दो कुल्हड़ चाय… लेकिन दूसरा दोस्त कभी लौटकर नहीं आया
“भाई… अगर मैं पहले पहुँच गया, तो तेरे लिए सीट रोककर रखूँगा।”
कॉलेज के आख़िरी दिन रोहन ने हँसते हुए कहा।
अमन ने भी हँसकर हाथ मिला लिया।
“और अगर मैं पहले पहुँचा… तो चाय मेरी तरफ़ से।”
फिर ज़िंदगी शुरू हो गई।
एक बेंगलुरु चला गया…
दूसरा गाँव लौटकर परिवार का काम संभालने लगा।
शुरू-शुरू में रोज़ बातें होती थीं।
फिर हफ़्ते में…
फिर महीने में…
और धीरे-धीरे…
सिर्फ़ “Happy Birthday, Bro.”
एक दिन अमन का फोन बजा।
रोहन था।
“भाई… इस रविवार मिलते हैं?”
अमन मुस्कुराया।
“पक्का। इस बार कोई बहाना नहीं।”
लेकिन रविवार आने से पहले…
रोहन का एक्सीडेंट हो गया।
अमन अस्पताल पहुँचा…
बहुत देर हो चुकी थी।
कुछ महीने बाद…
अमन पहली बार अकेला उनकी पसंद वाली चाय की दुकान पर गया।
वही पुरानी बेंच।
वही दो कुल्हड़।
आदत से मजबूर…
उसने दो चाय ऑर्डर कर दी।
चाय वाला मुस्कुराया।
“साहब… आज भी दो?”
अमन ने खाली बेंच की तरफ देखा।
धीरे से बोला—
“हाँ…
एक दोस्त कभी जाता नहीं…
बस दिखाई देना बंद हो जाता है।”
उस दिन पहली बार…
अमन ने दूसरी चाय खुद नहीं पी।
वह वैसे ही ठंडी होने दी।
जैसे कुछ रिश्ते…
वक़्त के साथ नहीं…
यादों के साथ जीते रहते हैं।
— समाप्त —
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