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रविवार की दाल — एक स्वाद, एक याद, एक कहानी

रविवार की दाल ~ Story Lab

रविवार को घर में दाल पापा बनाते थे।

हमेशा से।

कोई नहीं जानता था कब यह tradition शुरू हुई। बस थी।
जैसे रविवार होता था — वैसे पापा की दाल होती थी।

तड़का अलग होता था उनका।
थोड़ी ज़्यादा हींग। थोड़ा ज़्यादा घी।
और एक चीज़ जो Rohan ने कभी measure नहीं देखी —
पापा बस डालते थे, और सही हो जाता था।

“आपको कैसे पता कितना डालना है?”

पापा हँसते थे।
“पता नहीं। हाथ जानता है।”

पापा नहीं रहे — दो साल हो गए।

पहले रविवार को मां ने दाल नहीं बनाई।
कुछ और बना दिया।

दूसरे रविवार को भी।

Rohan ने पूछा नहीं।

तीसरे रविवार को Rohan खुद kitchen में गया।

उसने recipe याद करने की कोशिश की।

मसूर की दाल। प्याज़। टमाटर। हल्दी। नमक।
तड़के में जीरा, हींग, लाल मिर्च।

और घी।

पापा हमेशा घी डालते थे। ज़्यादा।
मां कहती थीं “बहुत ज़्यादा है” —
पापा कहते थे — “दाल में कंजूसी नहीं।”

Rohan ने घी का डिब्बा उठाया।

थोड़ा रुका।

फिर डाला। ज़्यादा।

दाल बनी।

मां को बुलाया।

मां ने चखा।

चुप रहीं।

“कैसी है?”

मां ने कहा —
“नमक थोड़ा कम है।”

बस।

खाना खाने बैठे।
दोनों चुप। दाल खाते रहे।

खाने के बाद Rohan ने plates उठाईं।

Kitchen में जाते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा।

मां खिड़की के पास बैठी थीं।
बाहर देख रही थीं।

आँखें भरी हुई थीं।


Empty chair near a window in a quiet home with soft light
कुछ जगहें खाली नहीं होतीं — महसूस होती हैं।

Rohan वापस नहीं गया।

Plates धोता रहा।

कुछ moments होते हैं
जो witness करने के लिए होते हैं — interrupt करने के लिए नहीं।

अगले रविवार Rohan फिर kitchen में गया।

इस बार नमक थोड़ा ज़्यादा डाला।

मां ने चखा।

“ठीक है।”

Rohan ने देखा —
मां ने दो रोटी खाईं उस दिन।
पहले रविवार से ज़्यादा।

कुछ लोग चले जाते हैं।

लेकिन रविवार को दाल बनती रहती है।

नमक कम होता है। कभी ज़्यादा।

लेकिन घी —
वो कभी कम नहीं होता।

“दाल में कंजूसी नहीं।”


Used kadhai with leftover dal symbolizing lasting family traditions

आपके घर में भी कोई ऐसी tradition है जो किसी की याद में जीवित है? आज उसे जियो।


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