दो बहनों के बीच की चुप्पी

— जब सालों बाद मिलना हुआ
Neha को याद नहीं था कि आखिरी बार उन्होंने ठीक से बात कब की थी।
दो साल? तीन?
एक WhatsApp message था — Diwali पर — जिसका जवाब नहीं आया था। उसके बाद Neha ने भी कोशिश नहीं की।
दीदी यानी Priya। बड़ी बहन। जो हमेशा सही होती थी — या कम से कम यही मानती थी।
वो झगड़ा किस बात पर था, Neha को अब exactly याद नहीं था। शादी में कुछ हुआ था — एक बात जो कहनी नहीं चाहिए थी, कही गई थी। फिर silence।
और silence में एक अजीब आदत होती है — वो खुद बड़ा होता जाता है।
माँ की तबियत खराब हुई तो दोनों को आना पड़ा।
एक ही घर। एक ही छत।
Neha पहले आई थी। माँ के कमरे में बैठी थी जब Priya का auto रुका। आवाज़ सुनकर Neha की साँस थोड़ी रुकी।
Priya अंदर आई। माँ से मिली। Neha की तरफ देखा — एक brief नज़र — और kitchen में चली गई।
“चाय बनाती हूँ।”
बस इतना।
रात को माँ सो गईं तो दोनों बाहर बरामदे में थीं। अलग-अलग कुर्सियों पर। दो फुट की दूरी। तीन साल की चुप्पी।
Priya ने phone देखा। Neha ने भी।
एक मच्छर आया। Neha ने हाथ हिलाया। Priya ने देखा और बिना कुछ बोले अंदर से coil लेकर आई। जलाई। रख दी।
“Thanks,” Neha ने कहा।
“हाँ।”
फिर silence।
रात के करीब ग्यारह बजे Priya ने कहा — बिना आँखें उठाए, phone देखते हुए:
“माँ की दवाई सुबह खाली हो जाएगी।”
“मुझे पता है। मैंने order कर दी है। कल सुबह आएगी।”
Priya ने phone रखा। एक पल रुकी।
“ठीक है।”
यह पहला ऐसा exchange था जिसमें झगड़ा नहीं था। कोई edge नहीं थी। बस दो lines — practical, simple।
छोटी सी बात थी। लेकिन Neha को लगा जैसे कुछ हल्का हुआ।
अगले दिन माँ थोड़ा better थीं। बैठकर खाना खाया। दोनों बेटियों को देखकर मुस्कुराईं।
“कितने दिन हो गए थे तुम दोनों को साथ देखे।”
किसी ने जवाब नहीं दिया।
दोपहर को Priya ने दाल चढ़ाई। Neha ने बिना पूछे रोटी बेलनी शुरू की। किसी ने divide नहीं किया — बस हो गया। जैसे पहले होता था।
खाना बनते-बनते Priya ने कहा:
“उस दिन जो मैंने कहा था — शादी में।”
Neha रुकी।
“वो नहीं कहना चाहिए था।”
तीन साल। बस इतना।
Neha ने रोटी पलटी। कुछ देर चुप रही।
“मैंने भी बाद में बहुत कुछ कहा। WhatsApp पर।”
“मैंने पढ़ा था।”
“जवाब नहीं दिया।”
“नहीं दिया।”

खाना खाते हुए माँ बीच में बोलीं — जैसे कुछ हुआ ही न हो:
“Priya, तेरे हाथ की दाल अभी भी सबसे अच्छी है।”
Priya हँसी। Neha भी।
पहली बार — उस घर में — दोनों एक साथ।
शाम को Neha का वापस जाने का time था।
Priya ने bag उठाने में help की। Auto बुलाया। और जब Neha निकलने लगी तो Priya ने कहा:
“माँ की next checkup है 28 को।”
“मुझे पता है। मैं आऊँगी।”
“मैं भी।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा।
कोई hug नहीं हुई। कोई dramatic moment नहीं था। तीन साल का हिसाब एक दोपहर में नहीं होता।
लेकिन कुछ था — एक छोटी सी शुरुआत। जैसे किसी बंद खिड़की की एक दरार खुली हो।
बस उतनी — जितनी हवा आने के लिए काफी हो।
Auto चला गया।
Priya अंदर आई। माँ के कमरे में झाँका। वो सो रही थीं।
उसने phone उठाया। Neha को message किया:
“घर पहुँचकर बताना।”
तीन dots आए।
“हाँ दीदी।”
Priya ने phone रखा। और पहली बार तीन साल में — उसे नींद जल्दी आई।

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