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Why It Matters

School में डंडा नहीं चलता, घर में mobile नहीं रुकता — फिर बच्चों का गुस्सा कहाँ जाए?


क्या बच्चे सचमुच बदल गए हैं, या उनका बचपन? InnaMax News ने अलग-अलग शिक्षकों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि बच्चों में बढ़ता गुस्सा, Screen Time और बदलती Parenting आज के बचपन को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं।

Why It Matters | InnaMax News Editorial Desk


जब एक सवाल बार-बार सुनाई देने लगा…

“अब बच्चे पहले जैसे नहीं रहे।”

पिछले कुछ दिनों में InnaMax News ने बच्चों के बदलते व्यवहार को समझने के लिए Aasara Foundation में बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं Ritu Kumari, Anju Mehra और Geeta Mishra से बातचीत की। बातचीत में बार-बार उठ रहे सवालों को व्यापक संदर्भ में समझने के लिए बाद में Saraswati Shishu Mandir, Sahibabad की Principal Mrs. Sheetal Singhal से भी बात की गई।

स्कूल अलग थे।

बच्चे अलग थे।

अनुभव भी अलग-अलग थे।

लेकिन एक बात लगभग हर बातचीत में लौटकर आई।

किसी ने classroom में बढ़ती अधीरता की बात की।

किसी ने parents के बदलते व्यवहार की।

तो किसी ने mobile screen को बदलते बचपन की सबसे साफ़ तस्वीर बताया।

इन्हीं बातचीत के दौरान एक शिक्षिका ने धीमी आवाज़ में कहा—

“बच्चे बदल गए हैं… या शायद उनका बचपन बदल गया है।”

वहीं एक सवाल बार-बार मन में आता रहा—

आख़िर बच्चों में गुस्सा पहले से ज़्यादा क्यों दिखाई दे रहा है?

जवाब शायद किसी एक classroom में नहीं मिलने वाला था।

क्योंकि बात सिर्फ स्कूल की नहीं थी। उसके धागे घर, parenting और बदलती digital दुनिया तक फैले हुए थे।


Story At A Glance

  • अलग-अलग स्कूलों के शिक्षकों ने बच्चों में बढ़ते गुस्से और अधीरता पर चिंता जताई।
  • एक Principal के अनुसार अकेलापन, Screen Time और बदलती Parenting इसके संभावित कारण हो सकते हैं।
  • बच्चे सिर्फ बातें नहीं, बल्कि बड़ों का व्यवहार और आदतें भी सीखते हैं।
  • समाधान डांट या सज़ा नहीं, बल्कि संवाद, Quality Time और Physical Activity में छिपा है।

अगर सज़ा नहीं, तो अनुशासन कैसे बने?

दिलचस्प बात यह रही कि अलग-अलग बातचीत में भी अनुशासन का सवाल बार-बार सामने आया।

आज कई शिक्षक किसी बच्चे को डांटने से पहले कई बार सोचते हैं। वजह सिर्फ बदलते नियम नहीं हैं। यह चिंता भी रहती है कि कहीं समझाने की कोशिश किसी शिकायत या गलतफहमी में न बदल जाए।

फिर भी एक बात लगभग हर बातचीत में सुनाई दी—

शारीरिक सज़ा किसी भी स्थिति में समाधान नहीं हो सकती।

इसके बाद सवाल अपने-आप सामने आ जाता है—

अगर सज़ा नहीं… तो बच्चों को यह कैसे समझाया जाए कि हर व्यवहार का एक परिणाम भी होता है?

इसी संदर्भ में शिक्षिका Ritu Kumari मुस्कुराते हुए पूछती हैं—

“डर हटाना ज़रूरी था… लेकिन उसकी जगह हमने क्या दिया?”

यह सवाल सिर्फ स्कूलों का नहीं है।

उसका जवाब शायद घर से शुरू होता है।


Indian teacher addressing distracted students in a classroom during a lesson
Modern classrooms increasingly face the challenge of emotional disengagement, not just discipline.

Mobile वो Teacher बन गया जिसे किसी ने नहीं बुलाया

अलग-अलग बातचीत में एक बात बार-बार सामने आई—

Screen।

किसी ने Reels का ज़िक्र किया।

किसी ने Gaming का।

तो किसी ने Online Videos का।

इसी दौरान शिक्षिका Anju Mehra मुस्कुराते हुए कहती हैं—

“पहले बच्चे स्कूल से निकलते ही मैदान ढूंढते थे। अब charging point ढूंढते हैं।”

शिक्षकों का कहना था कि आज बच्चों की दिनचर्या पहले जैसी नहीं रही।

Outdoor खेल कम हुए हैं।

शारीरिक गतिविधियाँ घटी हैं।

दोस्तों के साथ बिताया समय भी कई बार screen के पीछे सिमट गया है।

थोड़ी देर बाद Anju Mehra एक और बात जोड़ती हैं—

“आज सबसे ज़्यादा active अगर कुछ है, तो बच्चों के अंगूठे हैं।”

लेकिन क्या पूरी कहानी सिर्फ mobile तक सीमित है?

