बारह साल बाद… सिर्फ़ एक “माफ़ करना” ने सब बदल दिया
“माफ़ करना…”
बारह साल बाद ये पहला शब्द था।
विवेक और कबीर बचपन के सबसे अच्छे दोस्त थे।
फिर…
एक छोटी-सी गलतफ़हमी ने दोनों को अलग कर दिया।
न किसी ने फोन किया…
न किसी ने सफाई दी।
बस…
अहंकार जीत गया।
समय हार गया।
बारह साल बाद गाँव में एक शादी थी।
पूरा मोहल्ला जुटा था।
विवेक जैसे ही मंडप के पास पहुँचा…
सामने कबीर खड़ा था।
दोनों की नज़रें मिलीं।
फिर तुरंत हट गईं।
दोनों अलग-अलग कोनों में खड़े रहे।
शाम ढलने लगी।
अचानक बिजली चली गई।
सब लोग मोबाइल की टॉर्च जलाने लगे।
उसी अँधेरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।
विवेक और कबीर…
दोनों एक साथ उसकी तरफ दौड़े।
बच्चा मिल गया।
दोनों की साँसें एक साथ सामान्य हुईं।
तभी कबीर मुस्कुराया।
“तू आज भी पहले दौड़ता है…”
विवेक भी हँस पड़ा।
“और तू आज भी पीछे नहीं रहता।”
कुछ पल की चुप्पी रही।
फिर विवेक ने धीरे से कहा—
“माफ़ करना…”
कबीर ने बीच में ही गले लगा लिया।
“इतने साल…
बस यही सुनना था।”
उस रात किसी ने नहीं पूछा…
गलती किसकी थी।
क्योंकि कुछ रिश्तों में…
सच से ज़्यादा ज़रूरी होता है…
वापस मिल जाना।
— समाप्त —
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