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सिर्फ़ दो दिन घर आकर आदित्य इतना भावुक क्यों हो गया?


“माँ… इस बार बस दो दिन के लिए आ रहा हूँ।”

फोन पर आदित्य ने कहा।

माँ खुश हो गईं।

“दो दिन भी बहुत हैं बेटा।”

आठ साल हो गए थे।

नौकरी…

प्रमोशन…

विदेश की यात्राएँ…

सब मिल गया था।

बस…

घर छूट गया था।

गाँव पहुँचा तो सब कुछ छोटा लग रहा था।

वही गली…

वही पीपल का पेड़…

वही मिट्टी की खुशबू।

माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं।

उन्होंने कुछ नहीं कहा।

बस…

माथा चूम लिया।

रात को आदित्य छत पर लेटा था।

आसमान में उतने तारे थे…

जितने उसने सालों से नहीं देखे थे।

सुबह पापा उसे खेत दिखाने ले गए।

रास्ते में हर दूसरा आदमी मुस्कुराकर कह रहा था—

“अरे…

आ गया शहर वाला!”

आदित्य भी मुस्कुरा रहा था।

उसे एहसास हुआ…

यहाँ लोग उसके नाम से नहीं…

उसके बचपन से उसे पहचानते हैं।

दूसरे दिन लौटने का समय आ गया।

माँ ने चुपचाप उसके बैग में घर के बने अचार…

गुड़…

और उसकी पसंद के लड्डू रख दिए।

आदित्य ने कहा,

“माँ…

इतना कौन ले जाएगा?”

माँ हँस दीं।

“ये सामान नहीं है…

थोड़ा-सा घर है।”

एयरपोर्ट पहुँचकर आदित्य ने बैग खोला।

ऊपर एक छोटी-सी पर्ची रखी थी।

उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—

“बेटा… जब भी थक जाओ, लौट आना।”

आदित्य की आँखें भर आईं।

उसने पहली बार समझा…

दुनिया में बहुत-सी जगहें आपको रहने की जगह देती हैं।

लेकिन…

घर ही एक ऐसी जगह है…

जो आपको बिना किसी वजह के अपना लेता है।


— समाप्त —

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