काशी की दुर्गा पूजा: आस्था, गंगा और विसर्जन की चुनौती
Why It Matters | विशेष लेख |
Story at a Glance
2015 में गंगा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर अदालत के निर्देशों, प्रशासनिक व्यवस्था और पूजा समितियों की चिंताओं के बीच विवाद गहराया।
तिलक राज मिश्रा के अनुभव पूजा समितियों की चिंताओं और धार्मिक परंपरा के निर्वाह से जुड़ी चुनौतियों को सामने लाते हैं।
प्राकृतिक मिट्टी और पर्यावरण-अनुकूल रंग प्रदूषण घटाने में मदद कर सकते हैं, लेकिन जिम्मेदार विसर्जन भी जरूरी है।
2026 में विसर्जन स्थलों पर पानी, सफाई और व्यवस्था को लेकर उठी शिकायतें बेहतर तैयारी की जरूरत दिखाती हैं।
पूजा समितियों और प्रशासन के बीच संवाद, स्पष्ट नियम और बेहतर प्रबंधन आस्था तथा गंगा संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में मदद कर सकते हैं।
काशी में दुर्गा पूजा के दिन शहर की गलियों से लेकर बड़े पंडालों तक उत्सव का माहौल रहता है। लेकिन उत्सव खत्म होने के बाद एक ऐसा सवाल सामने आता है, जिसका जवाब केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है—मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन कहाँ और किन परिस्थितियों में हो?
वाराणसी में यह सवाल नया नहीं है। वर्ष 2015 में गंगा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर उठा विवाद अदालत, प्रशासन और पूजा समितियों तक पहुँचा था। उस समय धार्मिक परंपरा को निभाने की मांग के साथ गंगा के प्रदूषण और वैकल्पिक विसर्जन स्थलों की व्यवस्था पर भी बहस हुई।
अब 2026 में विसर्जन की तैयारियों को लेकर पूजा समितियों की चिंताएँ फिर सामने आई हैं। अमर उजाला की 30 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 512 प्रतिमाओं के लिए 20 विसर्जन स्थल निर्धारित किए गए थे। समिति पदाधिकारियों ने कुछ स्थलों पर पानी की कमी, गंदगी और दुर्गंध की शिकायतें उठाईं।
दुर्गा पूजा समिति से जुड़े रहे तिलक राज मिश्रा के अनुभव इस पूरे सवाल को एक मानवीय संदर्भ देते हैं। उनकी बातचीत में धार्मिक परंपरा, विसर्जन की व्यवस्था और पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं की जरूरत बार-बार सामने आती है।
यह कहानी सिर्फ इस बात की नहीं है कि प्रतिमाओं का विसर्जन कहाँ होगा। सवाल यह है कि काशी अपनी परंपरा निभाते हुए गंगा और अपने दूसरे जलस्रोतों की जिम्मेदारी कैसे निभाए।

Tilak Raj Mishra
This story draws on a conversation with Tilak Raj Mishra about public life, social service and the concerns surrounding Durga Puja and idol immersion in Varanasi. His experiences provide the starting point for this article, developed and presented through the independent editorial work of InnaMax News.
2015 में काशी का विसर्जन विवाद अदालत तक क्यों पहुँचा?
