WA
Breaking News और ज़रूरी updates — सीधे WhatsApp पर
InnaMax News WhatsApp Channel join करें
Join WhatsApp
StoryLab

नानी का बचपन: खिड़की से कूदकर लौट आने वाली वो छोटी-सी लड़की


कल मैं और मेरी नानी उनके बचपन की बातें कर रहे थे।

उनकी बातें सुनते-सुनते ऐसा लग रहा था जैसे मैं उनके बचपन की उसी दुनिया में पहुँच गई हूँ, जहाँ स्कूल की घंटी से ज्यादा आज़ादी की आवाज़ सुनाई देती थी और छोटी-छोटी शरारतें ही सबसे बड़ी खुशियाँ हुआ करती थीं।


Story at a Glance
एक खिड़की, एक दोस्ती और “मेरे पापा हैं ना…” वाला बचपन
✓ नानी के बचपन की शुरुआत होती है स्कूल की खिड़की से कूदकर खेलने वाली उन शरारतों से, जिनमें पढ़ाई से ज्यादा आज़ादी की खुशी थी।
✓ बचपन की सबसे अच्छी दोस्त अनिता से शादी के बाद संपर्क टूट गया, लेकिन वर्षों बाद WhatsApp ने दोनों सहेलियों को फिर मिला दिया।
✓ हर महीने पापा के नाम जाने वाली चिट्ठियों में नानी की छोटी-बड़ी फरमाइशें भी शामिल होती थीं—एक ऐसी गुप्त साझेदारी, जिसमें चिट्ठी बहाना और प्यार असली वजह था।
✓ जमीन के मामले में पुलिस के सामने खड़ी छोटी-सी नानी की बेबाकी और अपने पापा पर अटूट भरोसा उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू सामने लाता है।
✓ आज स्कूल, दोस्त और पापा भले साथ नहीं हैं, लेकिन उनकी शरारतें, चिट्ठियाँ, दोस्ती और “मेरे पापा हैं ना” वाला भरोसा बताते हैं कि बचपन हमारी यादों में कभी खत्म नहीं होता।

जब स्कूल की खिड़की ही बन गई थी खेलने का रास्ता

नानी बताने लगीं कि जब वे बचपन में स्कूल जाती थीं, तो पढ़ाई से ज्यादा उन्हें बाहर जाकर खेलना पसंद था। उनका स्कूल भी कुछ ऐसा था कि उनकी शरारतों के लिए रास्ता हमेशा खुला रहता था।

वे अपनी क्लास की खिड़की से कूदकर बाहर खेलने चली जाती थीं।

और जब छुट्टी का समय होने वाला होता, तो वापस उसी खिड़की से कूदकर क्लास में आ जाती थीं।

फिर ऐसे बनकर घर लौटती थीं जैसे पूरे समय बड़ी मासूमियत से क्लास में बैठकर पढ़ाई ही कर रही हों।

उनके चेहरे पर बचपन की उस शरारत को याद करके आज भी एक अलग-सी चमक आ जाती है।

शायद उस छोटी-सी लड़की के लिए स्कूल सिर्फ पढ़ने की जगह नहीं था। वहाँ एक खिड़की ऐसी भी थी, जो उसे थोड़ी देर के लिए अपनी दुनिया से बाहर निकलने की आज़ादी देती थी।


एक दोस्त चली गई थी जिंदगी से, लेकिन क्या बचपन भी चला गया था?

फिर उन्होंने अपनी सबसे अच्छी दोस्त का जिक्र किया—अनिता।

अनिता उनकी सिर्फ दोस्त नहीं थीं, बल्कि उनके बचपन का एक खूबसूरत हिस्सा थीं। दोनों की दोस्ती इतनी गहरी थी कि शायद उन्हें उस वक्त अंदाजा भी नहीं था कि जिंदगी उन्हें एक दिन इतनी दूर कर देगी।

फिर नानी की शादी हो गई और अनिता से उनका संपर्क पूरी तरह खत्म हो गया।

साल बीतते गए…

जिंदगी आगे बढ़ती गई…

लेकिन कुछ रिश्ते वक्त के साथ खत्म नहीं होते, बस कहीं यादों के कोने में चुपचाप इंतजार करते रहते हैं।

फिर आया मोबाइल और WhatsApp का जमाना।

जिस दोस्त से कभी कोई संपर्क नहीं था, वही दोस्त अचानक फिर से जिंदगी में लौट आई।

अनिता और नानी फिर से मिल गईं।

जैसे बचपन ने इतने साल बाद दो सहेलियों का हाथ फिर से पकड़ लिया हो।

शायद कुछ दोस्तियाँ ऐसी होती हैं जिन्हें समय खत्म नहीं कर पाता। बस उनके बीच की दूरी बढ़ जाती है।


पापा को चिट्ठी लिखती बच्ची और पिता-बेटी के रिश्ते का प्रतीकात्मक दृश्य
हर चिट्ठी में सिर्फ फरमाइशें नहीं थीं—एक बेटी का अपने पापा पर भरोसा भी छुपा था।

हर चिट्ठी में छुपी होती थी पापा से एक छोटी-सी फरमाइश

बातों-बातों में नानी ने अपने पापा का भी जिक्र किया और अचानक उनकी आवाज़ में एक अलग ही भावुकता आ गई।

नानी अपने पापा के बहुत करीब थीं।

उनके पापा एक कपड़ा मिल में मैनेजर थे और काम की वजह से नानी के साथ नहीं रहते थे। हर महीने नानी की मम्मी उनके पापा को एक चिट्ठी लिखती थीं।

और नानी उस चिट्ठी के साथ अपनी सारी छोटी-बड़ी फरमाइशें भी अपने पापा तक पहुँचा देती थीं।

