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But Why…?

क्यों “समत्वं योग उच्यते” पढ़ना आसान है, लेकिन calm रहना इतना मुश्किल हो जाता है?


BUT WHY…?
जहाँ सवाल सिर्फ़ जवाब नहीं,
सोच भी बदलते हैं।
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आज की पंक्ति
“समत्वं योग उच्यते”
— भगवद्गीता

आज का सवाल
अगर आज कोई आपकी आलोचना करे…

क्या आपकी शांति भी चली जाएगी?

पढ़ना शुरू करने से पहले…
बस आज की एक ऐसी घटना याद कीजिए…

जिसने कुछ ही सेकंड में आपका mood बदल दिया था।

अब देखते हैं…क्या वजह वही थी,या उसका अर्थ जो आपने अपने मन में बना लिया?

शायद आज सुबह भी ऐसा ही हुआ होगा…

सुबह सब कुछ ठीक था।

घर से भी अच्छे mood में निकले।

Office पहुँचते-पहुँचते भी सब सामान्य था।

फिर किसी ने एक बात कह दी…

या किसी ने आपकी मेहनत को notice नहीं किया…

या किसी message का reply नहीं आया…

और पता ही नहीं चला कि कब पूरा दिन बदल गया।

अजीब बात यह है कि घटना छोटी थी…

लेकिन उसका असर बहुत बड़ा हो गया।

यहीं से आज का सवाल शुरू होता है।

अगर हम जानते हैं कि शांत रहना बेहतर है…

अगर हम यह भी जानते हैं कि हर बात पर react करना ज़रूरी नहीं…

तो फिर balance बनाए रखना इतना मुश्किल क्यों हो जाता है?

शायद इसलिए क्योंकि हमारा संघर्ष बाहर की दुनिया से कम…

और अपने भीतर चल रही बातचीत से ज़्यादा होता है।

हम अक्सर मान लेते हैं कि लोगों का व्यवहार हमारे emotions तय करता है।

लेकिन सच यह है कि दो लोग एक ही परिस्थिति में बिल्कुल अलग तरह से react कर सकते हैं।

एक criticism किसी को बेहतर बनने की प्रेरणा देता है…

और वही criticism किसी दूसरे का आत्मविश्वास हिला देता है।

घटना एक ही थी।

फ़र्क सिर्फ़ उसके अर्थ का था।


Same feedback can create different emotional reactions depending on perception
The same feedback can discourage one person and inspire another. Often, it’s not the event—but the meaning we attach to it—that shapes our emotions.

हमारा दिमाग हर घटना को सिर्फ़ देखता नहीं…

उसका मतलब भी बनाता है।

और कई बार वही मतलब हमें बेचैन कर देता है।

यही वजह है कि किसी का एक वाक्य हमें घंटों परेशान करता रहता है…

जबकि उस व्यक्ति ने शायद अगले ही मिनट उसे भूल भी दिया हो।


लेकिन यहाँ एक बात गौर करने वाली है…
अब अपने बारे में सोचिए…

आज अगर कोई आपकी तारीफ़ करे…

तो क्या आपका confidence बढ़ जाएगा?

और अगर वही इंसान शाम तक आपकी आलोचना कर दे…

तो क्या आपका confidence वापस कम हो जाएगा?

अगर जवाब “हाँ” है…

तो शायद हमारी शांति अभी भी हमारे हाथ में नहीं है।

यहीं भगवद्गीता की एक छोटी-सी पंक्ति अचानक बहुत गहरी लगने लगती है।

“समत्वं योग उच्यते।”

अक्सर लोग इसे सिर्फ़ आध्यात्मिक शिक्षा मान लेते हैं।

लेकिन शायद यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का भी एक practical principle है।

समत्व का मतलब यह नहीं कि दुख महसूस मत करो।

यह भी नहीं कि खुशी मत मनाओ।

बल्कि शायद इसका अर्थ इतना भर है…

कि कोई भी भावना कुछ देर के लिए मेहमान बने…

मालिक नहीं।

समस्या emotions नहीं हैं।

समस्या तब शुरू होती है जब हम हर emotion को अपनी पहचान बना लेते हैं।

Promotion नहीं मिली…

मतलब मैं काबिल नहीं हूँ।

Relationship में दिक्कत आई…

मतलब मैं अच्छा इंसान नहीं हूँ।

किसी ने disagree कर दिया…

मतलब मैं गलत हूँ।

धीरे-धीरे घटनाएँ हमारी पहचान तय करने लगती हैं।

और यहीं balance टूटने लगता है।


BUT WHY INSIGHT
हम emotions की वजह से नहीं टूटते।

हम उनसे अपनी पहचान जोड़ लेते हैं।

अंतिम सवाल

कल सुबह जब आप अपना दिन शुरू करें…

और कोई आपकी उम्मीद के अनुसार व्यवहार न करे…

तो क्या आपकी शांति फिर भी आपके साथ रहेगी?


A peaceful pathway symbolizing the choice between reaction and thoughtful response
Life doesn’t always give us control over events. It often gives us a choice in how we respond.

BUT WHY…?
हर जवाब…
एक नया सवाल छोड़ जाता है।

शायद यहीं से सोच बदलनी शुरू होती है।
An Editorial Series by
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शायद आपके मन में भी ये सवाल हों…


क्या calm रहने का मतलब emotions दबाना है?

नहीं। Calm रहने का मतलब emotions को नज़रअंदाज़ करना नहीं, बल्कि उन्हें समझकर प्रतिक्रिया देना है। भावना महसूस करना स्वाभाविक है, लेकिन हर भावना के आधार पर तुरंत निर्णय लेना ज़रूरी नहीं।


क्या हर छोटी बात पर हमारा mood बदलना सामान्य है?

हाँ। ऐसा लगभग हर व्यक्ति के साथ होता है। लेकिन धीरे-धीरे यह समझना ज़रूरी है कि हर घटना हमारी पहचान तय नहीं करती। अक्सर घटना से ज़्यादा उसका अर्थ हमें प्रभावित करता है।


“समत्वं योग उच्यते” का सरल अर्थ क्या है?

सरल शब्दों में इसका अर्थ है—जीवन की परिस्थितियों में संतुलित बने रहना। इसका मतलब भावनाहीन होना नहीं, बल्कि खुशी और कठिनाई दोनों में अपने विवेक को बनाए रखना है।


क्या emotional balance सीखा जा सकता है?

हाँ। यह कोई जन्मजात गुण नहीं है। अपने विचारों को पहचानना, प्रतिक्रिया देने से पहले रुकना और हर परिस्थिति को अपनी पहचान से अलग देखना इस दिशा में छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।


क्या Bhagavad Gita सिर्फ़ धार्मिक ग्रंथ है, या आज की ज़िंदगी में भी उपयोगी है?

बहुत से लोग गीता को आध्यात्मिक ग्रंथ मानते हैं, लेकिन उसके कई विचार रोज़मर्रा के जीवन, निर्णय लेने और भावनात्मक संतुलन को समझने में भी उपयोगी हो सकते हैं। यह लेख उसी दृष्टिकोण से “समत्वं योग उच्यते” की एक व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत करता है।



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