105 साल पुराना BDS क्लब: बनारस में सिंदूर खेला और माँ दुर्गा की भावुक विदाई
सिंदूर खेला की खुशियों से लेकर माँ की विदाई के आँसुओं तक, बनारस के बंगाली समुदाय की एक अनूठी परंपरा ने दिल छू लिया।
ढाक की गूँज, धुनुची डांस की थिरकन, चेहरे पर सिंदूर की लालिमा, हाथों में मिठाइयाँ और आँखों में बिछड़ने का दर्द। दुर्गा पूजा के आखिरी दिन बनारस के BDS क्लब में कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला।
विजयादशमी के अवसर पर यहाँ सिंदूर खेला की परंपरा निभाई गई और फिर माँ दुर्गा को भावुक विदाई दी गई। लेकिन इस उत्सव को करीब से देखने और लोगों से बातचीत करने पर एहसास हुआ कि बंगाली समुदाय के लिए दुर्गा पूजा सिर्फ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि पारिवारिक रिश्तों, भावनाओं और अपनी संस्कृति से जुड़ने का एक खास अवसर है।
सिंदूर खेला के दौरान महिलाएँ एक-दूसरे को सिंदूर लगा रही थीं, मिठाइयाँ खिला रही थीं और इन खूबसूरत पलों को तस्वीरों में संजो रही थीं। बच्चों का उत्साह देखते ही बन रहा था। ढाक की आवाज़, धुनुची नृत्य और लोगों की खिलखिलाहट से पूरा परिसर उत्सव के रंग में रंगा हुआ था।
इसी बीच मेरी मुलाकात BDS क्लब की भावना विश्वास और सपना चटर्जी से हुई। उनसे बातचीत के दौरान दुर्गा पूजा और सिंदूर खेला से जुड़ी कई ऐसी बातें जानने को मिलीं, जो बंगाली समुदाय से बाहर के लोगों के लिए शायद अनजानी हों।
माँ दुर्गा नहीं, मायके आई घर की बेटी: बनारस में इस परंपरा का अपना ही भाव
भावना विश्वास और सपना चटर्जी ने बताया कि उनके लिए दुर्गा पूजा केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि अपने घर आई बेटी के स्वागत का उत्सव भी है। उनकी मान्यता में माँ दुर्गा अपने मायके आने वाली बेटी के समान हैं।
जिस तरह किसी घर में बेटी के आने पर खुशियाँ मनाई जाती हैं, उसके लिए तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं और उसका प्यार से स्वागत किया जाता है, उसी तरह वे माँ दुर्गा का स्वागत करती हैं।
यही वजह है कि उनके लिए दुर्गा पूजा का आनंद धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इस दौरान घर में उत्सव का माहौल होता है, भोग तैयार किए जाते हैं और परिवार व समुदाय के लोग मिलकर खुशियाँ मनाते हैं।
बातचीत में एक ऐसी परंपरा भी सामने आई, जिसने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि वे इस दौरान उपवास रखने के बजाय माँ को तरह-तरह के पकवानों का भोग लगाना पसंद करती हैं।
इसके पीछे उनकी भावना है कि जब घर में बेटी आती है, तो उसका स्वागत भूखा रहकर नहीं, बल्कि उसे प्रेम से खिलाकर किया जाता है। अगर वे स्वयं उपवास रखेंगी, तो मानो उनकी बेटी भी भूखी रह जाएगी।
एक ही धार्मिक परंपरा को देखने का यह कितना आत्मीय दृष्टिकोण है! यहाँ भक्ति में केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि माँ-बेटी के रिश्ते जैसा अपनापन भी दिखाई देता है।
षष्ठी से विजयादशमी तक: कैसे मनाई जाती है बंगाली दुर्गा पूजा?
भावना विश्वास और सपना चटर्जी ने बताया कि बंगाली परंपरा में दुर्गा पूजा का मुख्य उत्सव नवरात्रि के छठे दिन, षष्ठी से शुरू होता है।
माँ के आगमन का स्वागत ढाक की गूँज, उत्साह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ किया जाता है। इसके बाद पूजा के दिनों में अलग-अलग आयोजन होते हैं। धुनुची नृत्य, ढाक की थाप और सामूहिक उत्सव इस परंपरा को जीवंत बनाते हैं।
फिर आता है विजयादशमी का दिन, जब पूजा-अर्चना के बाद सिंदूर खेला की परंपरा निभाई जाती है और माँ को विदाई दी जाती है।

सिंदूर खेला में सिंदूर और मिठाइयों के पीछे क्या है भावना?
