई। बारहवीं के बाद जब करियर चुनने की बारी आई, तो घर से कोई दबाव नहीं था।

“जो अच्छा लगे, वही करना,” पिता की यही सलाह थी।

उसी दौरान उनके बड़े भाई, जो Physiotherapist थे, ने उन्हें Optometry के बारे में बताया।

Varinder ने जल्दबाज़ी में फैसला नहीं किया। उन्होंने जानकारी जुटाई, डॉक्टरों से बात की, अलग-अलग विकल्पों को समझा। एक-एक करके उन्हें महसूस हुआ कि आँखों से जुड़ा काम सिर्फ़ इलाज नहीं, किसी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी बदलने का अवसर भी है।

यही सोच उन्हें B.Sc. Optometry तक ले गई — डिग्री, Internship और फिर Railway Recruitment Board के माध्यम से Northern Railway में नियुक्ति।

लेकिन असली सीख नौकरी मिलने के बाद शुरू हुई।


जब मशीन से ज़्यादा मुश्किल था—मरीज को समझना

नई नौकरी में सबसे कठिन काम मशीनें चलाना नहीं था। सबसे मुश्किल था — लोगों को समझना।

दिन भर लगातार मरीजों से मिलना, उनकी बेचैनी सुनना, अलग-अलग उम्र और स्वभाव के लोगों के साथ धैर्य बनाए रखना — यह किसी किताब में नहीं सिखाया जाता।

Varinder मानते हैं कि शुरुआती दिनों में वह भी उतने सहज नहीं थे।

“पहले लगता था कि जाँच पूरी करना ही सबसे ज़रूरी काम है। बाद में समझ आया कि मरीज सिर्फ़ रिपोर्ट नहीं चाहता, उसे भरोसा भी चाहिए।”

समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि कई बार मरीज की सबसे बड़ी परेशानी उसकी बीमारी नहीं, उसका डर होता है।

विशेषकर वे बुज़ुर्ग, जो Cataract Surgery से पहले बार-बार एक ही सवाल पूछते हैं — “सब ठीक हो जाएगा न?”

ऐसे समय में जवाब मशीनें नहीं देतीं। एक इंसान देता है।

इसी अनुभव ने उनका तरीका बदल दिया। अब जाँच शुरू करने से पहले वह कुछ पल मरीज से बात करते हैं, उसकी घबराहट कम करते हैं, फिर प्रक्रिया शुरू होती है।

शायद यही वजह है कि उनके लिए यह पेशा आज भी सिर्फ़ एक नौकरी नहीं, बल्कि हर दिन नए लोगों से मिलने और उनका भरोसा जीतने की ज़िम्मेदारी है।


Varinder Jeet Singh in maroon scrubs speaking with an elderly patient in a hospital corridor
मरीजों के साथ बातचीत और भरोसा उनके काम का अहम हिस्सा है।

जब रोज़ 100 से ज़्यादा मरीज सामने हों, तो हर दिन नया कैसे बन जाता है?

अगर किसी काम में रोज़ वही कुर्सी, वही कमरा और लगभग वही प्रक्रिया हो, तो अक्सर लोग उसे एक दिनचर्या मान लेते हैं। लेकिन Varinder Jeet Singh के लिए हर दिन अलग होता है।

सुबह Clinic खुलते ही मरीजों की कतार शुरू हो जाती है — किसी बच्चे को पहली बार चश्मे की ज़रूरत पड़ सकती है, किसी बुज़ुर्ग को Cataract Surgery से पहले घबराहट होती है, तो कोई Railway कर्मचारी अपने Medical Examination को लेकर चिंतित बैठा होता है।

मरीज बदलते हैं, इसलिए हर दिन की कहानी भी बदल जाती है।

उनका कहना है कि मशीनें केवल जाँच में मदद करती हैं, लेकिन मरीज को समझने का काम अब भी इंसान ही करता है। इसीलिए वे कोशिश करते हैं कि जाँच शुरू होने से पहले कुछ पल मरीज से बात हो जाए — कई बार वही छोटी-सी बातचीत पूरे माहौल को बदल देती है।

