“मैं बच्चों की टीचर नहीं, उनकी मां और गुरु हूं” — Geeta Mishra
इस Profile में…
- क्यों Geeta Mishra खुद को सिर्फ Teacher नहीं मानतीं।
- वह कौन-सा अनुभव था जिसने उनकी पूरी शिक्षण सोच बदल दी।
- क्यों कुछ छात्र वर्षों बाद भी उनके पैर छूने लौट आते हैं।
- वह कौन-सी हार है जो आज भी उन्हें भीतर से परेशान करती है।
- बच्चों, माता-पिता और शिक्षा को लेकर उनकी सबसे अलग सोच क्या है।
कुछ साल पहले एक स्कूल कार्यक्रम में वह पीछे बैठी थीं।
मंच पर Principal थीं।
अतिथि थे।
बच्चे थे।
कार्यक्रम चल रहा था।
तभी कुछ युवा लड़के और लड़कियां उनकी तरफ बढ़े।
उन्होंने झुककर उनके पैर छुए।
एक ने पूछा, “Mam, पहचान लिया?”
दूसरे ने मुस्कुराकर कहा, “आपने ही तो हमें संभाला था।”
उस क्षण मंच पर बैठे लोगों से ज्यादा महत्वपूर्ण वे बच्चे थे।
वह पुरस्कार नहीं था।
कोई सम्मान समारोह नहीं था।
फिर भी शायद वही उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान था।
वह थीं Geeta Mishra।
एक ऐसी महिला, जो आज भी अपने परिचय में सबसे पहले कोई पद नहीं बतातीं।
वह सिर्फ इतना कहती हैं—
“मैं बच्चों की टीचर नहीं, उनकी मां और गुरु हूं।”

बच्चों के लिए Geeta Mishra आखिर इतनी अलग क्यों हैं?
आज जब शिक्षा अक्सर अंकों, परीक्षाओं और रिजल्ट के आसपास घूमती दिखाई देती है, Geeta Mishra की सोच अलग रास्ता चुनती है।
उनके लिए बच्चा सिर्फ एक विद्यार्थी नहीं है।
वह एक पूरा जीवन है।
उसके डर हैं।
उसके सपने हैं।
उसकी परेशानियां हैं।
उसका परिवार है।
इसीलिए वह बच्चों को केवल पढ़ाने का काम नहीं मानतीं।
वह उनके जीवन में मौजूद रहने की कोशिश करती हैं।
यही कारण है कि कई पुराने छात्र आज भी उनसे मिलने आते हैं।
कुछ नौकरी में हैं।
कुछ कॉलेज में हैं।
कुछ अपने परिवार संभाल रहे हैं।
लेकिन उनके लिए Geeta Mishra आज भी सिर्फ “Mam” नहीं हैं।
Kolkata से आने के बाद उन्हें सबसे ज्यादा झटका किस बात ने दिया?
Geeta Mishra का बचपन कोलकाता में बीता।
वह ऐसा माहौल था जहां पड़ोस सिर्फ एक पता नहीं होता था।
लोग एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होते थे।
किसी के घर समस्या हो तो पूरी गली को पता होता था।
किसी के घर खुशी आए तो सब शामिल होते थे।
फिर शादी के बाद जब वह दूसरे शहर आईं, तो उन्हें एक अलग दुनिया मिली।
बंद दरवाजे।
अलग-अलग फ्लैट।
सीमित बातचीत।
अपने-अपने जीवन में व्यस्त लोग।
उन्हें यह बदलाव लंबे समय तक परेशान करता रहा।
उन्हें लगता था कि लोग पहले से ज्यादा पास रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर हो गए हैं।
शायद वहीं से उनके भीतर बच्चों और परिवारों के बीच पुल बनने की इच्छा और मजबूत हुई।