वर्ष 2015 में वाराणसी में गंगा में प्रतिमा विसर्जन को लेकर विवाद गहरा गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन ने गंगा में विसर्जन पर रोक के अनुपालन के लिए वैकल्पिक जलाशयों और अस्थायी कुंडों की व्यवस्था की।
इंडियन एक्सप्रेस की 17 अक्टूबर 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने धार्मिक भावनाओं के सम्मान और गंगा के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया था। उसने प्रतिमा निर्माताओं को पर्यावरण-अनुकूल सामग्री इस्तेमाल करने के लिए जागरूक करने की बात भी कही थी।
उस समय बहस के दो महत्वपूर्ण पहलू थे। पूजा समितियों के लिए विसर्जन धार्मिक प्रक्रिया का हिस्सा था। वहीं, नदी में प्रतिमाओं और पूजा सामग्री के विसर्जन से होने वाले प्रदूषण को रोकना प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पक्षों की चिंता थी।
तिलक राज मिश्रा अपनी बातचीत में उस दौर को पूजा समितियों के लिए चुनौतीपूर्ण समय के रूप में याद करते हैं। उनके अनुसार, विसर्जन की व्यवस्था को लेकर विरोध और प्रशासन से बातचीत की परिस्थितियाँ बनीं। वह इस घटनाक्रम में अपनी भूमिका और समितियों की चिंताओं का भी उल्लेख करते हैं।
इस विवाद को समझते समय एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए। सितंबर 2015 में गणेश प्रतिमा विसर्जन को लेकर हुए विरोध और पुलिस कार्रवाई की घटनाएँ भी सामने आई थीं। इंडिया टुडे की समकालीन रिपोर्ट उस घटनाक्रम का विवरण देती है। गणेश विसर्जन से जुड़ी घटना और दुर्गा पूजा के हर प्रसंग को एक ही घटना मानना उचित नहीं होगा।
2015 का अनुभव यह जरूर दिखाता है कि विसर्जन की व्यवस्था पर निर्णय लेते समय धार्मिक भावनाओं, पर्यावरण और सार्वजनिक व्यवस्था—तीनों को ध्यान में रखना पड़ता है।
विसर्जन स्थल तय होने के बाद भी समितियों की मुश्किलें क्यों बनी रहती हैं?
विसर्जन के लिए किसी तालाब या कुंड का नाम तय कर देना व्यवस्था का केवल एक हिस्सा है। प्रतिमा वहाँ तक कैसे पहुँचेगी, रास्ते की स्थिति कैसी होगी, भीड़ का प्रबंधन कौन करेगा और विसर्जन के बाद सफाई कैसे होगी—इन सवालों के जवाब भी जरूरी हैं।
मिश्रा की बातचीत में समितियों की यही चिंता सामने आती है कि धार्मिक प्रक्रिया के लिए तय की गई व्यवस्था व्यवहार में भी काम करनी चाहिए। उनके अनुभव के अनुसार, वैकल्पिक विसर्जन स्थल पर पानी और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएँ महत्वपूर्ण हैं।
यह केवल आयोजकों की सुविधा का सवाल नहीं है। यदि कई प्रतिमाओं का विसर्जन एक ही स्थान पर होना है, तो पानी की उपलब्धता, सुरक्षा, पहुँच मार्ग और अवशेषों के निपटान की योजना पहले से तैयार होनी चाहिए।
यहीं प्रशासन और पूजा समितियों के बीच नियमित संवाद की जरूरत सामने आती है। त्योहार से ठीक पहले समस्याएँ सामने आने पर उन्हें दूर करने के लिए समय कम रह जाता है। अगर समितियों से पहले ही जानकारी ली जाए और स्थलों का निरीक्षण समय रहते हो, तो कई कठिनाइयों का समाधान आयोजन शुरू होने से पहले किया जा सकता है।

क्या मिट्टी की प्रतिमा से गंगा को प्रदूषण से बचाया जा सकता है?
