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Why It Matters

School में डंडा नहीं चलता, घर में mobile नहीं रुकता — फिर बच्चों का गुस्सा कहाँ जाए?


जब एक सवाल बार-बार सुनाई देने लगा…

“अब बच्चे पहले जैसे नहीं रहे।”

पिछले कुछ दिनों में InnaMax News ने अलग-अलग स्कूलों के शिक्षकों से बच्चों के बदलते व्यवहार पर बातचीत की।

स्कूल अलग थे।

कक्षाएँ अलग थीं।

अनुभव भी अलग-अलग थे।

लेकिन लगभग हर बातचीत एक ही चिंता पर आकर ठहर गई।

किसी ने classroom की घटनाएँ साझा कीं।

किसी ने parents के बदलते व्यवहार की बात की।

किसी ने mobile screen को सबसे बड़ा बदलाव बताया।

और एक शिक्षक ने धीमी आवाज़ में कहा—

“बच्चे बदल गए हैं… या शायद उनका बचपन बदल गया है।”

यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आया—

आख़िर बच्चों में गुस्सा पहले से ज़्यादा क्यों दिखाई दे रहा है?

शिक्षकों के अनुभव इस सवाल की शुरुआत थे।

लेकिन उसके जवाब की तलाश अभी बाकी थी।


Story At A Glance

  • अलग-अलग स्कूलों के शिक्षकों ने बच्चों में बढ़ते गुस्से और अधीरता पर चिंता जताई।
  • एक Principal के अनुसार अकेलापन, Screen Time और बदलती Parenting इसके संभावित कारण हो सकते हैं।
  • बच्चे सिर्फ बातें नहीं, बल्कि बड़ों का व्यवहार और आदतें भी सीखते हैं।
  • समाधान डांट या सज़ा नहीं, बल्कि संवाद, Quality Time और Physical Activity में छिपा है।

— By Jai Mehta | InnaMax News


अगर सज़ा नहीं, तो अनुशासन कैसे बने?

बातचीत की शुरुआत punishment से नहीं हुई थी।

लेकिन लगभग हर शिक्षक किसी न किसी तरह उसी सवाल तक पहुँच गया।

आज शिक्षक बच्चे को डांटने से पहले कई बार सोचता है।

वजह सिर्फ नियम नहीं हैं।

यह चिंता भी है कि कहीं बात गलत दिशा में न चली जाए।

लगभग सभी शिक्षकों की राय एक बात पर साफ़ थी—

शारीरिक सज़ा किसी भी स्थिति में समाधान नहीं हो सकती।

लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू हुआ।

अगर सज़ा नहीं…

तो बच्चों को यह कैसे समझाया जाए कि हर व्यवहार का एक परिणाम भी होता है?

इसी दौरान एक शिक्षिका ने मुस्कुराते हुए कहा—

“डर हटाना ज़रूरी था… लेकिन उसकी जगह हमने क्या दिया?”

कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

क्योंकि यह सवाल सिर्फ स्कूल का नहीं था।

यह घर तक जाता था।

और शायद आज की parenting तक भी।


Indian teacher addressing distracted students in a classroom during a lesson
Modern classrooms increasingly face the challenge of emotional disengagement, not just discipline.

Mobile वो Teacher बन गया जिसे किसी ने नहीं बुलाया

बातचीत जैसे-जैसे आगे बढ़ी, लगभग हर रास्ता एक ही जगह आकर रुकता दिखा—

Screen।

किसी ने Reels का ज़िक्र किया।

किसी ने Gaming का।

किसी ने Online Videos का।

एक शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा—

“पहले बच्चे स्कूल से निकलते ही मैदान ढूंढते थे। अब charging point ढूंढते हैं।”

कमरे में हल्की हँसी ज़रूर गूंजी, लेकिन उसके पीछे चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।

शिक्षकों का कहना था कि आज बच्चों की दिनचर्या पहले जैसी नहीं रही।

Outdoor खेल कम हुए हैं।

शारीरिक गतिविधियाँ घटी हैं।

दोस्तों के साथ बिताया समय भी कई बार screen के पीछे सिमट गया है।

एक शिक्षक ने अपनी बात बेहद सरल शब्दों में कही—

“आज सबसे ज़्यादा active अगर कुछ है, तो बच्चों के अंगूठे हैं।”

लेकिन क्या कहानी सिर्फ mobile तक सीमित है?