उन्हें जो चाहिए होता—वो सब उस चिट्ठी में लिखवा देतीं।

और उनके पापा भी उनकी कोई मांग खाली नहीं जाने देते थे। जो नानी चाहतीं, वो उनके लिए भेज दिया करते थे।

लेकिन नानी की मम्मी को लगता था कि ये सारी चीजें उनके पापा ने अपने मन से भेजी हैं।

शायद वो एक पिता और बेटी के बीच की छोटी-सी गुप्त साझेदारी थी…

जिसमें चिट्ठी एक बहाना थी और प्यार असली वजह।

अपने पापा की ये बातें बताते-बताते नानी काफी भावुक हो गईं।

उनकी आँखों में शायद वो छोटा-सा बचपन फिर से लौट आया था।

वो बच्ची, जिसे अपने पापा से अपनी हर छोटी-बड़ी बात कहनी थी।

वो बच्ची, जिसे यकीन था कि उसके पापा उसकी हर इच्छा पूरी कर देंगे।

और शायद इसीलिए आज भी, इतने साल बाद, वो अपने पापा को बहुत याद करती हैं।


जब छोटी-सी लड़की ने पुलिस वालों से कह दिया—“मैं आपसे डरती नहीं हूँ”

लेकिन नानी के बचपन की कहानी सिर्फ शरारतों और भावुक यादों की कहानी नहीं थी।

फिर नानी ने अपनी एक और बात बताई—उनका बचपन से ही स्वभाव काफी बोल्ड था।

एक बार उनकी जमीन को लेकर पुलिस वाले वहाँ आए।

नानी छोटी थीं, लेकिन हिम्मत बिल्कुल बड़ी थी।

उन्होंने पुलिस वालों से साफ कह दिया—

“ये जमीन मेरे पापा की है। आप पुलिस हैं तो क्या हुआ, मैं आपसे डरती नहीं हूँ।”

उनके अंदर अपने पापा के लिए इतना भरोसा था कि उन्हें पता था—अगर कोई बात हुई, तो उनके पापा उनके साथ खड़े होंगे।

उन्होंने ये बात घर के पास रहने वाले एक चाचा के जरिए अपने पापा तक पहुँचा दी।

और फिर उनके पापा आए…

उन्होंने सारी बात संभाली और सब ठीक करवा दिया।

शायद उस दिन नानी को सिर्फ अपनी जमीन नहीं मिली थी।

उन्हें अपने पापा पर अपने भरोसे की एक और वजह मिल गई थी।


माँ की डांट के बीच पापा थे वो जगह, जहाँ डर की कोई जरूरत नहीं थी

नानी की मम्मी थोड़ी सख्त थीं। वे नानी को ज्यादा डांटती थीं और अनुशासन में रखती थीं।

लेकिन पापा…

पापा शायद उनके लिए वो जगह थे जहाँ कोई डांट नहीं थी।

जहाँ उनकी हर फरमाइश सुनी जाती थी।

जहाँ उन्हें लगता था कि चाहे दुनिया कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, उनके पापा उनके साथ हैं।

शायद इसी वजह से उनके पापा सिर्फ उनके पिता नहीं थे।

वे उनके लिए भरोसे का दूसरा नाम थे।


Nisha Singh Anju — story contributor
Story Contributor
Nisha Singh “Anju”

This personal story was shared by Nisha Singh “Anju”, based on a conversation with her grandmother and the childhood memories that emerged from it.


इतने साल बाद भी वो छोटी लड़की कहाँ चली गई?

आज नानी बड़ी हो चुकी हैं।

बचपन बहुत पीछे छूट चुका है।

स्कूल की वो खिड़की शायद अब नहीं है, जिससे वे कूदकर खेलने जाया करती थीं।

अनिता के साथ बिताए वो दिन भी लौटकर नहीं आए।

और उनके पापा भी अब उनके पास नहीं हैं।

लेकिन कुछ चीजें कभी खत्म नहीं होतीं।

एक खिड़की से कूदती हुई छोटी-सी लड़की की शरारत…

एक दोस्त का नाम—अनिता…

हर महीने लिखी जाने वाली वो चिट्ठियाँ…

पापा से की गई वो छोटी-छोटी फरमाइशें…

और वो भरोसा कि—

“मेरे पापा हैं ना…”

शायद बचपन सच में कभी खत्म नहीं होता।

वो बस हमारी यादों में छुप जाता है।

और कभी-कभी किसी शाम, किसी पुराने किस्से के बहाने बाहर आ जाता है…

बिल्कुल वैसे ही जैसे कल नानी की बातों में उनका बचपन फिर से बाहर आ गया था।


पुरानी स्कूल की खिड़की से लौटती बचपन की यादों का प्रतीकात्मक दृश्य
स्कूल की खिड़की शायद पीछे छूट गई, लेकिन उससे जुड़ी यादें आज भी लौट आती हैं।

— StoryLab की और कहानियाँ

WFH Permanent था… फिर एक Monday Morning Call आ गई

नौकरी गई, दोस्ती बची और शुरू हुआ अपना सफर: निशा-प्राची की कहानी

पापा ने अपने लिए नए shoes कभी क्यों नहीं खरीदे? | A Story of Quiet Pride

रात के 2 बजे भी Scrolling क्यों करते रहते हैं? Sleep & Screen Time Psychology

लड़कियां पढ़ाई में आगे, घर में भी ज़िम्मेदार — फिर भी “settle” होने का pressure उन पर ज़्यादा क्यों?


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

⚡ TODAY
👉 BUT WHY...? आपका vision सच में छोटा है? या आपका डर आपके vision से बड़ा हो चुका है? 👉 “छोटा लक्ष्य अपराध है।” — ए.पी.जे. अब्दुल कलाम → आज का सुविचार