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डॉ. पंकज श्रीवास्तव — एक सर्जन जिसने सीखा कि हर दर्द मेडिकल रिपोर्ट में नहीं दिखता


PROFILE AT A GLANCE

  • बीस साल की सर्जरी, और एक सवाल जो ऑपरेशन थिएटर के बाहर शुरू हुआ
  • एक नज़दीकी दोस्त की मौत, जिसने 30 Days To My Suicide को जन्म दिया
  • ₹3,000 की वो रात, जिसे एक परिवार आज भी नहीं भूल पाया
  • पुरुष टूटते क्यों हैं, और मदद मांगने से डरते क्यों हैं — एक सर्जन का नजरिया
  • हर दर्द मेडिकल रिपोर्ट में क्यों नहीं दिखता — वर्षों के अनुभव से निकला निष्कर्ष
  • Om Surgical Center से लेकर मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद तक की यात्रा
  • अब Aghor Panth पर अगली किताब — एक बिल्कुल नया अध्याय

“शरीर का इलाज आसान है, मन को संभालना असली चुनौती”

— डॉ. पंकज श्रीवास्तव

एक मरीज सामने बैठा था।

सर्जरी सफल हो चुकी थी।

मेडिकल रिपोर्ट सामान्य थी।

परिवार खुश था।

लेकिन मरीज की आंखों में वह राहत नहीं थी जिसकी उम्मीद की जाती है।

डॉ. पंकज श्रीवास्तव उसे देख रहे थे।

रिपोर्ट कह रही थी कि सब ठीक है।

लेकिन इंसान कुछ और कह रहा था।

शायद उसी दिन उनके भीतर एक सवाल जन्मा—

क्या शरीर के ठीक हो जाने का मतलब इंसान का ठीक हो जाना है?

यह सवाल किसी मेडिकल किताब में नहीं था।

किसी परीक्षा में नहीं पूछा गया था।

लेकिन आने वाले वर्षों में यही सवाल उनकी सोच की दिशा बदलने वाला था।


आखिर एक सर्जन को मरीजों की खामोशी सुनने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

कानपुर में जन्मे और वहीं से अपनी शुरुआती शिक्षा तथा MBBS पूरा करने वाले डॉ. पंकज श्रीवास्तव ने चिकित्सा को अपना पेशा चुना।

वर्षों के अनुभव के दौरान उन्होंने General Surgery, Laparoscopic Surgery और Thoracic Surgery के क्षेत्र में काम किया। आज वे Om Surgical Center से जुड़े हैं, जहां चिकित्सा सेवा के साथ मरीजों के साथ संवाद को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

लेकिन डॉक्टर बनना और इंसान को समझना दो अलग यात्राएं हैं।

मेडिकल कॉलेज शरीर की संरचना समझाता है।

बीमारियों की प्रकृति समझाता है।

सर्जरी की तकनीक सिखाता है।

लेकिन इंसान का डर।

उसकी बेचैनी।

उसका अकेलापन।

उसकी चुप्पी।

यह सब किताबों में नहीं मिलता।

यह OPD में मिलता है।

वार्ड में मिलता है।

उन conversations में मिलता है जो अक्सर मेडिकल रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं बनतीं।

वर्षों तक मरीजों के बीच काम करते हुए डॉ. पंकज ने महसूस किया कि लोग केवल बीमारी लेकर अस्पताल नहीं आते।

वे अपने साथ कहानियां भी लाते हैं।

कुछ कहानियां डर की होती हैं।

कुछ उम्मीद की।

कुछ संघर्ष की।

और कुछ ऐसी होती हैं जिन्हें वे किसी से कह नहीं पाते।

धीरे-धीरे उनकी रुचि बीमारी से ज्यादा इंसान में होने लगी।


ओम सर्जिकल सेंटर एंड मैटरनिटी होम का भवन
वाराणसी स्थित Om Surgical Center, जहाँ चिकित्सा केवल इलाज नहीं, बल्कि भरोसे का भी निर्माण करती है।

ऑपरेशन सफल था, फिर भी कुछ लोग ठीक क्यों नहीं लगते थे?