सिंदूर खेला केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर है।
भावना विश्वास और सपना चटर्जी ने बताया कि इस परंपरा में महिलाएँ माँ दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं, उन्हें मिठाई खिलाती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मिठाई खिलाती हैं।
इस रस्म के साथ सुखी वैवाहिक जीवन और पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम व साथ बने रहने की कामना जुड़ी है। उनकी आस्था में माँ दुर्गा और भगवान शिव का रिश्ता इस प्रार्थना को एक विशेष अर्थ देता है।
सिंदूर से रंगे चेहरे, एक-दूसरे को गले लगाती महिलाएँ और कैमरों में कैद होती मुस्कुराहटें इस बात की गवाह थीं कि यह रस्म उनके लिए कितनी खास है।
हर ओर खुशी थी, अपनापन था और अपनी परंपरा को जीने का उत्साह था।
Gen Z होने के बावजूद श्रेष्ठा और दीपशिता को क्यों है दुर्गा पूजा का इंतजार?
उत्सव के बीच मेरी मुलाकात दो युवा बंगाली लड़कियों—श्रेष्ठा और दीपशिता—से भी हुई। दोनों BDS क्लब की सदस्य नहीं थीं, लेकिन पहली बार इस क्लब में दुर्गा पूजा मना रही थीं।
जब मैंने उनसे पूछा कि आज की Gen Z पीढ़ी होने के बावजूद वे इन परंपराओं को लेकर कितनी उत्साहित रहती हैं, तो उनका जवाब बेहद दिलचस्प था।
उन्होंने कहा कि वे भले ही Gen Z हों, लेकिन आखिरकार बंगाली हैं और दुर्गा पूजा उनके लिए भावनाओं से जुड़ा त्योहार है।
उनकी बातों में एक अलग ही चमक थी। उन्होंने बताया कि वे पूरे साल इस त्योहार का इंतजार करती हैं। ढाक की आवाज़, धुनुची डांस और सिंदूर खेला उनके लिए ऐसे पल हैं, जिन्हें वे सिर्फ देखती नहीं, बल्कि पूरी तरह जीती हैं।
श्रेष्ठा और दीपशिता ने बताया कि वे हर साल दुर्गा पूजा के दौरान कोलकाता भी जाती हैं। वहाँ पूजा का आयोजन और उत्सव का विस्तार उन्हें बेहद पसंद है। बनारस में भी उन्हें अच्छा लग रहा था, लेकिन कोलकाता के ढाक की गूँज और वहाँ होने वाले सिंदूर खेला की भव्यता उन्हें याद आ रही थी।
उनसे बातचीत करके यह समझ आया कि पीढ़ियाँ बदल सकती हैं, समय बदल सकता है, लेकिन अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी भावनाएँ आसानी से नहीं बदलतीं।

जब दुर्गा पूजा की खुशियों में शामिल हुईं दूसरी संस्कृति की महिलाएँ
इस उत्सव में एक गैर-बंगाली महिला भी उतनी ही उत्साहित दिखाई दीं। उनकी खुशी और भागीदारी देखकर लगा कि यह उत्सव उनके लिए भी खास मायने रखता है।
यह दृश्य अपने आप में बहुत कुछ कह रहा था। दुर्गा पूजा बंगाली समुदाय की सांस्कृतिक पहचान जरूर है, लेकिन इसकी खुशियाँ किसी एक भाषा या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं।
जब लोग एक-दूसरे की परंपराओं को अपनापन देकर देखते हैं, तो त्योहार सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का माध्यम बन जाते हैं।
सिंदूर खेला की खुशियों के बाद माँ की विदाई पर क्यों छलक उठे आँसू?
सिंदूर खेला के दौरान जहाँ हर तरफ हँसी, संगीत और उल्लास था, वहीं कुछ ही देर बाद पूरा माहौल बदलने लगा। माँ दुर्गा की विदाई का समय आ गया था।
जो महिलाएँ कुछ देर पहले एक-दूसरे को सिंदूर लगा रही थीं, मिठाइयाँ खिला रही थीं और तस्वीरें खिंचवा रही थीं, अब उनकी आँखों में आँसू थे। चेहरे पर वही माँ के प्रति प्रेम था, लेकिन इस बार उसमें बिछड़ने का दर्द भी शामिल था।
ऐसा लग रहा था, मानो घर की बेटी कुछ दिनों के लिए मायके आई थी और अब उसे विदा करने का समय आ गया हो। हर चेहरा यही कह रहा था कि उत्सव कितना भी भव्य क्यों न हो, विदाई का पल हमेशा भावुक कर देता है।
यह केवल माँ दुर्गा की प्रतिमा की विदाई नहीं थी। यह उस बेटी को विदा करने जैसा था, जिसके आने से घर में रौनक थी, जिसके साथ हर दिन उत्सव था और जिसके जाने के बाद एक खालीपन रह जाने वाला था।
ढाक की गूँज अब भी कानों में थी, सिंदूर खेला के दृश्य आँखों के सामने थे और कुछ ही पलों पहले मुस्कुराते चेहरों पर आए आँसू मन को भीतर तक छू रहे थे।

माँ की विदाई के साथ शुरू हुआ अगले साल का इंतजार
BDS क्लब में बिताए उन पलों के बाद मेरे मन में एक ही सवाल बार-बार आया—जब माँ की विदाई इतनी भावुक होती है, तो फिर अगले साल उनके आने का इंतजार कितना गहरा होता होगा!