इसी सवाल को आगे बढ़ाते हुए Saraswati Shishu Mandir, Sahibabad की Principal Mrs. Sheetal Singhal कहती हैं कि screen अकेली वजह नहीं है, लेकिन बच्चों की ज़िंदगी में उसकी जगह पहले से कहीं बड़ी हो चुकी है।

जब बच्चों को परिवार के साथ पर्याप्त समय नहीं मिलता, तो कई बार mobile सिर्फ एक device नहीं रह जाता।

बच्चे उस पर videos देखते हैं।

Games खेलते हैं।

AI से सवाल पूछते हैं।

और धीरे-धीरे उसे अपना साथी मानने लगते हैं।

ऐसे में कई बच्चों के लिए mobile छोड़ना सिर्फ एक device से दूरी बनाना नहीं होता। कई बार उससे एक भावनात्मक जुड़ाव भी बन जाता है।

दिलचस्प बात यह रही कि अलग-अलग अनुभवों के बावजूद Anju Mehra और Mrs. Sheetal Singhal की बात एक जगह आकर मिलती है—

अगर Screen Time बढ़ता जाए और बच्चों का रिश्ता मैदान, दोस्तों और खुली जगहों से कम होता जाए, तो उसका असर उनके व्यवहार पर दिखाई देना स्वाभाविक है।


Indian child using a smartphone indoors while children play outside through a window
One child indoors, an entire playground outside.

क्या बच्चे वही सीख रहे हैं जो हम उन्हें दिखा रहे हैं?

यहीं से बातचीत एक अलग दिशा में चली गई।

शिक्षिका Geeta Mishra का मानना है कि बच्चे सिर्फ हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमें देखते भी हैं।

“बच्चे सिर्फ हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमें देखते भी हैं।”

अगर घर में हर खाली मिनट mobile पर बीत रहा हो…

अगर dinner table पर बातचीत की जगह screens हों…

अगर बड़े खुद बार-बार notifications देखने से खुद को न रोक पाएं…

तो बच्चों से अलग व्यवहार की उम्मीद करना आसान नहीं होता।

थोड़ी देर रुककर Geeta Mishra कहती हैं——

“बच्चे instructions कम और examples ज़्यादा follow करते हैं।”

शायद यही वजह है कि कई शिक्षकों ने एक जैसी चिंता जताई।

उनके मुताबिक आज छोटे बच्चे कई बार ऐसी भाषा और व्यवहार अपनाने लगे हैं, जो उनकी उम्र से मेल नहीं खाते।

किसी ने social media का ज़िक्र किया।

किसी ने television content का।

लेकिन लगभग हर बातचीत एक बात पर आकर ठहर गई—

समस्या किसी एक platform की नहीं, बल्कि बिना निगरानी के content consumption की है।

यानी सवाल सिर्फ इतना नहीं कि बच्चा क्या देख रहा है।

सवाल यह भी है कि कोई देख भी रहा है या नहीं।

इसी बात को Mrs. Sheetal Singhal थोड़ा अलग नज़रिए से देखती हैं।

उनके मुताबिक बच्चे सिर्फ screen से नहीं, घर के माहौल से भी सीखते हैं।

अगर parents किसी व्यवहार को पहले स्वीकार करें और बाद में अचानक उसी पर रोक लगाने लगें, तो बच्चे अक्सर उलझन में पड़ जाते हैं। उनके लिए नियमों से ज़्यादा बड़ों का व्यवहार मायने रखता है।

वे यह भी मानती हैं कि cartoons, digital characters और online content बच्चों की भाषा, कल्पना और सोच को प्रभावित कर सकते हैं। अगर बच्चा लगातार ऐसी दुनिया देखता है, जहाँ हर समस्या का हल कोई virtual character निकाल देता है, तो वह वास्तविक जीवन से भी वैसी ही अपेक्षाएँ करने लगता है।


Indian family sitting together at dinner while each uses a smartphone
Together physically, separated digitally.

क्या बच्चों को दोष देना सबसे आसान रास्ता है?

