दो बीज, एक निर्णय: Comfort Zone या Growth—आज की पीढ़ी कौन-सा बीज चुनेगी?
आज की दुनिया speed, safety और comfort की बात करती है।
Career हो, relationship हो या life decisions—हम अक्सर वही चुनते हैं जो easy और secure लगे।
लेकिन उपनिषदों की दृष्टि कहती है:
जो सुरक्षित लगता है, वही कई बार विकास का सबसे बड़ा अवरोध बन जाता है।
“दो बीजों की कथा” इसी गहरे सत्य को सरल भाषा में हमारे सामने रखती है—
एक ऐसी कथा, जो आज की youth mindset को सीधा प्रश्न पूछती है।
बहुत समय पहले, एक ऋषि अपने शिष्यों को आत्मबल और साहस का अर्थ समझा रहे थे।
उन्होंने अपनी मुट्ठी में दो समान दिखने वाले बीज लिए और पूछा—
“इन दोनों में क्या अंतर है?”
शिष्यों ने सहज उत्तर दिया—
“गुरुदेव, दोनों एक समान हैं।”
ऋषि मुस्कुराए।
उन्होंने बिना कुछ कहे एक बीज को उपजाऊ मिट्टी में रोप दिया और दूसरे बीज को अपनी बंद मुट्ठी में दबा लिया।
दिन बीतते गए।
जो बीज मिट्टी में गया था, उसे अंधकार मिला, नमी मिली, दबाव मिला।
हवा और पानी के स्पर्श से वह बीज अंकुरित हुआ,
धीरे-धीरे एक छोटे पौधे में बदल गया।
दूसरा बीज?
वह ज्यों-का-त्यों पड़ा रहा—
अंधेरे में, बिना हवा, बिना जीवन।
सुरक्षित… लेकिन निष्क्रिय।
ऋषि ने दोनों को शिष्यों के सामने रख दिया और बोले—
“जो बीज मिट्टी में गया, उसे शुरुआत में संघर्ष मिला।
उसे अंधकार झेलना पड़ा, दबाव सहना पड़ा।
पर वहीं से उसके जीवन की शुरुआत हुई।”
फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी खोली—
“और यह बीज…
मैंने इसे सुरक्षित रखा।
कोई संघर्ष नहीं, कोई जोखिम नहीं।
पर इसी सुरक्षा ने इसे मृत बना दिया।”
शिष्य स्तब्ध थे।
ऋषि आगे बोले—
“जीवन में भी यही नियम है।
शुरुआत में मिट्टी तुम्हें अंधकार लगती है, संघर्ष लगती है।
लेकिन वहीं विकास जन्म लेता है।”
“दूसरी ओर—
सुविधा, सुरक्षा और आराम सुनने में मीठे लगते हैं,
पर ये भीतर से खोखला कर देते हैं।”
उन्होंने शिष्यों से सीधा प्रश्न पूछा—
“तुम क्या बनना चाहोगे?
वह बीज जो मिट्टी में गया और अंकुरित हुआ?
या वह बीज जिसे सुरक्षित रहने की कीमत पर अपना अस्तित्व खोना पड़ा?”
शिष्य मौन थे।
क्योंकि उत्तर उनके भीतर पहले ही जन्म ले चुका था।
यह कथा केवल प्रेरक कहानी नहीं है।
यह उपनिषदों की मूल शिक्षा है—
कि आत्मविकास बाहर नहीं, भीतर के निर्णय से शुरू होता है।
आज की युवा पीढ़ी के लिए यह कथा आईने की तरह है।
Comfort zone attractive लगता है—
लेकिन वही सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।
जो संघर्ष तुमसे टकराता है,
वही तुम्हें विस्तार देता है।
और जो सुरक्षा तुम्हें रोक देती है,
वही तुम्हें भीतर से समाप्त कर देती है।
🔹 समकालीन Moral (आज की पीढ़ी के लिए)
👉 सफल वही बनता है, जो चुनौतियों में कूदने का साहस रखता है।
👉 Comfort zone growth नहीं देता, केवल illusion देता है।
👉 खिलना है तो पहले मिट्टी झेलनी पड़ेगी—अंधकार, दबाव और संघर्ष।
यही उपनिषदों का शाश्वत संदेश है—
जो भीतर प्रकाश चाहता है, उसे पहले स्वयं को मिट्टी में बोना होगा।