सर्जरी की दुनिया results की दुनिया है।

रिपोर्ट सामान्य है या नहीं।

संक्रमण नियंत्रित है या नहीं।

रिकवरी अच्छी है या नहीं।

लेकिन एक चीज ऐसी थी जिसे कोई रिपोर्ट नहीं माप सकती थी।

मन की स्थिति।

डॉ. पंकज ने देखा कि कुछ मरीज शारीरिक रूप से स्वस्थ घोषित होने के बाद भी भीतर से संघर्ष कर रहे थे।

उनके चेहरे पर चिंता थी।

उनके भीतर डर था।

कई बार जीवन को लेकर अनिश्चितता थी।

यहीं उन्हें महसूस हुआ कि चिकित्सा की दुनिया में एक अदृश्य क्षेत्र भी है।

वह क्षेत्र है—

मनुष्य का मन।

और शायद इसी कारण वे बार-बार एक ही बात कहते हैं—

“ऑपरेशन करना छोटी बात है। मन को ठीक करना सबसे बड़ा चैलेंज है।”


मरीजों की कहानियों ने एक सर्जन को लेखक कैसे बना दिया?

यदि कोई पहली बार डॉ. पंकज श्रीवास्तव से मिले, तो शायद वह उन्हें एक सर्जन के रूप में ही देखे।

लेकिन उनके भीतर एक लेखक भी था।

और उस लेखक को जन्म किसी साहित्यिक महत्वाकांक्षा ने नहीं दिया।

उसे जन्म दिया लोगों ने।

मरीजों ने।

समाज ने।

समाचारों ने।

और अनगिनत चिंतन ने जो वर्षों तक उनके मन में जमा होती रहीं।

उन्होंने बार-बार देखा कि कई लोग मदद चाहते हैं।

लेकिन मांग नहीं पाते।

कई लोग टूट रहे होते हैं।

लेकिन दिखाई नहीं देता।

यहीं से एक विचार जन्मा।

यदि लोग इन सवालों पर बात नहीं कर रहे, तो क्या एक कहानी यह काम कर सकती है?

और फिर अक्टूबर 2025 में प्रकाशित हुई—

30 Days To My Suicide: Every Choice Matters


डॉ. पंकज श्रीवास्तव की पुस्तक 30 Days To My Suicide
अक्टूबर 2025 में प्रकाशित यह पुस्तक वर्षों की बातचीत, अवलोकन और अनुभव का परिणाम है।

पुस्तक लिखते समय उन्हें सबसे ज्यादा किस बात ने परेशान किया?

जब कोई डॉक्टर आत्महत्या जैसे विषय पर लिखता है, तो वह केवल कल्पना नहीं लिख रहा होता।

वह समाज को देखने का अपना अनुभव भी साथ ला रहा होता है।

डॉ. पंकज के लिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं था कि लोग आत्महत्या क्यों करते हैं।

उनका प्रश्न था—

वे उस मोड़ तक पहुंचते कैसे हैं?

उनके अनुसार कोई भी व्यक्ति अचानक नहीं टूटता।

उससे पहले कई संकेत आते हैं।

कई अधूरे संवाद होते हैं।

कई अनसुनी पुकारें होती हैं।

और अक्सर समाज उन संकेतों को बहुत देर से पहचानता है।

यही विचार पुस्तक की आत्मा बन गया।


लोग बिखरते क्यों हैं, और इसके पीछे सबसे बड़ा कारण क्या है?

