पहला वरदान मोक्ष नहीं था: नचिकेता ने पहले पिता की शांति क्यों माँगी? पितृ-परितोष
आज की पीढ़ी freedom, success और self-expression की बात करती है।
पर क्या हमने कभी सोचा है कि माता-पिता की मानसिक शांति हमारे जीवन के निर्णयों में कितनी महत्वपूर्ण है?
कठोपनिषद् की यह अमर कथा केवल मृत्यु और मोक्ष का संवाद नहीं है।
यह एक बालक द्वारा दिखाई गई emotional maturity, value-based courage और पितृ-परितोष की जीवंत मिसाल है।
नचिकेता का पहला वरदान हमें यह स्मरण कराता है कि
सच्ची उन्नति वहीं से शुरू होती है
जहाँ परिवार का मन शान्त और प्रसन्न हो।
यह कथा आज के youth के लिए
संस्कार और आत्मगौरव की silent reminder है।
नचिकेता द्वारा मांगा गया प्रथम वरदान : पितृ-परितोष
(कठोपनिषद् की अमर कथा का सबसे हृदयस्पर्शी भाग) ✨🙏
अपने नगर के प्रवेश द्वार पर तीन दिनों से बिना अन्न और जल के बैठे ब्राह्मण बालक नचिकेता को देखकर यमराज स्वयं सहम गये।
उनके मुख पर भय और चिन्ता की रेखाएँ स्पष्ट झलक रही थीं।
एक तो ब्राह्मण बालक,
दूसरा अतिथि,
और उस पर से तीन दिनों से भूखा-प्यासा।
यमराज ने अत्यन्त विनय के साथ पूछा—
“हे ब्राह्मण बालक! आप मेरे नगर के प्रवेश द्वार पर तीन दिनों से किस कारण बैठे हैं?”
इस प्रश्न के पीछे एक गहरी पृष्ठभूमि थी।
वाजश्रवा-पुत्र उद्दालक विश्वजित् यज्ञ कर रहे थे।
यज्ञ में ब्राह्मणों को दान दी जा रही गायें दुर्बल, दुग्ध-दोहा से रहित और शक्तिहीन थीं।
यह देखकर उनके मात्र पाँच वर्ष के पुत्र नचिकेता ने अपने पिता को टोक दिया—
“पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया। अनन्दा नाम ते लोकास्तान् गच्छति ता ददत्॥”
अर्थात्—
हे पिताजी! जिन गायों में न जल पीने की क्षमता है,
न तृण खाने की शक्ति,
न दूध देने का सामर्थ्य,
और जिनकी इन्द्रियाँ भी शिथिल हो चुकी हैं—
ऐसी धेनुओं का दान देकर आप मुझे किस लोक को देना चाहते हैं?
यह प्रश्न साधारण नहीं था।
यह धर्म का प्रश्न था।
किन्तु क्रोध और आवेश में भरकर पिता उद्दालक के मुख से निकल गया—
“मृत्यवे त्वां ददामि!”
मैं तुम्हें मृत्यु को देता हूँ।
नचिकेता ने तीन बार पूछा।
तीन बार वही उत्तर मिला—
“मैं तुम्हें यमराज को दूँगा।”
नचिकेता ने मन में विचार किया—
शिष्यों की तीन श्रेणियाँ होती हैं: उत्तम, मध्यम और अधम।
मैं उत्तम और मध्यम श्रेणी का शिष्य हूँ।
पिता के वचन को सत्य करना ही मेरा धर्म है।
वह तत्क्षण चल पड़े।
पिता ने बहुत पश्चाताप किया,
रोकने की हर सम्भव चेष्टा की—
पर नचिकेता नहीं रुके।
वे मन-ही-मन सोचते रहे—
“पिता के वचनों में निश्चय ही कोई गूढ़ प्रयोजन होगा, तभी तो उन्होंने ऐसा कहा।”
यमराज उस समय नगर से बाहर गये हुए थे।
नचिकेता तीन दिन-तीन रात
बिना अन्न-जल
नगर द्वार पर बैठे रहे।
जब यमराज लौटे और अतिथि ब्राह्मण बालक की यह दशा देखी,
तो वे स्वयं भयभीत हो गये।
उन्होंने प्रायश्चित्त स्वरूप तीन वरदान देने की प्रार्थना की।
तब नचिकेता ने प्रथम वरदान माँगा—
“हे मृत्यु के स्वामी!
मेरे पिताजी पूर्ण रूप से क्रोध-रहित, शान्त और प्रसन्न मन वाले हो जाएँ।
जब मैं लौटकर उनके पास जाऊँ,
तो वे मुझे पहले की तरह प्रेम से स्वीकार करें।
पितृ-परितोष के रूप में आपसे यह पहला वरदान माँगता हूँ।”
शान्तसंकल्पः सुनवामा यथा स्याद् वीतमन्युः गौतमो माभि मृत्यो। त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत् प्रतीतः एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे॥
यही है भारतवर्ष की आत्मा।
यह वह भूमि है जहाँ
माता-पिता और गुरु की प्रसन्नता के लिए
पुत्र और शिष्य
एक पल का भी विलम्ब किये बिना
अपना जीवन न्योछावर कर देते हैं।
जय नचिकेता की पितृभक्ति।
ॐ जय सनातन संस्कृति।
नचिकेता ने पहला वरदान दीर्घायु, स्वर्ग या गूढ़ ज्ञान नहीं माँगा।
उसने माँगी—अपने पिता की शांति।
आज जब रिश्ते ego, silence और distance में उलझते जा रहे हैं,
नचिकेता हमें सिखाता है कि
inner peace की शुरुआत घर से होती है।
यह कथा rebellion नहीं सिखाती,
यह responsibility और sensitivity सिखाती है।
आज की भाषा में कहें तो—
नचिकेता का निर्णय
high emotional intelligence और
strong value system का उदाहरण है।
Sanatan परंपरा यही सिखाती है कि
सफलता केवल आगे बढ़ने का नाम नहीं,
बल्कि पीछे जुड़े रिश्तों को सम्भालने का भी नाम है।
यदि अगली पीढ़ी यह समझ ले—
तो यही कथा
एक जीवंत संस्कार बन जाएगी।

