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हर शुक्रवार वह उसी seat पर मिलती थी… लेकिन टिकट कभी नहीं था


“तुम आज भी उसी सीट पर बैठते हो?”

लड़की ने मुस्कुराते हुए पूछा।

आर्यन ने खिड़की वाली सीट से नज़र हटाई।

“हाँ… आदत है।”

वह हर शुक्रवार दिल्ली से अपने गाँव जाने वाली ट्रेन में यही सीट बुक करता था।

पिछले छह महीने से…

और हर बार वही लड़की सामने वाली सीट पर मिलती थी।

ना कभी नाम पूछा…

ना नंबर।

बस चार घंटे की बातें।

कभी बचपन…

कभी नौकरी…

कभी सपने…

और स्टेशन आते ही…

“चलो, फिर अगले शुक्रवार।”

बस इतना कहकर दोनों अलग हो जाते।

एक दिन आर्यन हिम्मत करके बोला,

“अगले हफ्ते कॉफी?”

लड़की मुस्कुराई।

“अगर किस्मत ने चाहा… तो ज़रूर।”

अगले शुक्रवार…

वह नहीं आई।

आर्यन ने सोचा शायद काम होगा।

फिर दूसरा शुक्रवार…

फिर तीसरा…

सीट खाली रही।

आख़िर उसने टीटीई से पूछा,

“सर… सामने वाली सीट पर जो लड़की आती थी, उसका टिकट नहीं है क्या?”

टीटीई कुछ पल उसे देखता रहा।

“बेटा… उस सीट पर पिछले तीन महीने से किसी ने बुकिंग ही नहीं कराई।”

आर्यन हँस पड़ा।

“सर, मज़ाक मत कीजिए।”

टीटीई ने मोबाइल निकालकर बुकिंग लिस्ट दिखाई।

सामने वाली सीट…

हर शुक्रवार खाली थी।

आर्यन का दिल बैठ गया।

उसने मोबाइल खोला।

उसे याद आया…

उन्होंने कभी सेल्फी नहीं ली।

कोई फोटो नहीं।

कोई चैट नहीं।

कोई नंबर नहीं।

सिर्फ़ यादें।

उसी शाम वह गाँव पहुँचा।

दादी से यूँ ही पूरी बात बताई।

दादी अचानक चुप हो गईं।

उन्होंने पुराना एल्बम निकाला।

एक फोटो उसके सामने रखी।

आर्यन के हाथ काँप गए।

फोटो में वही लड़की थी।

बिल्कुल वैसी ही मुस्कान।

“ये कौन है?”

दादी ने धीरे से कहा…

“तेरे पापा की बचपन की दोस्त।

शादी से एक हफ्ते पहले…

इसी ट्रेन में हादसे में उसकी मौत हो गई थी।”

आर्यन ने फोटो पलटी।

पीछे एक लाइन लिखी थी—

“कुछ लोग मंज़िल नहीं बनते… सफ़र को खूबसूरत बना जाते हैं।”

उसके बाद से…

आर्यन आज भी हर शुक्रवार वही सीट बुक करता है।

फ़र्क बस इतना है…

अब सामने वाली सीट सच में खाली होती है।


— समाप्त —

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