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बरगद के नीचे हर रात जलने वाला दिया कौन जलाता था?


“अरे सुन… आज फिर बरगद के पेड़ के नीचे दिया जल रहा है।”

रवि की माँ ने रसोई से आवाज़ लगाई।

रवि हँस पड़ा।

“माँ, इस गाँव में हर बात में भूत क्यों आ जाता है?”

वह पाँच साल बाद शहर से अपने गाँव लौटा था।

रात को दोस्तों के साथ चौपाल पर बैठा था कि किसी ने कहा,

“अगर हिम्मत है… तो जाकर वो दिया बुझा आ।”

रवि मुस्कुराया।

“बस इतनी सी बात?”

वह अकेला बरगद की ओर चल पड़ा।

पेड़ के नीचे सचमुच एक मिट्टी का दिया जल रहा था।

आस-पास कोई नहीं।

उसने झुककर फूँक मारी।

दिया बुझ गया।

जैसे ही वह मुड़ा…

पीछे से किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ आई—

“बेटा… उसे क्यों बुझाया?”

रवि ने पलटकर देखा।

कोई नहीं था।

वह तेज़ कदमों से घर लौट आया।

सुबह पूरा गाँव बरगद के पास जमा था।

दिया फिर जल रहा था।

रवि ने हँसते हुए कहा,

“किसी ने फिर जला दिया होगा।”

गाँव के सबसे बुज़ुर्ग आदमी ने उसकी तरफ देखा।

“बेटा… इस दिए को गाँव का कोई नहीं जलाता।”

“तो फिर?”

“पचास साल पहले यहीं एक दादी हर रात रास्ता भटकने वालों के लिए दिया जलाती थीं। एक रात खुद लौटकर नहीं आईं…”

“तब से…”

“हर रात दिया अपने आप जलता है।”

रवि चुप हो गया।

उसी रात उसने खिड़की से बरगद की तरफ देखा।

दिया जल रहा था।

लेकिन इस बार…

उसकी रोशनी में कोई बैठा था।

सफेद साड़ी…

झुकी हुई कमर…

और हाथ में एक और दिया।

वह धीरे से उठी…

रास्ते की तरफ देखा…

और मुस्कुराकर दूसरा दिया भी जला दिया।

अगली सुबह गाँव में खबर फैली।

रात को हाईवे पर एक बस खाई में गिरने से बच गई।

ड्राइवर ने सिर्फ़ इतना कहा—

“दूर एक दिया जलता दिखा…

मैंने उसी तरफ गाड़ी मोड़ दी।”

उस दिन पहली बार…

रवि ने बरगद के नीचे सिर झुका दिया।


— समाप्त —

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