“तुम हमेशा Available रहते हो…” इसलिए सबसे ज़्यादा Extra Work भी तुम्हें ही मिलता था
रिया को ऑफिस में आए डेढ़ साल हुआ था।
अगर किसी को अचानक छुट्टी लेनी होती…
रिया।
अगर किसी project में extra support चाहिए…
रिया।
अगर weekend पर client call हो…
रिया।
उसका एक ही जवाब होता था—
“ठीक है, मैं कर देती हूँ।”
उसे लगता था कि यही dedication है।
जितना ज़्यादा भरोसा, उतनी तेज़ growth।
धीरे-धीरे एक अजीब चीज़ होने लगी।
नई opportunities दूसरे लोगों को मिलने लगीं।
Interesting projects भी।
लेकिन extra workload…
वो हमेशा रिया के हिस्से में आता।
एक दिन उसने हिम्मत करके Manager से पूछ लिया,
“Sir… बड़े projects में मेरा नाम कम क्यों आता है?”
Manager ने बिना किसी नाराज़गी के कहा,
“क्योंकि जब भी कोई urgent operational काम आता है, हमें पता होता है कि तुम संभाल लोगी।”
रिया ने सोचा…
ये तो अच्छी बात है।
लेकिन Manager आगे बोले,
“और इसलिए strategic projects किसी और को देने पड़ते हैं। उनमें लगातार समय चाहिए होता है।”
रिया पहली बार समझी…
वो भरोसेमंद तो बन गई थी…
लेकिन उसी भरोसे ने उसे एक अलग खांचे में डाल दिया था।
उस रात उसने पिछले छह महीने का काम देखा।
उसने कितनी presentations बनाई थीं…
कितने reports सुधारे थे…
कितनी emergencies संभाली थीं…
लेकिन उनमें से ज़्यादातर काम…
किसी और के targets पूरे करने के लिए थे।
अपने career के लिए उसने क्या बनाया था?
इस सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।
अगले हफ्ते फिर एक urgent request आई।
“रिया, ये report आज ही पूरी करनी है।”
पहले की तरह “हाँ” कहने के बजाय उसने पूछा,
“अगर मैं ये लेती हूँ, तो क्या अगले महीने वाला automation project किसी और को जाएगा?”
Manager कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले,
“नहीं… वो project तुम्हीं lead करो। Report किसी और को दे देते हैं।”
रिया हैरान थी।
इतना आसान था?
असल में किसी ने उसे रोका नहीं था।
वो खुद हर बार बिना सोचे extra काम उठा लेती थी।
अब उसने मदद करना बंद नहीं किया।
लेकिन हर “हाँ” से पहले एक सवाल ज़रूर पूछती—
“क्या ये काम मुझे आगे बढ़ाएगा… या सिर्फ आज का दिन बचाएगा?”
कुछ requests पर वो आज भी तुरंत तैयार हो जाती।
कुछ पर politely मना कर देती।
और कुछ पर किसी दूसरे teammate का नाम सुझा देती।
धीरे-धीरे लोगों ने उसे कम helpful नहीं…
ज़्यादा professional मानना शुरू कर दिया।
Workplace में हमेशा Available रहना अच्छी बात है।
लेकिन अगर हर बार सबसे आसान जवाब “हाँ” होगा…
तो लोग आपको सबसे आसान विकल्प बना देंगे।
Career सिर्फ इस बात से नहीं बढ़ता कि आपने कितने extra काम किए।
कई बार इस बात से बढ़ता है कि आपने किन कामों के लिए “हाँ” कहा…
और किनके लिए सम्मान के साथ “अभी नहीं।”
इस कहानी से क्या सीख सकते हैं?
ऑफिस में भरोसेमंद होना अच्छी बात है, लेकिन हर बार अतिरिक्त काम अपने ऊपर लेना हमेशा समझदारी नहीं होती। कई लोग मदद करने की आदत में इतने सहज हो जाते हैं कि धीरे-धीरे वे महत्वपूर्ण अवसरों से दूर होने लगते हैं। उनका समय रोज़मर्रा की समस्याएँ सुलझाने में निकल जाता है, जबकि लंबे समय का प्रभाव बनाने वाले प्रोजेक्ट किसी और को मिल जाते हैं।
एक आसान Framework अपनाया जा सकता है:
Think → Value → Decide
- Think: क्या यह काम वास्तव में मेरी भूमिका और लक्ष्य से जुड़ा है?
- Value: क्या इससे मेरी सीख, पहचान या जिम्मेदारी बढ़ेगी?
- Decide: अगर जवाब “नहीं” है, तो सम्मानपूर्वक मना करना भी एक पेशेवर निर्णय है।
हर “हाँ” समान महत्व की नहीं होती। कभी-कभी सही अवसर के लिए समय बचाना भी उतना ही ज़रूरी है जितना मेहनत करना।
याद रखने वाली बात: Career उन कामों से बनता है जिन्हें आप सोच-समझकर चुनते हैं, केवल उन कामों से नहीं जिन्हें आप बिना सोचे स्वीकार कर लेते हैं।
— समाप्त —
— CVcon
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