उनके अनुसार आधुनिक समाज की सबसे बड़ी समस्या केवल तनाव नहीं है।

समस्या यह है कि लोग धीरे-धीरे भीतर से बिखर रहे हैं।

एक असफल परीक्षा।

एक टूटा हुआ रिश्ता।

एक आर्थिक दबाव।

एक नौकरी का संकट।

एक अस्वीकार किया गया सपना।

बाहर से देखने पर ये घटनाएं सामान्य लग सकती हैं।

लेकिन हर व्यक्ति का मानसिक ढांचा अलग होता है।

डॉ. पंकज का मानना है कि समस्या कठिनाइयों की नहीं है।

समस्या यह है कि बहुत से लोग कठिनाइयों के साथ अकेले रह गए हैं।


क्या हम पहले से ज्यादा जुड़े हुए हैं, या पहले से ज्यादा अकेले?

मोबाइल फोन।

सोशल मीडिया।

मैसेज।

वीडियो कॉल।

तकनीक ने लोगों को पहले से कहीं अधिक जोड़ दिया है।

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ है?

इस सवाल पर डॉ. पंकज की राय थोड़ी अलग है।

वे कहते हैं कि संपर्क बढ़ा है।

लेकिन संवाद कम हुआ है।

एक ही कमरे में चार लोग बैठे हैं।

लेकिन चारों अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त हैं।

यहीं से वे एक महत्वपूर्ण बात कहते हैं—

“बोलना सब चाहते हैं, सुनना बहुत कम लोग चाहते हैं।”


विचारमग्न मुद्रा में डॉ. पंकज श्रीवास्तव
“अपने साथ कुछ समय बिताइए।” चिकित्सा और लेखन, दोनों के माध्यम से वे मनुष्य को बेहतर समझने की कोशिश करते हैं

“ऑपरेशन शरीर का उपचार कर सकता है, लेकिन कई बार इंसान को सबसे पहले सुना जाना ज़रूरी होता है।”


कई बार उपचार की शुरुआत दवा से नहीं, संवाद से क्यों होती है?

एक डॉक्टर होने के बावजूद डॉ. पंकज संवाद की शक्ति पर असाधारण विश्वास रखते हैं।

कारण सरल है।

उन्होंने वर्षों तक लोगों को देखा है।

और एक बात समझी है—

हर समस्या का समाधान सलाह नहीं होती।

कई बार समाधान सुना जाना होता है।

उनका मानना है कि किसी भी संकट से गुजर रहा व्यक्ति सबसे पहले यह महसूस करना चाहता है कि वह अकेला नहीं है।

कोई है जो उसकी बात सुनेगा।

कोई है जो उसे जज नहीं करेगा।

कोई है जो उसके साथ खड़ा रहेगा।



“मर्द बनो” वाली सीख को वे अधूरा क्यों मानते हैं?

भारतीय समाज में लड़कों को बचपन से एक बात बार-बार सिखाई जाती है—

“मजबूत बनो।”

“मत रोओ।”

“कमजोरी मत दिखाओ।”

डॉ. पंकज इस सोच को पूरी तरह गलत नहीं मानते।

लेकिन वे इसे अधूरा जरूर मानते हैं।

उनके अनुसार समस्या रोने में नहीं है।

समस्या रोने से डरने में है।

वे कहते हैं कि समाज ने पुरुषों के लिए ऐसा ढांचा बना दिया है जिसमें उनसे हमेशा मजबूत दिखाई देने की अपेक्षा की जाती है।


क्या एक डॉक्टर भी अपने मरीजों से बदलता है?

समाज अक्सर डॉक्टरों को केवल विशेषज्ञ के रूप में देखता है।

लेकिन डॉक्टर भी इंसान होते हैं।

वे भी लोगों की कहानियां सुनते हैं।

वे भी कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं।

उन्होंने महसूस किया कि कुछ बातें मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज नहीं हो सकतीं।

लेकिन उन्हें लिखा जा सकता है।

उन पर बात की जा सकती है।

उन्हें समाज के सामने रखा जा सकता है।

शायद इसी वजह से एक सर्जन लेखक बना।


डॉ. पंकज श्रीवास्तव एक सार्वजनिक समारोह में अन्य अतिथियों के साथ मंच पर।
एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेते डॉ. पंकज। चिकित्सा सेवा के साथ उनका जुड़ाव पेशेवर और सामाजिक मंचों तक भी दिखाई देता है।

“पहचान से पहले इंसान होना जरूरी है”

यह सवाल स्वाभाविक है।

क्योंकि उनके जीवन में कई पहचानें दिखाई देती हैं।

सर्जन।

अस्पताल प्रशासक।

लेखक।

वक्ता।

लेकिन उनकी सोच में एक बात बार-बार लौटती है—

पहचान से पहले इंसान होना जरूरी है।


मनुष्य को समझने की उनकी खोज अब कहां तक पहुंची है?