तिलक राज मिश्रा का पक्ष है कि प्रतिमाओं के निर्माण में प्राकृतिक मिट्टी और पर्यावरण-अनुकूल रंगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वह प्लास्टर ऑफ पेरिस और प्रदूषण बढ़ाने वाली सामग्रियों के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात करते हैं।
इस सुझाव का महत्व समझना मुश्किल नहीं है। प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का प्रभाव विसर्जन के बाद जलाशय पर पड़ सकता है। इसलिए प्रतिमा निर्माण के समय ही सामग्री के चुनाव पर ध्यान देना जरूरी है।
लेकिन केवल प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमा होना पूरी समस्या का समाधान नहीं है। रंगों में मौजूद रसायन, सजावट में लगी सामग्री, प्रतिमा का आकार और विसर्जन स्थल की स्थिति भी मायने रखते हैं। पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा के साथ जिम्मेदार विसर्जन और बाद में अवशेषों का उचित प्रबंधन भी जरूरी है।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की आधिकारिक निर्देश सूची में नदियों और अन्य जलस्रोतों में प्रतिमाओं तथा पूजा सामग्री के विसर्जन को प्रतिबंधित करने से जुड़े निर्देश उपलब्ध हैं। स्थानीय स्तर पर लागू नियमों को संबंधित प्रशासनिक आदेश से मिलाकर देखना चाहिए।
इसलिए समाधान सिर्फ प्रतिमा बनाने वालों से सामग्री बदलने की अपेक्षा करना नहीं है। उन्हें सही जानकारी, उपयुक्त विकल्प और स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलें, यह भी उतना ही जरूरी है।
2026 में विसर्जन स्थलों की तैयारी पर सवाल क्यों उठे?
2015 का विवाद इतिहास का हिस्सा है, लेकिन विसर्जन की व्यवस्था हर साल एक व्यावहारिक चुनौती बनी रहती है। इस वर्ष की तैयारियों को लेकर सामने आई शिकायतें इसी बात की ओर ध्यान खींचती हैं।
अमर उजाला की 30 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में पूजा समितियों के पदाधिकारियों ने बताया कि 512 प्रतिमाओं के लिए 20 विसर्जन स्थल निर्धारित किए गए थे। उनकी शिकायतों में कुछ कुंडों में पानी की कमी, गंदगी और दुर्गंध के साथ खराब सड़कों तथा सुरक्षा से जुड़े सवाल भी शामिल थे।
यह रिपोर्ट समितियों के प्रतिनिधियों की शिकायतों को सामने रखती है। इसे यह मानने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए कि सभी विसर्जन स्थल एक जैसी स्थिति में हैं। लेकिन यह जरूर बताती है कि विसर्जन की तैयारियों का मूल्यांकन केवल निर्धारित स्थलों की संख्या से नहीं हो सकता। उनकी वास्तविक स्थिति भी देखनी होगी।
यहाँ कुछ सीधे सवाल उठते हैं। क्या निर्धारित स्थलों पर समय से पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया गया? क्या सफाई और सुरक्षा की व्यवस्था तैयार थी? क्या जुलूस के रास्तों और भीड़ प्रबंधन पर समितियों के साथ पहले से बातचीत हुई? और विसर्जन के बाद अवशेषों को हटाने की जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों के जवाब के लिए पूजा समितियों के अनुभवों के साथ नगर निगम और जिला प्रशासन का पक्ष भी जरूरी है। शिकायतें सामने आना एक बात है; हर स्थल की स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई की पुष्टि करना दूसरी।

आस्था और गंगा संरक्षण के बीच रास्ता कैसे निकलेगा?