इसी सवाल को बेहतर ढंग से समझने के लिए InnaMax News ने Sahibabad स्थित Saraswati Shishu Mandir की Principal Mrs. Sheetal Singhal से भी बातचीत की।

उनका मानना है कि screen समस्या का अकेला कारण नहीं है, लेकिन यह बच्चों के जीवन में पहले से कहीं बड़ी जगह ज़रूर बना चुकी है।

उनके अनुसार, जब बच्चों को परिवार के साथ पर्याप्त समय नहीं मिलता या वे लंबे समय तक अकेले रहते हैं, तो कई बार mobile केवल एक device नहीं, बल्कि एक साथी जैसा महसूस होने लगता है।

बच्चे अपनी पसंद की videos देखते हैं।

Games खेलते हैं।

AI से सवाल पूछते हैं।

और कई बार उन्हें ऐसा लगता है कि screen हमेशा उनकी बात सुनने के लिए मौजूद है।

यही वजह है कि screen से दूरी बनाना कई बच्चों के लिए सिर्फ device छोड़ना नहीं, बल्कि एक आदत और भावनात्मक जुड़ाव से बाहर निकलना भी होता है।

इसका मतलब यह नहीं कि mobile ही हर समस्या की जड़ है।

लेकिन शिक्षकों के अनुभव और विशेषज्ञों की राय एक बात पर ज़रूर मिलती है—

अगर Screen Time बढ़ता जाए और Physical World से जुड़ाव लगातार कम होता जाए, तो उसका असर बच्चों के व्यवहार पर दिखाई देना स्वाभाविक है।


Indian child using a smartphone indoors while children play outside through a window
One child indoors, an entire playground outside.

क्या बच्चे वही सीख रहे हैं जो हम उन्हें दिखा रहे हैं?

यहीं बातचीत ने एक अलग मोड़ लिया।

एक शिक्षिका ने कहा कि बच्चे सिर्फ हमारी बातें नहीं सुनते।

वे हमें देखते भी हैं।

अगर घर में हर खाली मिनट mobile पर बीत रहा हो…

अगर dinner table पर बातचीत की जगह screens हों…

अगर बड़े खुद बार-बार notifications देखने से खुद को न रोक पाएं…

तो बच्चों से अलग व्यवहार की उम्मीद करना आसान नहीं होता।

एक शिक्षक ने कहा—

“बच्चे instructions कम और examples ज़्यादा follow करते हैं।”

इस बात पर कई शिक्षकों ने सहमति जताई।

बातचीत के दौरान कुछ शिक्षकों ने यह भी बताया कि आज छोटे बच्चे कई बार ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाने लगे हैं, जो उनकी उम्र से मेल नहीं खाते।

किसी ने social media को वजह माना।

किसी ने television content को।

लेकिन लगभग सभी इस बात पर सहमत थे कि असली चुनौती किसी एक platform की नहीं, बल्कि बिना निगरानी के content consumption की है।

यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बच्चा क्या देख रहा है

सवाल यह भी है कि कोई देख भी रहा है या नहीं।

इसी संदर्भ में Saraswati Shishu Mandir, Sahibabad की Principal Mrs. Sheetal Singhal का मानना है कि बच्चे केवल स्क्रीन पर दिखने वाली चीज़ों से ही नहीं, बल्कि घर के माहौल से भी सीखते हैं।

उनके अनुसार अगर Parents किसी व्यवहार को पहले स्वीकार करते रहें और बाद में अचानक उसी बात पर रोक लगाने लगें, तो बच्चे अक्सर उलझन में पड़ जाते हैं। उनके लिए नियम नहीं, बल्कि बड़ों का बदलता व्यवहार ज़्यादा दिखाई देता है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई बार cartoons और digital characters बच्चों की भाषा, कल्पना और व्यवहार को प्रभावित करते हैं। अगर बच्चा लगातार ऐसी दुनिया देखता है जहाँ हर समस्या का हल कोई robot या virtual character निकाल देता है, तो वह वास्तविक जीवन से भी वैसी ही अपेक्षाएँ बनाने लग सकता है।


Indian family sitting together at dinner while each uses a smartphone
Together physically, separated digitally.