अक्टूबर 2025 में 30 Days To My Suicide प्रकाशित होने के बाद उनकी यात्रा रुकी नहीं है।

वे इसका हिंदी संस्करण तैयार कर रहे हैं।

ताकि यह संवाद अधिक लोगों तक पहुंच सके।

इसके अलावा उनका एक नया लेखन प्रोजेक्ट भी चर्चा में है—

Aghor-Panth

पहली नजर में यह विषय चिकित्सा से अलग दिखाई देता है।

लेकिन यदि उनकी पूरी यात्रा को देखें, तो यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।

क्योंकि उनकी रुचि हमेशा मनुष्य को समझने में रही है।


हर दर्द मेडिकल रिपोर्ट में क्यों नहीं दिखता?

इस कहानी को केवल एक सफल सर्जन की कहानी समझना आसान होगा।

लेकिन यह उससे कहीं अधिक है।

यह उस व्यक्ति की कहानी है जिसने हजारों मरीजों को देखते हुए एक महत्वपूर्ण बात सीखी—

हर घाव दिखाई नहीं देता।

हर दर्द मेडिकल रिपोर्ट में नहीं आता।

और हर उपचार ऑपरेशन थिएटर में शुरू नहीं होता।

कई बार उपचार की शुरुआत एक बातचीत से होती है।

एक भरोसे से।

एक सुनने वाले व्यक्ति से।

शायद इसी कारण डॉ. पंकज श्रीवास्तव की पहचान केवल एक सर्जन तक सीमित नहीं है।

वे उन डॉक्टरों में हैं जिन्होंने सर्जरी से शरीर को समझा और लोगों की कहानियों से मन को।


डॉ. पंकज श्रीवास्तव अपने क्लिनिक में मेडिकल रिपोर्ट और मरीजों के दस्तावेज़ों की समीक्षा करते हुए।
सर्जरी केवल ऑपरेशन थिएटर में नहीं होती। सही निर्णय अक्सर उससे पहले शुरू होते हैं।

शायद यही कारण है कि उनकी पहचान केवल ऑपरेशन थिएटर तक सीमित नहीं रहती।

वर्षों तक लोगों के शरीर का उपचार करते-करते उन्होंने एक और बात समझी — कई बार इंसान को दवा से पहले संवाद की ज़रूरत होती है।

और शायद इसी खोज ने एक सर्जन को लेखक बना दिया।


जीवन से निकले तीन सबक

डॉ. श्रीवास्तव के तीन सबक उनके बीस साल के मेडिकल अनुभव और लेखन, दोनों से निकलते हैं।

पहली — समस्या को नाम देना ज़रूरी है। आत्महत्या को सिर्फ “mental illness” कह देना उसे दूर कर देता है; इसे सामाजिक समस्या मानना उसे हमारे करीब लाता है।

दूसरी — परिवार कोई भावुक शब्द नहीं, एक मेडिकल फेविकोल है। जहाँ चार पीढ़ियाँ एक छत के नीचे बातचीत करती थीं, वहाँ आज चार लोग, चार मोबाइल में हैं — और यही दूरी असली बीमारी है।

तीसरी — बातचीत एक चिकित्सा उपकरण है, सांत्वना नहीं। वार्ड का अनुभव और किताब का नायक, दोनों एक ही सच कहते हैं — सुनना, बोलने से ज़्यादा ताक़तवर है।


