पुरानी Dining Table ने परिवार को फिर साथ क्यों बैठा दिया?
“मम्मी… ये पुरानी डाइनिंग टेबल बदल देते हैं।”
आयुष ने कहा।
लकड़ी घिस चुकी थी।
एक कोने पर दरार थी।
पापा मुस्कुराए।
“हाँ… बदल देंगे।”
लेकिन माँ चुप रहीं।
कुछ दिन बाद नया डाइनिंग टेबल घर आ गया।
चमकदार…
बड़ा…
बहुत सुंदर।
पुरानी टेबल बाहर रख दी गई।
शाम को खाना लगा।
सब अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए।
लेकिन…
आज घर में अजीब-सी ख़ामोशी थी।
न कोई हँसी…
न कोई पुरानी बात।
बस जल्दी-जल्दी खाना खत्म हुआ…
और सब अपने-अपने कमरे में चले गए।
अगले दिन माँ बाहर गईं।
पुरानी टेबल के पास बैठ गईं।
आयुष ने पूछा,
“क्या हुआ?”
माँ ने धीरे से उस टेबल पर हाथ फेरा।
“याद है…
यहीं बैठकर तू पहली बार खाना खुद खाया था।”
“यहीं तेरी बहन ने बोर्ड एग्ज़ाम का रिज़ल्ट बताया था।”
“यहीं तेरे पापा ने अपनी पहली प्रमोशन की मिठाई खिलाई थी।”
“और…”
माँ की आवाज़ भर्रा गई।
“दादाजी आख़िरी बार भी इसी टेबल पर हमारे साथ खाना खाकर उठे थे।”
आयुष कुछ बोल नहीं पाया।
उसने पहली बार उस टेबल को…
लकड़ी नहीं…
यादों की तरह देखा।
अगले रविवार…
नया डाइनिंग टेबल ड्रॉइंग रूम में चला गया।
और पुराना…
फिर से रसोई में।
रात को पूरा परिवार उसी पुरानी टेबल के चारों ओर बैठा था।
पापा पुराना किस्सा सुना रहे थे।
बहन हँस रही थी।
माँ रोटियाँ सेकते-सेकते मुस्कुरा रही थीं।
आयुष चुपचाप सबको देख रहा था।
उसे समझ आ गया…
घर नई चीज़ों से सुंदर बनता है।
लेकिन परिवार… पुरानी यादों से जुड़ा रहता है।
— समाप्त —
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