But Why..? हम सबको impress करते हैं… खुद को ignore करते हैं?
हम अक्सर दूसरों को comfortable रखने, impress करने और approval पाने में इतने busy हो जाते हैं कि अपनी real feelings को ही ignore करने लगते हैं। यह “But Why…?” story people pleasing behaviour, emotional silence, और self-disconnection की उस hidden reality को explore करती है जिसे लोग बाहर से “maturity” समझ लेते हैं।
— by Team InnaMaxNews | “But Why…?” Editorial Series
क्यों हम सबको impress करते हैं… लेकिन खुद को सुनना भूल जाते हैं?
“रहिमन निज मन की व्यथा, मन ही राखो गोय…” — रहीम
लेकिन आज problem उलटी हो गई है।
अब लोग अपने मन की व्यथा छुपाते नहीं…
बस उसे खुद से भी avoid करने लगे हैं।
हम सब किसी न किसी level पर perform कर रहे होते हैं।
किसी को “good son” दिखना है।
किसी को “understanding partner।”
किसी को “helpful friend।”
और किसी को बस इतना prove करना है कि
“देखो… मैं problem नहीं हूँ।”
धीरे-धीरे पूरी जिंदगी दूसरों की expectations manage करने में निकल जाती है।
और सबसे dangerous part?
कई बार हमें पता भी नहीं चलता कि हम खुद को ignore कर रहे हैं।
क्योंकि बाहर से सब normal दिख रहा होता है।
हम smile कर रहे होते हैं।
Reply दे रहे होते हैं।
सबकी बात सुन रहे होते हैं।
सबको comfort दे रहे होते हैं।
बस… खुद को छोड़कर।

The exhaustion is real too.
अजीब बात ये है कि लोग अक्सर ऐसे इंसान को “mature” बोलते हैं।
जो हर बात adjust कर ले।
जो कभी loud ना हो।
जो अपनी जरूरतें side में रख दे।
जो हर situation में “चलो कोई बात नहीं” कह दे।
लेकिन अंदर क्या हो रहा होता है…
उसकी बात rarely कोई पूछता है।
कई लोग इतने सालों तक दूसरों को impress करते रहते हैं कि उन्हें खुद की original feelings पहचाननी ही बंद हो जाती हैं।
उन्हें नहीं पता होता कि वो सच में क्या चाहते हैं।
क्यों?
क्योंकि हर decision लेने से पहले उनका दिमाग automatically ये सोचता है:
“लोग क्या सोचेंगे?”
“किसको बुरा लगेगा?”
“अगर मैंने मना किया तो?”
और धीरे-धीरे पूरी personality permission-based बन जाती है।
सच तो ये है कि लोग हमेशा validation के लिए desperate नहीं होते।
कई बार वो rejection से डरे हुए होते हैं।
उन्हें लगता है अगर उन्होंने अपनी real feelings बोल दीं…
तो लोग दूर हो जाएंगे।
इसलिए वो version बन जाते हैं
जो सबको पसंद आए।
Problem ये है कि ऐसा करते-करते इंसान खुद की नजरों में छोटा होने लगता है।
क्योंकि अंदर कहीं ना कहीं उसे पता होता है:
“मैं सच में जैसा हूँ… वैसा दिख ही नहीं रहा।”
और यही जगह सबसे ज्यादा थका देती है।
हर समय emotionally available रहना,
हर किसी को explain करना,
हर जगह खुद को prove करना…
ये kindness नहीं होता हमेशा।
कई बार ये silent fear होता है।
Fear of losing people.
Fear of disappointing others.
Fear of being called selfish.

It comes from never feeling emotionally seen.
लेकिन irony देखो…
जो इंसान सबको खुश रखने की कोशिश करता है,
वही सबसे ज्यादा अकेला महसूस करता है।
क्योंकि उसकी real feelings कहीं दिखाई ही नहीं देतीं।
शायद इसलिए रहीम ने “मन की व्यथा” को quietly रखने की बात कही थी।
हर दर्द दुनिया को बताना जरूरी नहीं।
लेकिन खुद से छुपाना भी dangerous है।
क्योंकि जिस दिन इंसान खुद को सुनना बंद कर देता है…
उस दिन बाहर की सारी आवाजें अंदर की आवाज से ज्यादा important लगने लगती हैं।
और फिर decisions दिल से नहीं,
approval से होने लगते हैं।
शायद healing की शुरुआत यहीं से होती है।
जब इंसान पहली बार बिना guilt के “ना” बोलता है।
जब वो हर किसी को explain करना बंद करता है।
जब वो ये समझता है कि हर relationship sacrifice test नहीं होता।

Especially the ones we avoid having with ourselves.
और सबसे important…
जब वो खुद से ये पूछना शुरू करता है:
“मैं सच में क्या feel कर रहा हूँ?”
क्योंकि दुनिया को impress करते-करते अगर इंसान खुद से disconnect हो जाए…
तो बाहर की सारी appreciation भी अंदर खाली ही लगती है।
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