InnaMax View

डॉ. पंकज श्रीवास्तव की कहानी किसी ऐसे डॉक्टर की कहानी नहीं है जिसने सर्जरी के साथ एक नया शौक खोज लिया। यह उस पेशेवर की कहानी है जिसने वर्षों तक लोगों के शरीर का इलाज करते-करते एक और बीमारी को पहचाना — वह दर्द जो एक्स-रे, सीटी स्कैन या ब्लड रिपोर्ट में दिखाई नहीं देता।

शायद इसी वजह से उनकी किताब का सबसे महत्वपूर्ण संदेश आत्महत्या के बारे में नहीं, बल्कि संवाद के बारे में है। कई बार इंसान मरना नहीं चाहता, वह सिर्फ सुना जाना चाहता है।

एक ऑपरेशन थिएटर में डॉक्टर शरीर बचाता है। उसके बाहर, कभी-कभी एक बातचीत ज़िंदगी बचा सकती है।

और शायद यही वह सवाल है जिसे डॉ. पंकज श्रीवास्तव वर्षों से अपने साथ लेकर चल रहे हैं — अगर हम अपने सबसे बड़े दुख के बारे में खुलकर बात कर पाते, तो क्या कई कहानियों का अंत अलग हो सकता था?

— InnaMax News Desk


कहानी पढ़ने के बाद यह सवाल भी उठते हैं…


डॉ. पंकज श्रीवास्तव की सबसे बड़ी पहचान क्या है?

वे एक सर्जन होने के साथ-साथ लेखक भी हैं। वर्षों तक मरीजों के साथ काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि कई संघर्ष ऐसे होते हैं जो मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज नहीं होते। यही अनुभव आगे चलकर उनकी पुस्तक 30 Days To My Suicide: Every Choice Matters की प्रेरणा बना।


क्या “30 Days To My Suicide” किसी सच्ची घटना पर आधारित है?

यह एक काल्पनिक (fiction) उपन्यास है, लेकिन इसके पीछे की भावनाएँ वास्तविक जीवन के अनुभवों से प्रेरित हैं। वर्षों तक मरीजों के साथ हुई बातचीत और आत्महत्या से जुड़े सामाजिक प्रश्नों ने इसकी पृष्ठभूमि तैयार की।


यह पुस्तक कहाँ उपलब्ध है?

30 Days To My Suicide: Every Choice Matters Amazon.in सहित प्रमुख ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है।



डॉ. श्रीवास्तव सर्जरी और लेखन, दोनों कैसे साथ संभालते हैं?

उनके अनुसार लेखन कोई अलग गतिविधि नहीं, बल्कि आत्म-अभिव्यक्ति और चिंतन का माध्यम है। वे मानते हैं कि विचारों और भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है।


Om Surgical Center की क्या विशेषता है?

Om Surgical Center में सर्जरी, क्रिटिकल केयर और मातृत्व सेवाएँ एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं। डॉ. पंकज श्रीवास्तव और उनकी पत्नी डॉ. शालिनी श्रीवास्तव इसके संचालन से जुड़े हैं, जिससे मरीजों को समग्र चिकित्सा सुविधा मिलती है।


आगे डॉ. पंकज श्रीवास्तव किन परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं?

वे अपनी पुस्तक 30 Days To My Suicide के हिंदी संस्करण पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा मानव व्यवहार, आध्यात्मिकता और भारतीय चिंतन से जुड़े Aghor-Panth विषय पर भी उनका एक नया लेखन प्रोजेक्ट चर्चा में है।


भारत में Suicide Prevention पर साहित्य की आवश्यकता क्यों बढ़ रही है?

मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बढ़ रही है, लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याओं पर खुलकर बात नहीं कर पाते।


Aghor-Panth विषय में उनकी रुचि कैसे विकसित हुई?

मानव व्यवहार, जीवन, मृत्यु, आध्यात्मिकता और भारतीय चिंतन को समझने की जिज्ञासा उन्हें इस विषय की ओर ले गई।


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