दिन खत्म होने तक वे 100 से 150 लोगों की आँखों की जाँच कर चुके होते हैं। थकान होती है।

लेकिन हर शाम घर लौटते समय उन्हें यह संतोष भी होता है कि आज किसी को थोड़ा बेहतर देखने में मदद मिली।


जब पट्टी खुली, तो सिर्फ़ आँखें नहीं खुलीं

हर पेशे में कुछ ऐसे पल आते हैं जो नौकरी को सिर्फ़ नौकरी नहीं रहने देते।

Varinder Jeet Singh के लिए ऐसे कई पल ऑपरेशन के अगले दिन आते हैं, जब Cataract Surgery के बाद मरीज पहली बार पट्टी खुलने का इंतज़ार करता है।

कई चेहरे उत्साहित होते हैं, कई डरे हुए, और कुछ बिल्कुल शांत।

पट्टी हटती है। मरीज पलकें खोलकर सामने देखता है। फिर अचानक उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है।

कभी वह अपने बेटे का चेहरा साफ़ देख पाता है। कभी कई महीनों बाद दीवार पर लगी घड़ी के अंक पढ़ लेता है। और कई बार बिना कुछ कहे सिर्फ़ हाथ जोड़ देता है।

“ऐसे आशीर्वाद किसी Certificate में नहीं मिलते। वही अगले दिन फिर काम पर आने की सबसे बड़ी वजह बन जाते हैं।”

Varinder बताते हैं कि कुछ मरीज वर्षों बाद भी उन्हें पहचान लेते हैं — किसी Railway Station पर, किसी Metro Coach में, या अचानक Hospital के बाहर।

वे रुककर सिर्फ़ इतना कहते हैं — “आपने देखा था… अब बिल्कुल ठीक दिखाई देता है।”

यादें शायद इसी तरह बनती हैं।


दस साल मरीजों की आँखें देखते-देखते, उन्होंने खुद क्या देखा?

दस वर्षों के अनुभव ने Varinder Jeet Singh को सिर्फ़ बेहतर Refractionist नहीं बनाया, बेहतर इंसान भी बनाया।

पहली सीख — भरोसा किसी मशीन से बड़ा होता है। नई तकनीकें हर साल बदलती हैं, लेकिन मरीज आज भी सबसे पहले सामने बैठे इंसान के चेहरे को पढ़ता है। अगर उसे भरोसा मिल जाए, तो आधी घबराहट वहीं खत्म हो जाती है।

दूसरी सीख — हर मरीज सिर्फ़ बीमारी लेकर नहीं आता। कई लोग अपने साथ डर लेकर आते हैं, कुछ अपनी नौकरी की चिंता लेकर, तो कुछ उम्र बढ़ने की बेचैनी लेकर। ऐसे में सुनना भी इलाज का हिस्सा बन जाता है।

तीसरी सीख — काम को घर तक नहीं ले जाना चाहिए। दिन भर की भागदौड़ के बाद Varinder कोशिश करते हैं कि शाम परिवार के नाम रहे। उनके लिए यही संतुलन अगले दिन फिर पूरी ऊर्जा के साथ Hospital लौटने की ताकत देता है।

“Hospital का काम Hospital में ही पूरा होना चाहिए। घर पहुँचने के बाद समय परिवार का होता है।”


InnaMax View-एक Refractionist की कहानी हमें Healthcare के बारे में क्या दिखाती है?