जब बातचीत इस सवाल तक पहुँची कि बच्चों का व्यवहार आखिर बदल क्यों रहा है, तो एक बात अलग-अलग शिक्षकों की बातों में बार-बार सुनाई दी—

बच्चों को दोष देना सबसे आसान जवाब हो सकता है, लेकिन शायद सबसे सही जवाब नहीं।

इसी दौरान शिक्षिका Ritu Kumari ने एक बात कही, जो देर तक याद रह गई—

“बच्चे गलती कैसे कर सकते हैं? वे तो वही सीखते हैं जो हम उन्हें दिखाते हैं।”

यहीं से बात बच्चों से निकलकर बड़ों तक पहुँच गई।

कई शिक्षकों का मानना था कि आज Parents पर पहले से कहीं ज़्यादा आर्थिक और पेशेवर दबाव है। दोनों कामकाजी हों, तो बच्चों के साथ बैठकर बात करने का समय भी कम हो जाता है।

ऐसे में कई घरों में mobile बच्चों को कुछ देर व्यस्त रखने का सबसे आसान सहारा बन जाता है।

कुछ देर के लिए बच्चा व्यस्त रहता है।

घर का काम भी हो जाता है।

लेकिन सवाल यह है—

क्या सुविधा धीरे-धीरे आदत बनती जा रही है?

इसी बात को शीतल सिंघल थोड़ा अलग नज़रिए से देखती हैं। उनके मुताबिक, बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी gadget का विकल्प नहीं हो सकता।

वे कहती हैं—

“Parents वही करें, जिसकी उम्मीद वे अपने बच्चों से करते हैं।”


आखिर इस पूरी पड़ताल ने क्या सिखाया?

अलग-अलग शिक्षकों से हुई बातचीत और बाद में शीतल सिंघल से हुई चर्चा के बाद कुछ बातें बार-बार सामने आती रहीं।


बच्चों को समय नहीं, साथ चाहिए

पहले शाम का एक हिस्सा अक्सर परिवार के नाम होता था।

आज वही समय traffic, office calls, coaching और screens के बीच बँट जाता है।

Geeta Mishra कहती हैं —

“बच्चों को महंगे gadgets से ज़्यादा किसी के साथ बैठकर आधा घंटा चाहिए।”


लगभग यही बात शीतल सिंघल भी दूसरे शब्दों में कहती हैं। उनके मुताबिक बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी digital device का विकल्प नहीं हो सकता।

बच्चों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो उन्हें बिना जल्दी किए सुने।


अनुशासन डर से नहीं, भरोसे से बनता है

रिपोर्टिंग के दौरान एक बात बार-बार सुनाई दी—

अनुशासन का मतलब डर नहीं होता।

बच्चों को यह समझना ज़रूरी है कि हर व्यवहार का एक परिणाम होता है।

लेकिन हर परिणाम डांट या सज़ा ही हो, यह भी ज़रूरी नहीं।

स्पष्ट नियम…

एक जैसा व्यवहार…

और लगातार संवाद…

कई शिक्षकों का मानना है कि यही बातें बच्चों पर सबसे गहरा असर छोड़ती हैं।

शीतल सिंघल के मुताबिक Parenting की सबसे बड़ी चुनौती नियम बनाना नहीं, उन्हें लगातार निभाना है।


घर और स्कूल साथ चलें, तभी बात बने

बातचीत के दौरान एक शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अगर घर में ‘हाँ’ और स्कूल में ‘ना’ होगी, तो बच्चा सबसे आसान रास्ता चुनेगा।”

बच्चों के सामने Parents और Teachers का एक-दूसरे का सम्मान करना, एक जैसी अपेक्षाएँ रखना और नियमित संवाद बनाए रखना पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है।

जैसा शीतल सिंघल कहती हैं—

“डांट से पहले संवाद, और आदेश से पहले उदाहरण।”


Happy Indian children playing football in a muddy playground under afternoon sunlight
Joy needs space more than screens.

अगर शुरुआत करनी हो, तो कहाँ से करें?

बच्चों में बढ़ते गुस्से का कोई एक कारण नहीं मिला।

इसलिए शायद उसका कोई एक समाधान भी नहीं है।

लेकिन अलग-अलग शिक्षकों से हुई बातचीत और बाद में शीतल सिंघल से हुई चर्चा के दौरान कुछ बातें बार-बार सामने आती रहीं।


Screen से पहले रिश्तों को समय दीजिए

घर में ऐसा एक समय तय किया जा सकता है, जब पूरा परिवार बिना Mobile के साथ बैठे।

यह समय एक घंटा हो, ऐसा ज़रूरी नहीं।

रोज़ के 20–30 मिनट भी बच्चों को यह एहसास दिला सकते हैं कि उनकी बातें सुनने वाला कोई है।