क्या बच्चों को दोष देना सबसे आसान रास्ता है?

जब बातचीत इस सवाल तक पहुँची कि बच्चों का व्यवहार आखिर बदल क्यों रहा है, तो एक बात लगभग हर शिक्षक ने दोहराई—

बच्चों को दोष देना सबसे आसान जवाब हो सकता है, लेकिन शायद सबसे सही जवाब नहीं।

एक शिक्षक ने कहा—

“बच्चे गलती कैसे कर सकते हैं? वे तो वही सीखते हैं जो हम उन्हें दिखाते हैं।”

इस एक वाक्य ने पूरी चर्चा का रुख बदल दिया।

बात बच्चों से निकलकर बड़ों तक पहुँच गई।

कई शिक्षकों का मानना था कि आज Parents पर पहले से कहीं ज़्यादा आर्थिक और पेशेवर दबाव है। दोनों कामकाजी हों, तो बच्चों के साथ बैठकर बात करने का समय और भी कम हो जाता है।

ऐसी स्थिति में कई घरों में mobile एक तरह का “temporary babysitter” बन जाता है।

कुछ देर के लिए बच्चा व्यस्त रहता है।

घर का काम भी हो जाता है।

लेकिन सवाल यह है—

क्या सुविधा धीरे-धीरे आदत बनती जा रही है?

श्रीमती शीतल सिंघल का भी मानना है कि बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी gadget का विकल्प नहीं हो सकता। उनके अनुसार, बच्चे सलाह से कम और साझा अनुभवों से ज़्यादा सीखते हैं। इसलिए Parents वही करें, जिसकी उम्मीद वे अपने बच्चों से करते हैं।


तीन बातें जो इस पूरी पड़ताल में सबसे स्पष्ट होकर सामने आईं

शिक्षकों से हुई बातचीत और बाद में शिक्षा विशेषज्ञों से मिले इनपुट के बाद तीन बातें बार-बार उभरकर सामने आईं।


1. बच्चों को समय की नहीं, Quality Time की कमी महसूस हो रही है

पहले शाम का एक हिस्सा अक्सर परिवार के नाम होता था।

आज वही समय traffic, office calls, coaching और screens के बीच बँट जाता है।

एक शिक्षक ने कहा—

“बच्चों को महंगे gadgets से ज़्यादा किसी के साथ बैठकर आधा घंटा चाहिए।”

इस बात से कई शिक्षकों ने सहमति जताई।

Mrs. Sheetal Singhal का भी मानना है कि बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी digital device का विकल्प नहीं हो सकता। उनके अनुसार, बच्चों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसी ऐसे व्यक्ति की होती है जो उन्हें बिना जल्दी किए सुने।


2. अनुशासन डर से नहीं, निरंतरता से बनता है

रिपोर्टिंग के दौरान एक बात बार-बार सामने आई—

अनुशासन का मतलब डर नहीं होता।

बच्चों को यह समझना ज़रूरी है कि हर व्यवहार का एक परिणाम होता है।

लेकिन वह परिणाम हमेशा डांट या सज़ा ही हो, यह ज़रूरी नहीं।

कई शिक्षकों का मानना था कि स्पष्ट नियम, लगातार एक जैसा व्यवहार और संवाद कई बार सज़ा से कहीं अधिक प्रभाव छोड़ते हैं।

श्रीमती शीतल सिंघल के अनुसार भी Parenting में सबसे बड़ी चुनौती Consistency की है। अगर किसी व्यवहार को पहले स्वीकार किया जाए और बाद में अचानक उसी बात पर रोका जाए, तो बच्चा अक्सर नियम नहीं, बल्कि विरोधाभास देखता है।


