हर सुबह एक आदमी अपनी पसंदीदा कप में चाय पीता था। वह कप उसके लिए सिर्फ़ एक बर्तन नहीं था — एक habit, एक comfort था। धीरे-धीरे कप एक दिन हल्का-सा क्रैक हुआ। किसी को भी लगता कि अब इसे बदल देना चाहिए… लेकिन आदमी ने ऐसा नहीं किया।
वह सोचा करता था — “यार, ये कप तो सालों से मेरे साथ है… इतना तो बनता है कि थोड़ा क्रैक झेल लूँ।”
और इस तरह वह उसी टूटी दरार वाले कप में चाय पीता रहा।
शुरू में छोटी-सी लाइन थी। फिर वह लाइन बढ़ती गई। हर घूंट में एक अजीब-सी टीस महसूस होती — cup पहले जैसा perfect नहीं था, पर आदत में शामिल हो चुका था।
कई बार उसका हाथ भी हल्का-सा गर्म हो जाता, पर उसने कप बदलने की हिम्मत नहीं जुटाई।
आख़िर एक दिन कप पूरी तरह टूट गया। चाय मेज़ पर फैल गई। उसके हाथ कट गए। उस पल उसे एक सच चुभा —
“अगर मैंने इसे पहले छोड़ दिया होता… तो शायद मैं नए, बेहतर कप का आनंद पहले ही ले चुका होता।”
रिश्ते, आदतें, नौकरी या कोई भी चीज़ — जब टूटने लगती है, हम अक्सर इसे patchwork से बचाने की कोशिश करते रहते हैं।
क्यों?
क्योंकि कभी वह चीज़ हमारी पसंदीदा थी। हम उससे emotionally attached थे।
लेकिन सच्चाई यह है कि:
कभी-कभी देर से छोड़ी गई चीज़ें ज़्यादा दुख देती हैं।
हम ऐसे कई कप ज़िंदगी में उठाए घूमते हैं —
टूट चुकी दोस्ती, खत्म हो चुका रिश्ता, meaning खो चुकी नौकरी, या कोई आदत जिसे हमने दिल में बसाया हुआ है।
ज़िंदगी इशारे देती है —
दरारें दिखती हैं।
Warning signs दिखते हैं।
पर हम ignore करते रहते हैं, ये सोचकर कि “चलो, अभी और चल जाएगा…”
लेकिन टूटना जब होता है तो एक झटके में होता है।
उसी तरह —
कुछ चीज़ों को छोड़ देना आपकी हार नहीं है… आपकी Healing है।
Moral:
“जो चीज़ पहले ही टूट चुकी है, उसे सिर्फ़ इसलिए मत पकड़े रहो क्योंकि कभी वह तुम्हारी पसंद थी।”
Letting go is not loss — it’s self-respect.
Produced By – StoryLab

