The Missed Call: कुछ आवाज़ें इंतज़ार नहीं करतीं
Quick Read | The Missed Call
रात के 10:47 बजे थे।
अनन्या ने मोबाइल उठाया।
स्क्रीन पर पापा की तीन Missed Calls थीं।
उसने घड़ी देखी।
“अभी बात करती हूँ…”
लेकिन तभी ऑफिस के WhatsApp ग्रुप पर एक नया मैसेज आ गया।
“Need the revised presentation tonight.”
उसने मोबाइल वापस टेबल पर रख दिया।
करीब एक घंटे बाद काम खत्म हुआ।
उसने पापा को कॉल किया।
फोन नहीं उठा।
“शायद सो गए होंगे,” उसने सोचा।
और खुद भी बिना ज़्यादा सोचे सो गई।
अगली सुबह ऑफिस जाने की जल्दी थी।
नाश्ता करते हुए उसने फिर कॉल करने का सोचा।
लेकिन कैब नीचे आ चुकी थी।
“शाम को आराम से बात करेंगे।”
शाम आई।
फिर मीटिंग।
फिर ट्रैफिक।
फिर थकान।
और वह कॉल फिर नहीं हो पाया।
तीसरे दिन माँ का फोन आया।
“जब समय मिले तो पापा से बात कर लेना…”
“वो पूछ रहे थे, सब ठीक है ना?”
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा,
“हाँ, आज पक्का बात करूँगी।”
उस रात उसने वीडियो कॉल किया।
पापा ने तुरंत फोन उठा लिया।
चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान थी।
“Busy थी?”
उन्होंने बिल्कुल सामान्य आवाज़ में पूछा।
अनन्या थोड़ा झेंप गई।
“हाँ… थोड़ा काम ज़्यादा था।”
पापा हँसे।
“अच्छा है। काम होना चाहिए।”
कुछ सेकंड दोनों चुप रहे।
फिर उन्होंने धीरे से कहा,
“उस दिन कुछ ज़रूरी बात नहीं थी…”
“…बस तुम्हारी आवाज़ सुननी थी।”
कमरे में अचानक ख़ामोशी भर गई।
अनन्या के पास कोई जवाब नहीं था।
उसे याद आया—
बचपन में स्कूल से लौटते ही वह बिना वजह पापा के कमरे में चली जाती थी।
कभी होमवर्क दिखाने।
कभी कोई ड्राइंग।
कभी सिर्फ़ यह बताने कि आज बारिश हुई थी।
तब बातों की वजह नहीं होती थी।
बस बातें होती थीं।
अगले रविवार उसने घर जाने का फैसला किया।
दरवाज़ा खुलते ही पापा बोले,
“अरे… बताया भी नहीं।”
“सोचा, इस बार Missed Call की जगह मैं ही आ जाऊँ।”
दोनों हँस पड़े।
शाम को चाय बन रही थी।
टीवी चल रहा था, लेकिन कोई देख नहीं रहा था।
माँ रसोई से आवाज़ लगा रही थीं।
पापा अख़बार के पुराने किस्से सुना रहे थे।
बीच-बीच में छोटी-छोटी बातें होती रहीं।
किसी को जल्दी नहीं थी।
किसी एजेंडा की ज़रूरत नहीं थी।
वापस लौटते समय अनन्या ने मोबाइल की Settings खोली।
उसने Calendar में हर रविवार शाम एक Reminder लगा दिया।
“Call Home.”
बस इतना ही।
कोई बड़ा संकल्प नहीं।
कोई लंबी सूची नहीं।
कुछ हफ़्तों बाद ऑफिस में उसकी टीम का नया सदस्य बोला,
“मैं बाद में घर बात कर लूँगा…”
अनन्या मुस्कुराई।
“अगर दो मिनट हैं…”
“…तो अभी कर लो।”
वह लड़का तुरंत बाहर चला गया।
शायद उसे भी किसी की आवाज़ सुनने का इंतज़ार था।
उस रात अनन्या ने फिर पापा से बात की।
बात सिर्फ़ पाँच मिनट चली।
मौसम की।
चाय की।
पड़ोस के नए पेड़ की।
और फिर—
“चलो, अब रखता हूँ,” पापा ने कहा।
“ठीक है…”
“फिर बात करेंगे।“
Quick Read
हम अक्सर मान लेते हैं कि अपने लोग इंतज़ार कर लेंगे। लेकिन कई बार उन्हें किसी समाधान की नहीं, सिर्फ़ हमारी आवाज़ सुनने की ज़रूरत होती है।
One Small Thought
“कुछ कॉल इसलिए याद रह जाते हैं, क्योंकि वे किसी काम के लिए नहीं, किसी अपने के लिए किए गए थे।”
— समाप्त —
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