काशी में धार्मिक परंपरा और गंगा का संरक्षण, दोनों महत्वपूर्ण हैं। एक को बचाने के नाम पर दूसरे की चिंता को नजरअंदाज करने से विवाद आगे बढ़ सकता है। बेहतर रास्ता ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें धार्मिक आयोजन सम्मानपूर्वक हो और जलस्रोतों पर पड़ने वाला प्रभाव कम किया जा सके।
इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम जरूरी हैं—प्रतिमा निर्माण में पर्यावरण-अनुकूल सामग्री को बढ़ावा देना, विसर्जन स्थलों की समय से सफाई करना, पर्याप्त पानी और सुरक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करना और पूजा समितियों के साथ पहले से संवाद करना।
विसर्जन के बाद अवशेषों को व्यवस्थित ढंग से हटाने की जिम्मेदारी भी स्पष्ट होनी चाहिए। इससे न केवल जलाशयों की सफाई बेहतर हो सकती है, बल्कि आयोजकों और प्रशासन के बीच जिम्मेदारियों को लेकर भ्रम भी कम होगा।
तिलक राज मिश्रा की बातचीत इस बहस में समितियों के अनुभव और दृष्टिकोण को सामने लाती है। उनके लिए विसर्जन धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनका आग्रह है कि व्यवस्था ऐसी हो जिसमें परंपरा का सम्मान हो और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को भी महत्व मिले।
लेकिन किसी स्थायी समाधान के लिए केवल एक व्यक्ति या एक समिति का अनुभव पर्याप्त नहीं है। वर्तमान पूजा समितियों, प्रतिमा निर्माताओं, पर्यावरण विशेषज्ञों और प्रशासन को साथ बैठकर व्यावहारिक व्यवस्था पर काम करना होगा।
काशी की दुर्गा पूजा के सामने असली चुनौती परंपरा और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों के प्रति जिम्मेदारी निभाने की है। बेहतर तैयारी, स्पष्ट नियम और नियमित संवाद इस दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता दे सकते हैं।
आपकी राय: विसर्जन की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या विसर्जन स्थलों की तैयारी में पूजा समितियों की भागीदारी पहले से सुनिश्चित होनी चाहिए? क्या पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमाओं को बढ़ावा देने के लिए निर्माताओं को अतिरिक्त सहयोग मिलना चाहिए? और क्या हर वर्ष विसर्जन के बाद स्थलों की स्थिति की सार्वजनिक समीक्षा होनी चाहिए?
इन सवालों पर पूजा समितियों, प्रतिमा निर्माताओं, प्रशासन और श्रद्धालुओं के अनुभव मिलकर आगे की दिशा तय कर सकते हैं।

प्रतिमा विसर्जन से जुड़े सवाल और उनके जवाब
1. पूजा समिति को विसर्जन स्थल की स्थिति कब जाँचनी चाहिए?
आयोजन से पर्याप्त समय पहले स्थल का निरीक्षण करना बेहतर है, ताकि पानी, सफाई, रास्ते और सुरक्षा से जुड़ी कमियों को समय रहते संबंधित विभाग तक पहुँचाया जा सके।
2. पर्यावरण-अनुकूल प्रतिमा की पहचान कैसे करें?
निर्माता से मिट्टी, रंग और सजावट में इस्तेमाल सामग्री के बारे में स्पष्ट जानकारी लें। केवल प्रचार में इस्तेमाल किए गए “इको-फ्रेंडली” शब्द को पर्याप्त प्रमाण न मानें।
3. क्या प्रतिमा विसर्जन के लिए कोई भी तालाब इस्तेमाल किया जा सकता है?
नहीं। विसर्जन के लिए संबंधित प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थल और लागू नियमों का पालन करना चाहिए। निजी या सार्वजनिक जलाशय को स्वतः उपयुक्त नहीं माना जा सकता।
4. विसर्जन के बाद सफाई की जिम्मेदारी कैसे तय होनी चाहिए?
स्थानीय निकाय और आयोजकों को पहले से स्पष्ट करना चाहिए कि अवशेषों का संग्रह, स्थल की सफाई और कचरे का निपटान कौन करेगा। जिम्मेदारी स्पष्ट होने से बाद की अव्यवस्था कम हो सकती है।
5. पूजा समितियाँ अपनी शिकायतों का रिकॉर्ड कैसे रखें?
समस्या का स्थान, तारीख, तस्वीर और संबंधित विभाग को की गई शिकायत का विवरण दर्ज रखना उपयोगी है। इससे प्रशासन से जवाब माँगने और सुधार की स्थिति पर आगे कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।
InnaMax Original — यह कहानी InnaMax News की original conversation पर आधारित है। बातचीत से सामने आए अनुभव, विचार और जानकारी को editorially organised किया गया है।
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