शायद इसी इंतजार का नाम दुर्गा पूजा है। कुछ दिनों की खुशियाँ, परिवार जैसा अपनापन, संस्कृति से जुड़ाव और अंत में एक ऐसी विदाई, जो अगले मिलन की उम्मीद छोड़ जाती है।
बनारस के BDS क्लब में मैंने दुर्गा पूजा के जिस रूप को देखा, उसने मुझे एक अलग ही दृष्टिकोण दिया। यहाँ भक्ति केवल हाथ जोड़ने में नहीं, बल्कि माँ को बेटी मानकर उनका स्वागत करने में थी। यहाँ परंपरा केवल निभाई नहीं जा रही थी, बल्कि हर उम्र के लोग उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाकर जी रहे थे।
और जब माँ की विदाई हुई, तो महसूस हुआ कि कुछ रिश्तों को समझने के लिए किसी भाषा का जानना जरूरी नहीं होता। उन्हें महसूस करने के लिए बस एक संवेदनशील दिल चाहिए।
क्योंकि बंगाली समुदाय के लिए दुर्गा पूजा सिर्फ माँ के आगमन का उत्सव नहीं, बल्कि अपनी बेटी के साथ बिताए उन अनमोल पलों की कहानी है, जिसका इंतजार अगले साल फिर शुरू हो जाता है।
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क्या त्योहार सिर्फ परंपराएँ हैं, या रिश्तों को जीने का तरीका भी?
BDS क्लब में दुर्गा पूजा का यह अनुभव दिखाता है कि किसी संस्कृति को समझने के लिए उसके अनुष्ठानों की जानकारी भर काफी नहीं होती। उनके पीछे छिपी भावनाओं को समझना भी जरूरी है।
माँ दुर्गा को मायके आई बेटी मानना, उनके स्वागत में पकवान बनाना और विदाई के समय भावुक हो जाना—ये अनुभव इस उत्सव को एक पारिवारिक अर्थ देते हैं। श्रेष्ठा और दीपशिता की बातें यह भी दिखाती हैं कि नई पीढ़ी के लिए सांस्कृतिक पहचान केवल विरासत नहीं, बल्कि अपनेपन का अनुभव भी है।
किसी परंपरा की असली खूबसूरती सिर्फ इस बात में नहीं कि उसे कितने वर्षों से निभाया जा रहा है, बल्कि इसमें है कि वह लोगों के जीवन में आज भी क्या अर्थ रखती है।
सिंदूर खेला, बंगाली दुर्गा पूजा और उनसे जुड़ी अनसुनी बातें
1. बंगाली दुर्गा पूजा और उत्तर भारत की नवरात्रि में क्या अंतर है?
बंगाली दुर्गा पूजा में षष्ठी से विजयादशमी तक माँ दुर्गा के आगमन, पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और विदाई पर विशेष जोर होता है। उत्तर भारत में नवरात्रि के दौरान नौ दिनों की पूजा, व्रत और अलग-अलग क्षेत्रीय परंपराएँ प्रमुख होती हैं। हालाँकि, दोनों में माँ दुर्गा की आराधना महत्वपूर्ण है।
2. दुर्गा पूजा में षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी का क्या महत्व है?
ये पाँच दिन बंगाली दुर्गा पूजा के प्रमुख चरण हैं। षष्ठी पर माँ के आगमन का स्वागत होता है, सप्तमी से पूजा के प्रमुख अनुष्ठान आगे बढ़ते हैं, अष्टमी और नवमी विशेष पूजा के दिन हैं, जबकि दशमी पर माँ को विदाई दी जाती है।
3. धुनुची नृत्य क्या है और दुर्गा पूजा में इसे क्यों किया जाता है?
धुनुची नृत्य बंगाली दुर्गा पूजा की एक पारंपरिक प्रस्तुति है। इसमें धुनुची नाम के पात्र में धूप या अन्य सुगंधित सामग्री जलाकर, ढाक की थाप पर नृत्य किया जाता है। यह पूजा के उत्सवी और भक्तिपूर्ण माहौल का अहम हिस्सा है।
4. क्या सिंदूर खेला में सिर्फ विवाहित महिलाएँ ही भाग लेती हैं?
परंपरागत रूप से सिंदूर खेला में विवाहित महिलाएँ प्रमुख रूप से भाग लेती हैं और एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर शुभकामनाएँ देती हैं। अलग-अलग आयोजनों और समुदायों में भागीदारी के तरीके अलग हो सकते हैं।
5. क्या बनारस में भी बंगाली दुर्गा पूजा की परंपराएँ देखने को मिलती हैं?
हाँ, बनारस में बंगाली समुदाय दुर्गा पूजा के दौरान पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करता है। BDS क्लब में सिंदूर खेला और माँ दुर्गा की विदाई का अनुभव इसी सांस्कृतिक परंपरा की एक झलक प्रस्तुत करता है।
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