3. घर और स्कूल एक-दूसरे के विकल्प नहीं बन सकते

एक शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अगर घर में ‘हाँ’ और स्कूल में ‘ना’ होगी, तो बच्चा सबसे आसान रास्ता चुनेगा।”

शायद यही इस पूरी रिपोर्ट का सबसे व्यावहारिक निष्कर्ष भी है।

शिक्षकों का मानना है कि बच्चों के सामने Parents और Teachers का एक-दूसरे का सम्मान करना, समान अपेक्षाएँ रखना और नियमित संवाद बनाए रखना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

श्रीमती शीतल सिंघल का कहना है कि बच्चों का भावनात्मक विकास तभी बेहतर हो सकता है, जब घर और स्कूल दोनों उन्हें एक जैसा संदेश दें—डांट से पहले संवाद और आदेश से पहले उदाहरण।


Happy Indian children playing football in a muddy playground under afternoon sunlight
Joy needs space more than screens.

अगर शुरुआत करनी हो, तो कहाँ से करें?

इस सवाल का कोई एक आसान जवाब नहीं है।

शायद इसलिए क्योंकि समस्या भी किसी एक वजह से पैदा नहीं हुई।

अलग-अलग शिक्षकों के अनुभव और बाद में हुई विशेषज्ञ बातचीत से कुछ ऐसी बातें ज़रूर सामने आईं, जिन पर परिवार आज से ही काम शुरू कर सकते हैं।


Screen से पहले रिश्तों को समय दीजिए

घर में ऐसा एक समय तय कीजिए, जब पूरा परिवार बिना Mobile के साथ बैठे।

यह समय एक घंटा हो, ऐसा ज़रूरी नहीं।

रोज़ के 20–30 मिनट भी बच्चों को यह एहसास दिला सकते हैं कि उनकी बातें सुनने वाला कोई है।

श्रीमती शीतल सिंघल का मानना है कि बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी digital entertainment का विकल्प नहीं हो सकता।


बच्चों को सिर्फ व्यस्त नहीं, सक्रिय भी रखिए

मिट्टी में खेलना…

दौड़ना…

साइकिल चलाना…

हारना…

दोस्तों से झगड़ना और फिर मान जाना…

ये सिर्फ खेल नहीं हैं।

यहीं से बच्चे अपनी भावनाओं को संभालना, हार स्वीकार करना, धैर्य रखना और दूसरों के साथ मिलकर चलना सीखते हैं।

श्रीमती सिंघल के अनुसार बच्चों को Creative Activities और Physical Activities से जोड़ना उनके मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए भी उतना ही ज़रूरी है, जितना पढ़ाई।


“तुम गलत हो” कहने से पहले “क्या हुआ?” पूछिए

एक शिक्षक ने बातचीत के दौरान बहुत छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बात कही—

“हर गुस्से के पीछे बदतमीज़ी नहीं होती। कभी-कभी वहाँ कोई अनकही परेशानी भी होती है।”

शायद यही सवाल—“क्या हुआ?”—कई बहसों को शुरू होने से पहले ही खत्म कर सकता है।

श्रीमती शीतल सिंघल का भी मानना है कि बच्चों को सिर्फ डांटना नहीं, समझाना ज़्यादा ज़रूरी है। वे वही व्यवहार सीखते हैं, जिसे वे अपने आसपास होते हुए देखते हैं।

इसलिए शायद Parenting का सबसे असरदार नियम आज भी वही है—

बच्चों से वही उम्मीद रखिए, जिसे निभाने के लिए बड़े खुद भी तैयार हों।


शायद बच्चों को सलाह नहीं, समय ज़्यादा चाहिए

गोलमेज़ चर्चा खत्म हो चुकी थी।

लोग अपनी-अपनी बात कह चुके थे।

लेकिन जाते-जाते भी कोई यह दावा नहीं कर रहा था कि उसके पास इस समस्या का पूरा समाधान है।

शायद इसलिए क्योंकि बच्चों में बढ़ते गुस्से का सवाल सिर्फ स्कूल का नहीं है।

यह घर का भी है।

समाज का भी है।

और उस समय का भी है, जो आज हर किसी के पास सबसे कम बचा है।

हो सकता है आने वाले वर्षों में technology और बदल जाए।

पढ़ाई का तरीका भी बदल जाए।

लेकिन शायद एक चीज़ नहीं बदलेगी—

बच्चों को अब भी सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसी app की नहीं, किसी अपने के समय की होगी।


Empty wooden school bench beside a quiet playground at sunset with a chalk sun drawing
An empty playground can say more than words.