किसी भी Hospital में लोग अक्सर उस Doctor का नाम याद रखते हैं, जिसने ऑपरेशन किया। लेकिन इलाज की पूरी प्रक्रिया कई लोगों की ज़िम्मेदारियों से मिलकर पूरी होती है। उनमें कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनका काम कम दिखाई देता है, लेकिन मरीज के अनुभव में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

Varinder Jeet Singh की कहानी ऐसे ही एक पेशे की झलक देती है।

यह सिर्फ़ Vision Test या चश्मे का नंबर निकालने की कहानी नहीं है। यह उस भरोसे, धैर्य और संवाद की भी कहानी है, जो किसी भी Healthcare System का हिस्सा होते हैं। शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी बात है।

हर पेशे में कुछ भूमिकाएँ ऐसी होती हैं, जिनके बारे में लोग कम जानते हैं, लेकिन जिनके बिना पूरी व्यवस्था अधूरी रह जाती है। Varinder Jeet Singh का काम हमें उसी अनदेखे हिस्से की ओर देखने का अवसर देता है।


Varinder Jeet Singh with colleagues inside an operation theatre
Hospital का काम अकेले नहीं होता—एक पूरी team मिलकर मरीज की देखभाल करती है।

जिज्ञासा अभी बाकी है? ये सवाल आपके लिए

इस कहानी में आपने Varinder Jeet Singh के सफ़र और उनके काम को जाना। लेकिन आँखों की देखभाल, Vision Testing और Optometry की दुनिया इससे कहीं बड़ी है। अगर आपकी जिज्ञासा अभी बाकी है, तो इन सवालों से शुरुआत कीजिए।


क्या बिना किसी परेशानी के भी नियमित Eye Check-up कराना चाहिए?

हाँ। कई आँखों की समस्याएँ शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देतीं। नियमित जाँच से कई बीमारियों का समय रहते पता लगाया जा सकता है, विशेषकर बढ़ती उम्र, Diabetes या परिवार में आँखों की बीमारी का इतिहास होने पर।


Railway भर्ती में किन पदों के लिए Vision Standards सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं?

Railway की कुछ Safety Category नौकरियों में सामान्य दृष्टि से आगे बढ़कर Color Vision, Distance Vision और अन्य Vision Standards भी देखे जाते हैं।

यह भी पढ़ें: RRB ALP Medical Vision Standards — Railway भर्ती में Vision Rules


क्या हर धुंधला दिखना Cataract का संकेत होता है?

ज़रूरी नहीं। धुंधला दिखने के पीछे चश्मे का नंबर बदलना, Dry Eye, Retina की समस्या, Glaucoma या अन्य कारण भी हो सकते हैं। सही कारण केवल विशेषज्ञ की जाँच से ही पता चलता है।


बच्चों की पहली Eye Screening कब करानी चाहिए?

कई बार बच्चे खुद यह नहीं बता पाते कि उन्हें ठीक से दिखाई नहीं दे रहा। इसलिए समय-समय पर Eye Screening कराना और पढ़ाई या खेल के दौरान उनके व्यवहार पर ध्यान देना उपयोगी हो सकता है।


क्या Mobile और Laptop का ज़्यादा इस्तेमाल आँखों को स्थायी नुकसान पहुँचाता है?

लंबे समय तक Screen देखने से आँखों में थकान, Dry Eye और अस्थायी असुविधा बढ़ सकती है। लेकिन हर व्यक्ति में इससे स्थायी Vision Problem हो, ऐसा आवश्यक नहीं है। लगातार परेशानी होने पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहता है।


Optometry में Career का दायरा कितना बड़ा है?

B.Sc. या Diploma in Optometry के बाद अवसर सिर्फ़ Hospital तक सीमित नहीं हैं। Retail Optical Chains, Eye Care NGOs के ग्रामीण Vision Camps, Contact Lens Research और Industrial Eye Safety जैसे क्षेत्रों में भी Optometrists की ज़रूरत होती है। सरकारी क्षेत्र में Railway, Defence और ESIC जैसे विभागों की भर्तियाँ भी समय-समय पर संबंधित Recruitment Boards के ज़रिए निकलती हैं।



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