किस घटना ने एक Teacher को “मां और गुरु” बना दिया?
Geeta Mishra इस सवाल का जवाब किसी किताब से नहीं देतीं।
वह अपने जीवन से देती हैं।
एक समय ऐसा आया जब उन्हें महसूस हुआ कि कई बच्चे सिर्फ पढ़ाई में कमजोर नहीं हैं।
वे अकेले हैं।
उन्हें समय देने वाला कोई नहीं है।
उन्हें समझने वाला कोई नहीं है।
कुछ बच्चों के माता-पिता काम में व्यस्त थे।
कुछ परिस्थितियों से जूझ रहे थे।
कुछ खुद संघर्ष में थे।
तभी Geeta Mishra ने एक बात समझी।
हर बच्चे को टीचर मिल सकता है।
लेकिन हर बच्चे को गुरु नहीं मिलता।
और उससे भी बड़ी बात—
हर बच्चे को मां जैसा सहारा नहीं मिलता।
यहीं से उनका शिक्षण बदल गया।
मुश्किल वक़्त: कौन-सी हार आज भी Geeta Mishra को परेशान करती है?
हर प्रोफाइल में सफलता की कहानियां होती हैं।
लेकिन असली कहानी वहां शुरू होती है जहां सफलता नहीं मिलती।
Geeta Mishra के लिए सबसे दर्दनाक क्षण वे नहीं थे जब पैसे कम पड़े।
या संसाधन नहीं मिले।
सबसे बड़ा दर्द तब हुआ जब उन्होंने प्रतिभाशाली बच्चों को रुकते देखा।
खासकर लड़कियों को।
ऐसी लड़कियां जिनमें क्षमता थी।
जिनमें आत्मविश्वास था।
जो आगे बढ़ सकती थीं।
लेकिन घर की परिस्थितियां, आर्थिक सीमाएं या सामाजिक दबाव उन्हें बीच रास्ते रोक देते थे।
आज भी इस विषय पर बात करते हुए उनकी आवाज बदल जाती है।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बच्चों की सफलता नहीं है।
उनकी सबसे बड़ी पीड़ा उन बच्चों का रुक जाना है जो आगे बढ़ सकते थे।
ऐसा क्या रिश्ता है कि रात 10 बजे भी बच्चे उन्हें बुला लेते हैं?
यह सवाल उनके काम को सबसे बेहतर तरीके से समझाता है।
कई बार देर रात फोन आया।
कभी कोई बच्चा घर छोड़ने की बात कर रहा था।
कभी परिवार में तनाव था।
कभी कोई लड़की भावनात्मक संकट में थी।
ऐसे समय में Geeta Mishra ने अक्सर घड़ी नहीं देखी।
उन्होंने रास्ता देखा।
बच्चे का घर देखा।
और वहां पहुंच गईं।

यही वह हिस्सा है जिसे किसी report में नहीं लिखा जाता।
यही वह काम है जिसका कोई प्रमाणपत्र नहीं मिलता।
लेकिन शायद यहीं से विश्वास बनता है।
शिक्षा तब सबसे प्रभावशाली होती है जब उसमें उपस्थिति जुड़ जाती है।
आखिर ऐसा क्या हुआ कि बच्चे वर्षों बाद भी उनके पैर छूते हैं?
जीवन में कुछ दृश्य ऐसे होते हैं जो व्यक्ति को अपने काम का अर्थ समझा देते हैं।
Geeta Mishra के लिए ऐसा ही एक दृश्य वह था जब पुराने छात्र एक कार्यक्रम में उनसे मिलने आए।
वे अब छोटे बच्चे नहीं थे।
कई बड़े हो चुके थे।
कुछ काम कर रहे थे।
कुछ आगे पढ़ रहे थे।
लेकिन जब उन्होंने उनके पैर छुए, तब Geeta Mishra को लगा कि शायद बच्चों ने उन्हें वह पहचान दे दी है जिसकी उन्हें कभी तलाश भी नहीं थी।
नाम से बड़ी पहचान होती है स्मृति।
और शायद यही उनकी सबसे बड़ी कमाई है।
“इतना काम करने के बाद भी आखिर उन्हें किस बात का अफसोस है?”
अगर उनसे पूछा जाए कि सबसे बड़ा अफसोस क्या है, तो जवाब बहुत अलग होगा।
वह किसी पुरस्कार का नाम नहीं लेंगी।
किसी पद का नाम नहीं लेंगी।
वह उन लड़कियों की बात करेंगी जो आगे नहीं पढ़ सकीं।
उन बच्चों की बात करेंगी जिनकी परिस्थितियां उनके प्रयासों से बड़ी साबित हुईं।