शीतल सिंघल भी मानती हैं कि बच्चों के साथ बिताया गया Quality Time किसी भी digital entertainment का विकल्प नहीं हो सकता।


बच्चों को सिर्फ व्यस्त नहीं, खेलने भी दीजिए

मिट्टी में खेलना…

दौड़ना…

साइकिल चलाना…

हारना…

दोस्तों से झगड़ना और फिर मान जाना…

ये सिर्फ खेल नहीं हैं।

यहीं से बच्चे अपनी भावनाओं को संभालना, हार स्वीकार करना, धैर्य रखना और दूसरों के साथ मिलकर चलना सीखते हैं।

शीतल सिंघल कहती हैं कि Creative Activities और Physical Activities बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए उतनी ही ज़रूरी हैं, जितनी पढ़ाई।


“तुम गलत हो” कहने से पहले “क्या हुआ?” पूछिए

बातचीत के दौरान Ritu Kumari ने एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण बात कही—

“हर गुस्से के पीछे बदतमीज़ी नहीं होती। कभी-कभी वहाँ कोई अनकही परेशानी भी होती है।”

शायद यही सवाल—“क्या हुआ?”—कई बहसों को शुरू होने से पहले ही बदल सकता है।

शीतल सिंघल भी मानती हैं कि बच्चों को सिर्फ डांटना नहीं, समझाना ज़्यादा ज़रूरी है।

आख़िरकार, बच्चे वही सबसे जल्दी सीखते हैं, जो वे अपने आसपास होते हुए देखते हैं।


शायद बच्चों को सलाह नहीं, समय ज़्यादा चाहिए

अलग-अलग बातचीत खत्म होने के बाद भी एक सवाल मन में बना रहा—

क्या सचमुच बच्चे बदल गए हैं?

या फिर उनका बचपन?

हो सकता है आने वाले वर्षों में technology और बदल जाए।

पढ़ाई का तरीका भी बदल जाए।

लेकिन एक बात शायद नहीं बदलेगी—

बच्चे आज भी सबसे पहले सुने जाना चाहते हैं।

और शायद इसी वजह से उन्हें किसी app से ज़्यादा, किसी अपने की ज़रूरत होती है।


Empty wooden school bench beside a quiet playground at sunset with a chalk sun drawing
An empty playground can say more than words.

InnaMax Answers | आपके सवाल, सीधे जवाब


Q1. किस उम्र में बच्चों का गुस्सा सामान्य माना जाता है?

छोटे बच्चों में गुस्सा विकास का एक सामान्य हिस्सा हो सकता है, क्योंकि वे अपनी भावनाओं को शब्दों में व्यक्त करना सीख रहे होते हैं। लेकिन अगर उम्र बढ़ने के साथ गुस्सा लगातार हिंसक या अनियंत्रित होता जाए, तो उस पर ध्यान देना ज़रूरी है।


Q2. क्या हर बच्चे पर एक जैसा Parenting तरीका काम करता है?

नहीं। हर बच्चे का स्वभाव, सीखने का तरीका और भावनात्मक ज़रूरतें अलग होती हैं। इसलिए अनुशासन का तरीका भी बच्चे की उम्र, व्यक्तित्व और परिस्थिति के अनुसार बदल सकता है।


Q3. क्या बच्चे गुस्सा देखकर भी गुस्सा सीखते हैं?

हाँ, बच्चे केवल बातें नहीं सुनते, वे आसपास के व्यवहार को भी देखते हैं। घर, स्कूल और दोस्तों के बीच वे जिस तरह के संवाद और प्रतिक्रिया देखते हैं, उसका असर उनके अपने व्यवहार पर पड़ सकता है।


Q4. कब सिर्फ समझाना काफी नहीं होता?

अगर बच्चा लगातार हिंसक व्यवहार करे, खुद को या दूसरों को नुकसान पहुँचाने लगे, स्कूल या घर की सामान्य दिनचर्या प्रभावित होने लगे, या उसके व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव दिखाई दे, तो किसी योग्य बाल मनोवैज्ञानिक या बाल रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।


Behind This Story

यह रिपोर्ट InnaMax News द्वारा बच्चों के बदलते व्यवहार और बढ़ते गुस्से को समझने के लिए Aasara Foundation में वंचित बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं Ritu Kumari और Anju Mehra से कई दिनों तक हुई स्वतंत्र बातचीत पर आधारित है। विषय को व्यापक संदर्भ में समझने के लिए Saraswati Shishu Mandir, Sahibabad की Principal Mrs. Sheetal Singhal से भी विस्तार से बातचीत की गई। यह लेख इन सभी बातचीत, अनुभवों और तथ्यों के संपादकीय संकलन पर आधारित है।


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