जब नौकरी चली गई… तब प्यार की असली परीक्षा शुरू हुई
“एक बात पूछूँ?”
आस्था ने कॉफी का कप मेज़ पर रखते हुए कहा।
“अगर मैं कभी तुम्हारी ज़िंदगी से चली गई… तो?”
कबीर मुस्कुराया।
“तो मैं तुम्हें ढूँढ़ लूँगा।”
आस्था ने सिर हिलाया।
“नहीं…
अगर मैं खुद ही नहीं मिलना चाहूँ?”
कबीर हँस दिया।
“तब मैं इंतज़ार करूँगा।”
दोनों की शादी तय हो चुकी थी।
बस तीन महीने बाद शादी थी।
लेकिन उसी बीच…
कबीर की कंपनी बंद हो गई।
नौकरी चली गई।
हर दिन इंटरव्यू…
हर दिन रिजेक्शन।
कबीर बदलने लगा।
फोन कम…
मुलाकातें कम…
हँसी गायब।
एक शाम उसने आस्था से कहा,
“शायद हमें शादी टाल देनी चाहिए।”
आस्था ने पूछा,
“क्यों?”
“मैं तुम्हें वो ज़िंदगी नहीं दे पाऊँगा जिसकी तुम हक़दार हो।”
कुछ पल तक चुप्पी रही।
फिर आस्था ने अपना बैग खोला।
उसमें से एक छोटी-सी डायरी निकाली।
“ये पहचानते हो?”
कबीर मुस्कुराया।
“कॉलेज वाली डायरी?”
आस्था ने पहला पन्ना खोला।
उस पर कबीर की लिखावट थी—
**”जब मेरे पास कुछ नहीं होगा…
तब भी मैं तुम्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने दूँगा।”**
आस्था ने डायरी उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
“मुझे बड़ा घर नहीं चाहिए था…
मुझे वही लड़का चाहिए था जिसने ये लिखा था।”
कबीर की आँखें भर आईं।
“लेकिन अभी मेरे पास कुछ भी नहीं है…”
आस्था ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“गलत।”
“तुम्हारे पास मेहनत है…
ईमानदारी है…
और सबसे ज़रूरी…
तुम अभी भी मेरे साथ हो।”
दो महीने बाद…
दोनों ने बहुत साधारण तरीके से शादी कर ली।
न कोई बड़ा बैंक्वेट।
न महँगी सजावट।
बस परिवार…
दोस्त…
और घर की छत पर कुछ लाइटें।
शादी के छह महीने बाद…
कबीर को नई नौकरी मिल गई।
धीरे-धीरे सब बदलने लगा।
एक साल बाद…
दोनों अपने नए घर की बालकनी में बैठे थे।
बारिश हो रही थी।
कबीर ने मुस्कुराकर पूछा,
“अगर उस दिन तुम भी चली जातीं तो?”
आस्था ने चाय का कप उसकी तरफ़ बढ़ाया।
“प्यार…
अच्छे दिनों का इनाम नहीं होता।
मुश्किल दिनों में साथ निभाने का फ़ैसला होता है।”
कबीर ने उसका हाथ थाम लिया।
बारिश अब भी हो रही थी।
लेकिन इस बार…
दोनों को किसी छत की नहीं,
एक-दूसरे की ज़रूरत थी।
कभी-कभी…
सबसे खूबसूरत प्रेम कहानी शादी से शुरू नहीं होती।
वो उस दिन शुरू होती है…
जब एक इंसान कहता है—
“हालात बदल जाएँ तो भी… मैं नहीं बदलूँगा।”