उन सपनों की बात करेंगी जो अधूरे रह गए।
शायद यही कारण है कि आज भी उनका ध्यान उपलब्धियों से ज्यादा अवसरों पर रहता है।
क्योंकि Geeta Mishra के लिए सफलता का मतलब किसी एक बच्चे का आगे बढ़ना नहीं है।
सफलता का मतलब है किसी बच्चे का पीछे न छूटना।
क्या सिर्फ Teacher काफी है, या बच्चों को गुरु भी चाहिए?
Geeta Mishra का जवाब —हां।
लेकिन उनके लिए गुरु का मतलब अलग है।
गुरु वह नहीं जो सिर्फ ज्ञान दे।
गुरु वह है जो समय दे।
जो सुन सके।
जो भरोसा पैदा करे।
जो बच्चे को उसकी क्षमता दिखा सके।
आज की तेज रफ्तार दुनिया में यह बात पुरानी लग सकती है।
लेकिन शायद इसी वजह से जरूरी भी है।
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कुछ लोग संस्थाएं बनाते हैं।
कुछ लोग कार्यक्रम चलाते हैं।
कुछ लोग बदलाव की बातें करते हैं।
और कुछ लोग चुपचाप लोगों के जीवन में जगह बना लेते हैं।
Geeta Mishra शायद इसी आखिरी श्रेणी में आती हैं।
उनकी कहानी किसी संगठन की कहानी नहीं है।
यह किसी विचारधारा की कहानी भी नहीं है।
यह उस रिश्ते की कहानी है जो एक शिक्षक और बच्चे के बीच बन सकता है।

ऐसे समय में जब शिक्षा लगातार अधिक तकनीकी और परिणाम-केंद्रित होती जा रही है, Geeta Mishra हमें एक पुरानी लेकिन जरूरी बात याद दिलाती हैं—
बच्चे विषय नहीं पढ़ते।
वे इंसानों से सीखते हैं।
और शायद इसी वजह से उनके कई छात्र आज भी उन्हें सिर्फ टीचर नहीं मानते।
शायद इसी वजह से कुछ लोग बच्चों को पढ़ाते हैं, और कुछ लोग उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। Geeta Mishra दूसरी श्रेणी में दिखाई देती हैं।
लोग अक्सर यह भी जानना चाहते हैं…
क्या Geeta Mishra किसी सरकारी योजना से जुड़ी रही हैं?
उनका अधिकांश काम सामुदायिक स्तर पर और बच्चों के साथ सीधे जुड़कर हुआ है। अलग-अलग समय में उन्होंने शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों के साथ भी काम किया है।
आसरा Foundation की शुरुआत कब हुई थी?
Geeta Mishra ने 2018 में आसरा फाउंडेशन की औपचारिक शुरुआत की, हालांकि बच्चों के साथ उनका काम इससे पहले से चल रहा था।
Geeta Mishra के अनुसार आज के बच्चों की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उनके अनुसार केवल आर्थिक समस्या ही चुनौती नहीं है। कई बच्चों को समय, मार्गदर्शन और भावनात्मक सहारे की भी कमी होती है।
माता-पिता को लेकर Geeta Mishra की सबसे बड़ी सलाह क्या है?
वे मानती हैं कि बच्चों की शिक्षा केवल स्कूल की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार की भागीदारी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
क्या Geeta Mishra शिक्षा व्यवस्था में कोई बदलाव देखना चाहती हैं?
हां। उनका मानना है कि बच्चों पर बढ़ता शैक्षणिक दबाव कम होना चाहिए और सीखने को अधिक व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए।
लड़कियों की शिक्षा को लेकर उनकी सबसे बड़ी चिंता क्या है?
उनके अनुसार आज भी कई प्रतिभाशाली लड़कियां आर्थिक और सामाजिक कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं।
Geeta Mishra की सोच में “टीचर” और “गुरु” में क्या फर्क है?
उनके अनुसार टीचर ज्ञान दे सकता है, लेकिन गुरु जीवन की दिशा दिखाता है। यही फर्क उनकी पूरी कार्यशैली की नींव है।
अगर कोई उनके काम से जुड़ना चाहे तो कैसे जुड़ सकता है?
स्थानीय स्तर पर शिक्षा, कौशल विकास और बच्चों के मार्गदर्शन से जुड़े प्रयासों में सहयोग या सहभागिता के माध्यम से जुड़ा जा सकता है।
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