एक पिता अपने बेटे को हर दिन एक dying plant को पानी देने भेजता था। पौधा लगभग सूख चुका था, पत्तियाँ झड़ चुकी थीं, तना कमज़ोर पड़ चुका था।
बच्चा कई बार कहता —
“Papa, ये तो मर ही चुका है… क्यों कोशिश करवाते हो?”
पिता मुस्कुराकर बस यही कहते —
“बस पानी दो… बाकी प्रकृति पर छोड़ दो।”
दिन बीतते गए।
बच्चा रोज़ पानी देता रहा — बिना skip किए।
एक दिन उसने देखा…
पौधे में एक नन्ही-सी नई कोंपल निकली है।
उसका चेहरा खिल उठा —
“Papa, ये जिंदा इसलिए रहा क्योंकि मैंने हार नहीं मानी!”
पिता ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —
“नहीं बेटा, ये इसलिए जिंदा रहा क्योंकि तुमने समझा—रिश्ते ताक़त से नहीं, care से चलते हैं।”
यह कहानी सिर्फ़ पौधे की नहीं —
हमारी friendships की है, relationships की है, family bonds की है।
हम अक्सर दूरी को blame करते हैं —
“तुम दूर हो गए…”
“हमारी बात कम होने लगी…”
“Time नहीं मिलता…”
लेकिन सच यह है —
रिश्ते दूरी से नहीं, lack of effort से मरते हैं।
Care सबसे बड़ा oxygen है।
एक छोटा-सा message, एक छोटा-सा concern, एक warm gesture — ये छोटी चीज़ें ही रिश्तों को alive रखती हैं।
और यह भी याद रखने लायक बात है —
हर रिश्ता perfect नहीं होता।
कई रिश्ते hurt करते हैं, कई बार तोड़ भी देते हैं।
लेकिन जो genuinely worth होते हैं…
उनमें “water” देना — यानी effort डालना — ज़रूरी होता है।
Moral:
“Rishtey जीवित रहते हैं care से, न कि muscle से। Effort ही असली वजह है जो रिश्ते जिंदा रखती है।”
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