पिता के पुराने डिब्बे में जो लिखा था… उसे पढ़कर बेटा टूट गया
“पापा… इस बार मेरा मैच देखने ज़रूर आना।”
आठ साल के ईशान ने स्कूल जाते-जाते कहा।
पिता मुस्कुराए।
“इस बार नहीं छूटेगा।”
लेकिन…
ऑफिस की मीटिंग थी।
मैच का समय निकल गया।
शाम को घर लौटे तो ईशान सो चुका था।
टेबल पर एक छोटा-सा मेडल रखा था।
उसके नीचे एक पर्ची।
“कोई बात नहीं पापा… अगली बार।”
उस दिन के बाद…
हर मैच में पापा पहुँचे।
हर स्पोर्ट्स डे।
हर प्राइज़ डे।
हर पैरेंट्स मीटिंग।
कभी देर नहीं की।
लेकिन…
ईशान बड़ा हो गया।
कॉलेज…
नौकरी…
फिर विदेश।
घर अब पहले जैसा नहीं रहा।
एक दिन फोन आया।
“पापा…
इस बार शायद दिवाली पर नहीं आ पाऊँगा।”
पिता बस इतना बोले—
“कोई बात नहीं बेटा…
अगली बार।”
कुछ महीने बाद…
ईशान भारत लौटा।
घर के बाहर बहुत लोग खड़े थे।
अंदर…
पिता की तस्वीर पर माला चढ़ी थी।
माँ ने काँपते हाथों से एक पुराना डिब्बा उसके हाथ में दिया।
उसमें…
ईशान के बचपन के सारे मेडल थे।
सबके पीछे…
पिता ने एक ही तारीख़ के साथ एक ही बात लिखी थी—
“आज भी मुझे उस पहली बार का इंतज़ार है… जब मैं समय पर पहुँच पाता।”
ईशान वहीं बैठ गया।
उसने पहली बार समझा…
कुछ लोग देर से नहीं पहुँचते…
हम देर से समझते हैं…
— समाप्त —
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