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“तुम्हें तो Experience नहीं है…” और उसी दिन उसने बोलना छोड़ दिया


ऑफिस में आयुष का तीसरा महीना था।

कॉलेज से निकलकर ये उसकी पहली नौकरी थी।

हर Meeting में वो notebook लेकर बैठता।

दूसरों की बातें ध्यान से सुनता।

कभी-कभी उसके दिमाग में कोई नया idea भी आता।

लेकिन वो सोचता…

“इतने experienced लोगों के बीच मैं क्या बोलूँ?”

एक दिन Product Meeting में Client की एक पुरानी समस्या पर चर्चा हो रही थी।

पूरी Team आधे घंटे से solution ढूँढ रही थी।

आयुष ने धीरे से हाथ उठाया।

“Sir… अगर हम onboarding process थोड़ा छोटा कर दें तो शायद users drop नहीं करेंगे।”

कमरे में कुछ सेकंड की ख़ामोशी रही।

फिर एक Senior हँसते हुए बोले—

“पहले थोड़ा experience ले लो… फिर process बदलने की बात करना।”

सब हल्का-सा मुस्कुरा दिए।

आयुष भी मुस्कुराया…

लेकिन उस दिन के बाद उसने Meeting में हाथ उठाना बंद कर दिया।


अगले चार महीने तक उसने सिर्फ वही किया जो उसे कहा गया।

ना कोई suggestion…

ना कोई सवाल…

ना कोई discussion।

उसका काम ठीक चलता रहा।

लेकिन उसकी पहचान सिर्फ एक silent employee की बन गई।


एक दिन Company में नए Business Head आए।

उन्होंने पहली ही Meeting में कहा,

“आज सिर्फ Junior Team बोलेगी। Seniors बीच में नहीं टोकेंगे।”

कमरे में अजीब-सी चुप्पी थी।

Business Head ने सीधे आयुष की तरफ देखा।

“तुम बताओ।”

आयुष घबरा गया।

“Sir… मेरे पास शायद सही answer नहीं है।”

Business Head मुस्कुराए।

“मुझे सही answer नहीं चाहिए। मुझे fresh perspective चाहिए।”

आयुष ने धीरे-धीरे वही idea बताया…

जो चार महीने पहले उसने रखा था।

इस बार किसी ने उसे बीच में नहीं रोका।

Discussion शुरू हुआ।

Whiteboard भर गया।

अगले हफ्ते उसी idea का pilot launch हुआ।

दो महीने बाद onboarding time लगभग 20% कम हो चुका था।


एक शाम वही Senior उसके desk पर आए।

“यार… अच्छा idea था।”

आयुष ने सिर्फ मुस्कुराकर कहा,

“Idea नया नहीं था…”

“बस इस बार उसे पूरा सुन लिया गया।”

Senior कुछ नहीं बोले।

शायद उन्हें भी समझ आ गया था कि कभी-कभी experience और confidence के बीच सबसे बड़ी दीवार…

दूसरों की प्रतिक्रिया नहीं…

एक पुराना वाक्य होता है।


उस दिन के बाद आयुष हर Meeting में बोलने नहीं लगा।

लेकिन उसने एक नियम बना लिया।

अगर उसके पास कोई ऐसा विचार है जो काम बेहतर कर सकता है…

तो वो उसे ज़रूर रखेगा।

माना जाए या नहीं…

ये बाद की बात है।


Workplace में Experience की अपनी जगह है।

लेकिन कई बार सबसे नए लोग वही सवाल पूछते हैं…

जो पुराने लोग पूछना छोड़ चुके होते हैं।

अगर हर नए विचार का जवाब सिर्फ—

“तुम्हें अभी Experience नहीं है”

हो जाए…

तो शायद Company सिर्फ नए Employees नहीं…

नए Ideas भी खो देती है।

क्योंकि कई बार किसी Idea की सबसे बड़ी ताकत…

उसे बोलने वाले की उम्र या designation नहीं…

उसकी उपयोगिता होती है।


इस कहानी से क्या सीख सकते हैं?

हर Workplace में Experience की अहमियत होती है। अनुभव फैसलों को बेहतर बनाता है, जोखिम कम करता है और दिशा देता है। लेकिन जब Experience ही किसी विचार की पहली कसौटी बन जाए, तब कई अच्छे सुझाव जन्म लेने से पहले ही खत्म हो जाते हैं।

Think: अगली बार किसी Junior का सुझाव सुनते समय यह सोचिए कि क्या आप व्यक्ति को सुन रहे हैं या सिर्फ उसकी designation को देख रहे हैं।

Decide: किसी Idea को स्वीकार करना जरूरी नहीं, लेकिन उसे पूरा सुनना जरूरी है। कई बार नया नज़रिया उसी व्यक्ति के पास होता है जो अभी सिस्टम को नए तरीके से देख रहा होता है।

Act: Meetings में ऐसा माहौल बनाइए जहाँ सवाल पूछना या अलग राय रखना कमजोरी नहीं, योगदान माना जाए। Leaders की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल जवाब देना नहीं, बल्कि लोगों को बोलने का भरोसा देना भी है।

हर कर्मचारी के लिए भी यह याद रखना जरूरी है कि एक बार मिली नकारात्मक प्रतिक्रिया आपकी सोच की अंतिम पहचान नहीं होती। सही समय और सही मंच मिलने पर वही विचार बदलाव ला सकता है।

याद रखने वाली बात:
कई बार Companies Ideas नहीं खोतीं… वे उन्हें बोलने की हिम्मत खोने देती हैं।


— समाप्त —

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