Result में नाम नहीं था… फिर भी पापा मुस्कुरा क्यों रहे थे?
“पापा…”
आर्यन ने धीरे से कहा।
“अगर इस बार भी नहीं हुआ… तो?”
पिता ने उसकी तरफ देखा।
“तो अगली बार कोशिश करेंगे।”
पूरा साल उसने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की थी।
दोस्त बाहर घूम रहे थे।
शादियाँ छूट गईं।
त्योहार किताबों के साथ बीते।
उसे यकीन था…
इस बार चयन हो जाएगा।
रिज़ल्ट आया।
नाम नहीं था।
कमरे का दरवाज़ा बंद।
फोन बंद।
दुनिया जैसे रुक गई।
रात को दरवाज़े पर दस्तक हुई।
पिता चुपचाप अंदर आए।
हाथ में दो कुल्हड़ चाय थी।
दोनों बालकनी में बैठ गए।
काफ़ी देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर पिता ने पूछा,
“तुझे साइकिल चलाना किसने सिखाया था?”
आर्यन बोला,
“आपने।”
“पहली बार में सीख गया था?”
आर्यन हल्का-सा मुस्कुराया।
“नहीं…
बहुत बार गिरा था।”
पिता भी मुस्कुराए।
“और अगर पहली बार गिरने के बाद छोड़ देता…
तो आज चला पाता?”
आर्यन चुप हो गया।
पिता उठे।
जाते-जाते बस इतना कहा—
“बेटा… असफल वो नहीं होता जो हार जाता है।
असफल वो होता है… जो खुद पर भरोसा छोड़ देता है।”
एक साल बाद…
फिर वही रिज़ल्ट।
इस बार…
आर्यन का नाम सबसे ऊपर था।
घर लौटते ही उसने सबसे पहले अपने पापा को गले लगा लिया।
पिता मुस्कुराकर बोले—
“देखा…
साइकिल फिर चल गई।”
उस दिन आर्यन ने समझा…
कुछ लोग हमें मंज़िल तक नहीं पहुँचाते।
बस… गिरने के बाद दोबारा उठना सिखा देते हैं।
— समाप्त —
— StoryLab की और कहानियाँ
रात 2 बजे CCTV में जो दिखा, उसने सब कुछ बदल दिया
WFH Permanent था… फिर एक Monday Morning Call आ गई
पापा ने अपने लिए नए shoes कभी क्यों नहीं खरीदे? | A Story of Quiet Pride
रात के 2 बजे भी Scrolling क्यों करते रहते हैं? Sleep & Screen Time Psychology
लड़कियां पढ़ाई में आगे, घर में भी ज़िम्मेदार — फिर भी “settle” होने का pressure उन पर ज़्यादा क्यों?




