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तीन साल बाद जब राहुल घर पहुँचा, माँ ने सिर्फ़ दो शब्द कहे


“माँ… इस बार शायद दिवाली पर नहीं आ पाऊँगा।”

फोन के उस पार कुछ सेकंड तक चुप्पी रही।

फिर माँ बोलीं—

“कोई बात नहीं बेटा… अपना ध्यान रखना।”

राहुल ने कॉल काट दिया।

ऑफिस, EMI, ज़िम्मेदारियाँ…

हर बार कोई न कोई वजह मिल ही जाती थी।

गाँव गए उसे तीन साल हो चुके थे।

एक दिन अचानक छोटी बहन का फोन आया।

“भैया… माँ ने तुम्हारा कमरा आज भी वैसे ही रखा है।”

राहुल हँस पड़ा।

“अरे, अब मैं बच्चा थोड़ी हूँ।”

बहन ने कुछ नहीं कहा।

बस वीडियो कॉल घुमा दी।

कमरे में सब कुछ वैसा ही था।

पुराना बैट…

स्कूल का बैग…

दीवार पर टेढ़ी लगी ट्रॉफी…

यहाँ तक कि बिस्तर पर वही नीली चादर।

राहुल कुछ पल चुप रहा।

“माँ ये सब क्यों संभालकर रखती हैं?”

पीछे से माँ की आवाज़ आई—

“क्या पता… तू अचानक आ जाए।”

उस रात राहुल सो नहीं पाया।

अगले ही दिन बिना बताए गाँव पहुँच गया।

घर का दरवाज़ा खुला।

माँ आँगन में बैठकर सब्ज़ी काट रही थीं।

उन्हें देखकर राहुल मुस्कुराया।

“सरप्राइज़!”

माँ ने उसकी तरफ देखा…

फिर बिना कुछ कहे उसके सिर पर हाथ रखा।

और बस इतना बोलीं—

“आ गया?”

न कोई शिकायत…

न कोई सवाल…

न कोई हिसाब।

सिर्फ़ दो शब्द।

राहुल वहीं बैठ गया।

उसने पहली बार महसूस किया…

कुछ घरों में प्यार कभी ख़त्म नहीं होता।

बस…

किसी के लौट आने का इंतज़ार करता रहता है।


— समाप्त —

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