शादी से एक रात पहले — नानी के साथ वो आखिरी रात

Shaadi से एक रात पहले — सब ready था।
बस उसका दिल नहीं।
Riya ने नींद नहीं चुनी —
अपनी nani को चुना।
Riya को नींद नहीं आ रही थी।
कल सुबह उसकी शादी थी।
Mehendi अभी भी हल्की गीली थी।
Lehenga अगले कमरे में था।
List पूरी हो चुकी थी।
सब ready था।
बस Riya नहीं थी।
11 बज चुके थे।
घर में सब सोने चले गए थे।
कल जल्दी उठना था — 5 बजे से तैयारी शुरू होनी थी।
माँ ने दो बार कहा था — “सो जा, नींद ज़रूरी है।”
Riya उठी।
धीरे से दरवाज़ा खोला।
नानी के कमरे में रोशनी थी।
नानी सोती कम थीं — रात को।
उम्र के साथ नींद कम हो जाती है — यह Riya ने कहीं पढ़ा था।
लेकिन नानी कहती थीं —
“रात को सोचने का time होता है।”
Riya अंदर गई।
नानी ने देखा।
कुछ कहा नहीं।
बस थोड़ा खिसककर बैठ गईं — जैसे जगह बना रही हों।
Riya उनके पास बैठ गई।
पलंग पर।
वैसे ही जैसे बचपन में बैठती थी —
जब डर लगता था,
या बुखार होता था,
या simply नींद नहीं आती थी।
कुछ देर कोई नहीं बोला।
बाहर कहीं कोई कुत्ता भौंका।
फिर चुप।
“डर लग रहा है?” नानी ने पूछा।
Riya ने सोचा — झूठ बोलूँ या सच।
“थोड़ा।”
नानी ने हाँ में सर हिलाया।
जैसे यह expected था।
“मुझे भी लगा था।”
Riya ने नानी को देखा।
“शादी से पहले?”
“हाँ।”
नानी ने अपने हाथ देखे —
जिन पर अब सिर्फ उम्र की लकीरें थीं।
“रात भर रोई थी।”
“क्यों?”
“पता नहीं था।”
एक pause।
“सब ठीक था — घर अच्छा था, लड़का अच्छा था।
लेकिन एक रात पहले —
कुछ था जो जाने वाला था।
वो feeling थी।“
Riya ने खिड़की से बाहर देखा।
“मुझे यह घर याद आएगा।”
“आएगा।”
“माँ याद आएँगी।”
“आएँगी।”
“आप याद आएँगी।”
नानी चुप रहीं।
थोड़ी देर।
“मैं नहीं जाऊँगी कहीं। हूँ यहीं।”
Riya को पता था —
नानी अब ज़्यादा travel नहीं करती थीं।
घुटने थे। उम्र थी।
Riya की नई city दूर थी।
Visits कम होंगी।
लेकिन नानी ने जो कहा —
वो distance के बारे में नहीं था।
“घर बदलना आसान होता है।
अपना होना नहीं।”
“जब मैं गई थी —” नानी ने शुरू किया —
“तो माँ ने एक चीज़ दी थी।
रास्ते में खोलने को कहा था।”
“क्या था?”
“एक पुरानी recipe। दाल की।
मेरी पसंद की।”
नानी की आँखें कहीं दूर थीं।
“कहा था — जब घर याद आए, यह बना लेना।”
Riya के गले में कुछ अटका।
“काम आई?”
“बहुत बार।”
नानी ने Riya की तरफ देखा।
“दाल में माँ का हाथ था।
जब भी बनाती थी — वो पास होती थीं।”
Riya ने नानी का हाथ पकड़ा।

नानी ने हाथ नहीं छुड़ाया।
दोनों बैठी रहीं।
बिना बोले।
खिड़की से ठंडी हवा आ रही थी।
कहीं दूर किसी मंदिर में घंटी बजी — धीरे से।
बारह बजे।
Riya की आँखें भारी होने लगीं।
नानी ने उसका सर अपनी गोद में रखा —
वैसे ही जैसे बचपन में रखती थीं।
“सो जा।”
“नींद नहीं आ रही।”
“आएगी।”
Riya को याद नहीं कब नींद आई।
सुबह उठी तो नानी के कमरे में थी।
नानी की पुरानी चादर ओढ़े हुए।
नानी कहीं नहीं थीं —
शायद रसोई में गई थीं।
Table पर एक कागज़ था।
Riya ने उठाया।
नानी की handwriting —
थोड़ी काँपती हुई —
में एक recipe थी।
दाल की।
नीचे लिखा था:
“जब घर याद आए।”
शादी अच्छी हुई।
Bidaai में माँ रोईं।
Papa रोए —
वो नहीं रोते थे, लेकिन रोए।
Riya की आँखें भी भरी थीं।
लेकिन एक रात पहले —
नानी की गोद में —
वो रो चुकी थी।
शायद इसीलिए उस पल थोड़ा हल्का था।
नई city में पहले हफ्ते —
एक शाम Riya ने वो recipe निकाली।
दाल बनाई।
खुशबू आई तो आँखें भर आईं।
लेकिन साथ में कुछ और भी था।
जैसे कोई पास हो।
कुछ रिश्ते साथ नहीं जाते।
वो स्वाद बनकर रह जाते हैं।