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Q1. क्या हर गुस्सा किसी बड़ी समस्या का संकेत होता है?

ज़रूरी नहीं। छोटे बच्चों में गुस्सा कई बार थकान, भूख, निराशा, अपनी बात न समझा पाने या भावनाओं को व्यक्त करने में कठिनाई की वजह से भी आ सकता है। लेकिन अगर गुस्सा लगातार बढ़ रहा हो, हिंसक व्यवहार में बदल रहा हो या रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित करने लगे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित हो सकता है.


Q2. क्या Screen Time पूरी तरह बंद कर देना चाहिए?

नहीं। आज की पढ़ाई और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में Screen का इस्तेमाल पूरी तरह टालना संभव नहीं है। ज़रूरी यह है कि Screen Time के साथ Outdoor Play, पर्याप्त नींद, Creative Activities और परिवार के साथ समय भी संतुलित रहे।


Q3. क्या संयुक्त परिवार न होने से बच्चों पर असर पड़ता है?

हर Nuclear Family में समस्या हो, ऐसा नहीं है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों को नियमित भावनात्मक संवाद, भरोसेमंद रिश्ते और साथ बिताया गया समय ज़रूरी होता है। अगर संयुक्त परिवार नहीं है, तब भी Parents यह माहौल अपने व्यवहार और दिनचर्या से बना सकते हैं।


Q4. बच्चों का गुस्सा कम करने की शुरुआत आज से कैसे की जा सकती है?

छोटे बदलाव अक्सर बड़ा असर छोड़ते हैं। रोज़ कुछ समय बिना Mobile के साथ बैठना, बच्चों की बात ध्यान से सुनना, Outdoor Activities को बढ़ावा देना और डांटने से पहले कारण समझने की कोशिश करना अच्छी शुरुआत हो सकती है।


Q2. क्या बच्चों का screen time तय होना चाहिए?

हर बच्चे के लिए एक जैसा समय तय नहीं किया जा सकता। उम्र, पढ़ाई और दिनचर्या के अनुसार संतुलन ज़रूरी है। विशेषज्ञ आमतौर पर सलाह देते हैं कि screen time के साथ पर्याप्त शारीरिक गतिविधि, नींद और परिवार के साथ समय भी होना चाहिए।


Q3. अगर बच्चा गुस्से में जवाब देने लगे, तो parents क्या करें?

तुरंत गुस्से में प्रतिक्रिया देने की बजाय पहले बच्चे को शांत होने का समय दें। बाद में उससे यह समझने की कोशिश करें कि उसे गुस्सा क्यों आया। बातचीत अक्सर टकराव से बेहतर नतीजे देती है।


Q4. School और parents मिलकर बच्चों की कैसे मदद कर सकते हैं?

अगर दोनों पक्ष नियमित संवाद रखें, एक जैसे नियम अपनाएं और बच्चे के सामने एक-दूसरे का सम्मान करें, तो बच्चे के लिए सही और गलत को समझना आसान हो जाता है। घर और स्कूल का सहयोग अनुशासन बनाने में अहम भूमिका निभाता है.


How We Reported This Story

This report is based on independent conversations with teachers from different schools over several days to understand classroom observations. To better understand the possible causes and practical remedies behind changing behaviour among children, InnaMax News also held an editorial interaction with Mrs. Sheetal Singhal, Principal, Saraswati Shishu Mandir, Sahibabad, Ghaziabad. The article is an editorial synthesis of these conversations.


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